'जो जाना चाहता है जाए, मैं अकेली ही काफी', TMC के ‘रणछोड़ दासों’ पर Mamata Banerjee की दहाड़, एकला चलो रे ही मंत्र
टीएमसी में बगावत के बीच ममता बनर्जी का बड़ा बयान, बोलीं- जो जाना चाहता है जाए. पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर साधा सीधा निशाना.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष और बगावत खुलकर सामने आने लगी है. कुछ नेता तो पार्टी नेतृत्व खासकर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुलकर बगावती तेवर में आ गए हैं. वहीं, पार्टी के कई नेता या तो नेतृत्व से नाराज दिखाई दिए या फिर सार्वजनिक रूप से संगठन पर सवाल उठाने लगे. इसी बीच मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा - “जो लोग पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे जा सकते हैं. मैं अकेली ही पार्टी को फिर से खड़ा कर दूंगी.”
टीएमसी प्रमुख बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी के रुख के उलट काफी संख्या में पार्टी के नेता बगावती तेवर हैं. जानिए, टीएमसी के वो प्रमुख नेता कौन, जो या तो पार्टी छोड़ना चाहते हैं, या पासा बदलने के फिराक में हैं. बस, उन्हें मौके की तलाश है. चुनाव परिणाम आने के 11 दिन बाद कोलकाता के कालीघाट स्थित आवास पर पार्टी उम्मीदवारों और नेताओं के साथ बैठक में ममता बनर्जी ने कार्यकर्ताओं से संगठन को फिर से मजबूत करने की अपील की. उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस किसी के आगे झुकेगी नहीं और जनता का जनादेश “छीन लिया गया” है.
किसने क्या कहा?
चुनाव नतीजों के बाद जिन नेताओं के नाम पार्टी छोड़ने या बगावती रुख अपनाने को लेकर सुर्खियों में आए, उनमें रिजू दत्ता, राज चक्रवर्ती, मनोज तिवारी, डॉ. सुजॉय चक्रवर्ती, कार्तिक घोष, कोहिनूर मजूमदार और कृष्णेंदु नारायण चौधरी प्रमुख हैं. रिजू दत्ता और कार्तिक घोष जैसे प्रवक्ताओं को पार्टी विरोधी बयान देने के आरोप में छह साल के लिए निलंबित किया गया.
पूर्व क्रिकेटर और मंत्री मनोज तिवारी ने टिकट कटने के बाद नेतृत्व पर भ्रष्टाचार और अंदरूनी लोकतंत्र की कमी के आरोप लगाए. वहीं फिल्म निर्देशक और पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती ने गुटबाजी से नाराज होकर सक्रिय राजनीति छोड़ने का फैसला किया. डॉ. सुजॉय चक्रवर्ती ने भी पार्टी पर दबाव और अवैध फंड जुटाने के आरोप लगाते हुए इस्तीफा दिया.
इसके अलावा, वरिष्ठ नेता रवींद्रनाथ घोष और नियामत शेख ने भी संगठन में बढ़ती गुटबाजी और लॉबिंग पर नाराजगी जताई. राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज रही कि टीएमसी के कई विधायक पार्टी छोड़ सकते हैं, हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार एकजुटता का संदेश देने में जुटा है.
1. रिजू दत्ता (Riju Dutta)
टीएमसी के युवा और आक्रामक प्रवक्ता माने जाने वाले रिज़ू दत्ता हाल में पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने के कारण चर्चा में आए. पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद उन्होंने संगठन में भ्रष्टाचार और “कट-मनी संस्कृति” पर खुलकर बयान दिए. इसके बाद पार्टी ने उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में छह साल के लिए निलंबित कर दिया.
2. राज चक्रवर्ती (Raj Chakraborty)
फिल्म निर्देशक और बैरकपुर से पूर्व टीएमसी विधायक राज चक्रवर्ती ने राजनीति छोड़ने का ऐलान कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. उन्होंने कहा कि पार्टी दो गुटों में बंट चुकी है और जमीनी कार्यकर्ताओं से दूरी बढ़ गई है. उनके इस्तीफे को बंगाल में टीएमसी के अंदर बढ़ते असंतोष के संकेत के रूप में देखा गया.
