Vijay बने CM, लेकिन क्या चलेगी सरकार, 120 विधायकों के साथ भी क्यों बना हुआ है खतरा?
तमिलनाडु में विजय की TVK सरकार बहुमत के बेहद करीब खड़ी है. सहयोगी दलों के सहारे बनी यह सरकार कितनी स्थिर रहेगी? क्या पूरे 5 साल चल पाएगी या फिर जल्द सियासी संकट खड़ा होगा?
तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक दो द्रविड़ दलों-DMK और AIADMK- का दबदबा रहा. सरकारें बदलती रहीं, गठबंधन बनते-बिगड़ते रहे और नेता आते-जाते रहे, लेकिन राजनीतिक ढांचा लगभग वैसा ही बना रहा. इसी स्थिर व्यवस्था के बीच अभिनेता से नेता बने Vijay और उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने एंट्री की. जिसे पहले सिर्फ स्टार पावर समझा जा रहा था, वही अब तमिलनाडु की राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बन गई.
चुनाव नतीजों ने साफ संकेत दिया. TVK ने 108 सीटें जीतीं, जो बहुमत से केवल 10 कम थीं. दूसरी तरफ DMK को बड़ा नुकसान हुआ और AIADMK भी अपनी खोई जमीन वापस नहीं ला सकी.
कैसे किया विजय ने बहुमत का आंकड़ा पार?
जनता ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया. कुछ दिनों की राजनीतिक हलचल और जोड़-तोड़ के बाद विजय की पार्टी ने कांग्रेस, लेफ्ट, VCK और IUML के समर्थन से बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया. अब उनके पास 120 विधायकों का समर्थन है और वे मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में हैं.
असली कहानी चुनाव नतीजों के बाद शुरू हुई. राजनीति में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि सरकार बनाने की रणनीति से तय होता है. AIADMK खेमे में नतीजों के बाद बेचैनी बढ़ गई. 4 मई की रात वरिष्ठ नेताओं की लगातार बैठकें हुईं. Edappadi K Palaniswami (EPS) ने जल्दी समझ लिया कि पारंपरिक राजनीति का ढांचा बदल रहा है.
अगर विजय सत्ता में आते हैं, तो DMK-AIADMK का पुराना दौर खत्म हो सकता है. इसी बीच, राजनीतिक गलियारों में ऐसी खबरें आने लगीं कि विरोधी दलों के बीच संपर्क शुरू हो गया है. बताया गया कि EPS ने DMK नेता Udhayanidhi Stalin से बातचीत की कोशिश की. साथ ही उन्होंने M. K. Stalin की हार पर निजी तौर पर दुख भी जताया.
सालों से कट्टर विरोधी रहे DMK और AIADMK के बीच अचानक नजदीकी की चर्चा ने सबको चौंका दिया. यहां तक कहा गया कि विजय को रोकने के लिए दोनों दल एक साथ आ सकते हैं. DMK के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आए. कुछ नेताओं को लगा कि AIADMK का समर्थन करना रणनीतिक रूप से सही हो सकता है, जबकि अन्य नेताओं ने इसका विरोध किया और कहा कि पार्टी की पहचान ही AIADMK के खिलाफ रही है.
AIADMK के अंदर भी असंतोष बढ़ने लगा. वरिष्ठ नेता C Shanmugam के बारे में खबर थी कि वे कुछ विधायकों को विजय के पक्ष में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. इस दौर में हर विधायक की भूमिका अहम हो गई थी. EPS पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट पहुंचे, जहां करीब 30 विधायक ठहरे हुए थे. वहां उन्होंने पार्टी में एकजुटता बनाए रखने की कोशिश की और संकेत दिया कि जल्द “अच्छी खबर” आ सकती है. हालांकि, पार्टी में टूट की संभावना अभी भी बनी हुई है.
इस बीच एक और बड़ा खुलासा सामने आया. लेफ्ट नेता M. A. Baby ने कहा कि DMK ने AIADMK के साथ गठबंधन की संभावना पर विचार किया था और लेफ्ट से समर्थन भी मांगा था.
आम जनता के लिए यह चौंकाने वाला था. जिन दलों ने दशकों तक एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति की, वे अब एक नए राजनीतिक खिलाड़ी को रोकने के लिए साथ आने पर विचार कर रहे थे.
कांग्रेस ने कैसे बदला पूरा खेल?
लेकिन इसी बीच कांग्रेस ने खेल बदल दिया. जब एंटी-विजय गठबंधन की चर्चा चल रही थी, तभी कांग्रेस ने TVK को समर्थन देने का ऐलान कर दिया. उसके पांच विधायक विजय के साथ आ गए. इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने लेफ्ट नेताओं से भी संपर्क किया.
इस फैसले के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल गए. TVK ने AIADMK के प्रस्तावों को नजरअंदाज कर VCK और अन्य छोटे दलों का समर्थन जुटाने पर ध्यान दिया. 118 के बहुमत तक पहुंचने की होड़ तेज हो गई. अब सवाल उठ रहा है कि क्या टिक पाएगी विजय की सरकार?
क्या टिक पाएगी विजय की सरकार?
VCK और IUML के समर्थन के बाद TVK के पास 120 विधायकों का समर्थन है, जो बहुमत से थोड़ा ही ज्यादा है. यह स्थिति सरकार को स्थिर बनाए रखने के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है. TVK के कई विधायक पहली बार चुने गए हैं और विजय के पास प्रशासनिक अनुभव नहीं है. लेफ्ट पार्टियां सरकार में शामिल नहीं होंगी और बाहर से समर्थन देंगी.
कांग्रेस के पास 5 विधायक हैं, जबकि VCK और IUML के पास 2-2 विधायक हैं. ऐसे में हर वोट की अहमियत बढ़ जाती है. इसके अलावा, लेफ्ट पार्टियों का झुकाव पहले से DMK की ओर रहा है, जिससे विपक्ष में बैठकर भी DMK का प्रभाव बना रह सकता है.
इसी वजह से माना जा रहा है कि विजय की सरकार लगातार दबाव में रह सकती है और राजनीतिक अस्थिरता की संभावना भी बनी रह सकती है. लेकिन यही अनिश्चितता इस पूरे घटनाक्रम को ऐतिहासिक बनाती है. क्योंकि पहली बार तमिलनाडु की राजनीति में पारंपरिक ढांचा टूटता नजर आ रहा है. पुराने समीकरण बदल रहे हैं और राज्य एक नए राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रहा है.




