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BJP का वो धुरंधर जिसने वामपंथ के गढ़ में बोया था BJP का पहला बीज, कहानी पश्चिम बंगाल के तपन सिकदर की

तपन सिकदर ने वामपंथ के गढ़ में BJP की नींव रखी. आज वही पार्टी बंगाल में सबसे बड़ी ताकत बनने की ओर बढ़ रही है, जानिए पूरी कहानी.

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज भारतीय जनता पार्टी एक मजबूत ताकत बन चुकी है, लेकिन एक समय ऐसा था, जब राज्य में वाम मोर्चा का दबदबा इतना गहरा था कि किसी दूसरी विचारधारा के लिए जगह बनाना बेहद मुश्किल माना जाता था. ऐसे दौर में एक नेता उभरे तपन सिकदर, जिन्होंने चुनौती को मौका बनाया. संघ की पृष्ठभूमि से आए सिकदर ने बूथ स्तर से संगठन खड़ा किया और 1998 में दमदम से जीत हासिल कर बीजेपी को पहली बड़ी पहचान दिलाई. उनकी राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं थी, बल्कि एक वैकल्पिक विचारधारा को जमीन देने की कोशिश थी, जिसने आगे चलकर बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी. चही, बीजेपी अब वहां सरकार बनाएगी. जानिए, क्या बंगाल में बीजेपी का बंगाल में नींव रखने की उनकी कहानी.

1. कौन थे तपन सिकदर और क्यों हैं अहम?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी आज एक मजबूत ताकत के रूप में उभरी है, लेकिन इसकी नींव ऐसे समय में पड़ी थी जब राज्य में वामपंथ का लगभग एकछत्र राज था. उस दौर में तपन सिकदर जैसे नेता ने बीजेपी को “हाशिये” से निकालकर पहचान दिलाने की शुरुआत की. वे केवल एक चुनाव जीतने वाले नेता नहीं थे, बल्कि संगठन खड़ा करने वाले ऐसे चेहरा थे जिन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा किया.

2. वामपंथ के गढ़ में चुनौती कितनी बड़ी थी?

1977 से लेकर 2000 के शुरुआती वर्षों तक वाम मोर्चा का दबदबा इतना मजबूत था कि दूसरी पार्टियों के लिए राजनीतिक स्पेस बेहद सीमित था. ज्योति बसु के नेतृत्व में वामपंथी राजनीति ने न सिर्फ सत्ता, बल्कि समाज और विचारधारा पर भी पकड़ बना रखी थी. ऐसे माहौल में बीजेपी को जगह दिलाना एक कठिन मिशन था, जिसे तपन सिकदर ने स्वीकार किया.

3. संघ से राजनीति तक का सफर कैसे शुरू हुआ?

तपन सिकदर का जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से रहा, जहां उन्होंने संगठन की बारीकियां सीखी. संघ के अनुशासन और नेटवर्क ने उन्हें राजनीतिक जमीन तैयार करने में मदद की. बाद में उन्होंने बीजेपी के साथ सक्रिय राजनीति में कदम रखा, उस समय जब पार्टी के पास बंगाल में न तो मजबूत कैडर था और न ही वोट बैंक.

4. 1990 के दशक में क्या रणनीति अपनाई?

1990 का दशक तपन सिकदर के लिए “निर्माण का दौर” था. उन्होंने शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में संगठन का विस्तार किया, छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं को जोड़ा और बूथ स्तर तक नेटवर्क खड़ा किया. उनकी रणनीति थी - स्थानीय मुद्दों पर फोकस, जनता के बीच सीधा संवाद और वामपंथ के खिलाफ वैचारिक विकल्प तैयार करना. इससे धीरे-धीरे बीजेपी को एक अलग पहचान मिलने लगी.

5. 1998 की जीत क्यों थी ऐतिहासिक?

1998 का लोकसभा चुनाव तपन सिकदर के करियर और बंगाल बीजेपी दोनों के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. दमदम सीट से उनकी जीत को राज्य में बीजेपी की पहली बड़ी सफलता माना जाता है. यह सिर्फ एक सीट की जीत नहीं थी, बल्कि यह संदेश था कि बंगाल में भी पार्टी अपनी जगह बना सकती है. इसी जीत ने आगे के विस्तार का रास्ता खोला.

6. केंद्रीय मंत्री बनने के बाद क्या बदला?

1999 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी, तब तपन सिकदर को केंद्रीय मंत्री बनाया गया. उन्होंने रसायन और उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में काम किया. इससे उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली और बंगाल में बीजेपी को भी “केंद्र की ताकत” से जोड़ने में मदद मिली.

7. किन पुस्तकों में मिलता है जिक्र और क्या कहा गया है?

The Rise of the BJP और The BJP and the Compulsions of Politics in India (लेखक: Christophe Jaffrelot) तथा Party System Changes in India (लेखक: Yogendra Yadav) जैसी पुस्तकों में तपन सिकदर का जिक्र बंगाल में बीजेपी के शुरुआती विस्तार के संदर्भ में आता है. इन किताबों में उन्हें एक “ग्रासरूट ऑर्गेनाइजर”, “लोकल फेस” और “ब्रेकथ्रू लीडर” के रूप में बताया गया है, जिन्होंने वामपंथ के मजबूत किले में पार्टी के लिए रास्ता बनाया.

8. क्या है तपन सिकदर की विरासत?

तपन सिकदर की कहानी सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत की कहानी है. उन्होंने दिखाया कि अगर जमीनी स्तर पर लगातार काम किया जाए, तो सबसे कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी जगह बनाई जा सकती है. आज बंगाल में बीजेपी जिस मुकाम पर खड़ी है, उसकी बुनियाद तपन सिकदर जैसे नेताओं की मेहनत से ही तैयार हुई.

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