3. मनोज तिवारी (Manoj Tiwari)
मनोज तिवारी का नाम टीएमसी के भीतर असंतोष जताने वाले नेताओं की चर्चाओं में सामने आया, हालांकि वे पार्टी के शीर्ष चेहरों में नहीं रहे. संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व शैली पर उठे सवालों के बीच उनका नाम भी उन नेताओं में जोड़ा गया जिन्होंने पार्टी लाइन से अलग राय रखी. राजनीतिक हलकों में इसे टीएमसी के अंदरूनी संकट से जोड़कर देखा गया.
4. कोहिनूर मजूमदार (Kohinoor Majumdar)
टीएमसी प्रवक्ता कोहिनूर मजूमदार ने चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व और रणनीति पर अप्रत्यक्ष सवाल उठाए थे. इसके बाद पार्टी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में छह साल के लिए निलंबित कर दिया. उनका मामला टीएमसी में अनुशासन बनाम आंतरिक लोकतंत्र की बहस का बड़ा उदाहरण बन गया.
5. कृष्णेंदु नारायण चौधरी (Krishnendu Narayan Chowdhury)
टीएमसी प्रवक्ता कृष्णेंदु नारायण चौधरी उन नेताओं में शामिल रहे जिन्हें पार्टी विरोधी टिप्पणियों के आरोप में शो-कॉज नोटिस मिला. चुनावी हार के बाद उन्होंने संगठन और प्रचार रणनीति पर सवाल उठाए थे. हालांकि उन पर अंतिम कार्रवाई को लेकर पार्टी ने तत्काल स्पष्ट रुख नहीं बताया, लेकिन उनका नाम असंतुष्ट नेताओं में प्रमुखता से उभरा.
6. रवींद्रनाथ घोष (Rabindranath Ghosh)
रवींद्रनाथ घोष टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और लंबे समय तक उत्तर बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा रहे. हालिया राजनीतिक उठापटक के दौरान उनका नाम पार्टी के भीतर नाराजगी और संभावित असहमति की चर्चाओं में सामने आया. हालांकि उन्होंने खुलकर बगावत नहीं की, लेकिन संगठन में बदलते समीकरणों से उनका नाम लगातार राजनीतिक चर्चाओं में बना रहा.
7. नियामत शेख (Niamat Sheikh)
मुर्शिदाबाद क्षेत्र के प्रभावशाली नेता नियामत शेख का नाम भी टीएमसी के अंदर असंतोष की खबरों में लिया गया. स्थानीय संगठन और टिकट वितरण को लेकर उनके समर्थकों की नाराजगी चर्चा में रही. पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी के बीच उनका नाम उन नेताओं में जुड़ा जिन्हें भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर अहम माना जा रहा है.
8. कार्तिक घोष (Kartik Ghosh)
टीएमसी प्रवक्ता कार्तिक घोष को पार्टी नेतृत्व की आलोचना करने के आरोप में कारण बताओ नोटिस मिला था. बाद में पार्टी ने उन्हें भी छह वर्षों के लिए निलंबित कर दिया. उन्होंने चुनावी हार के बाद संगठनात्मक कमियों और रणनीतिक फैसलों पर सवाल उठाए थे, जिससे वे टीएमसी के भीतर असंतुष्ट खेमे का प्रमुख चेहरा बन गए.
9. डॉ. सुजॉय चक्रवर्ती (Dr. Sujoy Chakraborty)
डॉ. सुजॉय चक्रवर्ती का इस्तीफा टीएमसी के लिए प्रतीकात्मक झटका माना गया. वे पार्टी के बौद्धिक और पेशेवर चेहरों में गिने जाते थे. संगठन के भीतर फैसलों की प्रक्रिया और नेतृत्व शैली को लेकर असहमति की चर्चाओं के बीच उनके अलग होने की खबरें सामने आईं. राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे पार्टी में बढ़ते असंतोष का संकेत बताया.




