सुप्रीम कोर्ट ने क्यों ठुकराई बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण रोकने की मांग? मुर्शिदाबाद से गरमाया था माहौल
सुप्रीम कोर्ट ने मुगल सम्राट बाबर के नाम पर देश में कहीं भी मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है.
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मुगल सम्राट बाबर के नाम पर देश में कहीं भी मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता का तर्क था कि बाबर एक हिंदू-विरोधी आक्रमणकारी था, इसलिए उसके नाम पर किसी भी धार्मिक ढांचे की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. हालांकि, अदालत ने सुनवाई के बाद इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलें सुनने के बाद मामले को खारिज कर दिया. अदालत के इस फैसले के बाद धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है.
क्या थी याचिका की मांग?
याचिका में कहा गया था कि भारत में कहीं भी बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद का निर्माण न होने दिया जाए. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम से एक मस्जिद का निर्माण प्रस्तावित है, जो विवाद का कारण बना हुआ है.
मुर्शिदाबाद में क्या हो रहा है?
यह मामला उस समय सुर्खियों में आया जब हुमायू कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को मुर्शिदाबाद में कथित बाबरी मस्जिद के निर्माण की आधारशिला रखी. कबीर ने उस मौके पर कहा कि इस निर्माण को कोई नहीं रोक सकता. उन्होंने कहा कि बंगाल की 37 प्रतिशत मुस्लिम आबादी इसे हर कीमत पर पूरा करेगी. उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए कहा "जैसे कोई भी मंदिर या गिरजाघर बना सकता है, वैसे ही मैं भी बना सकता हूं."
उन्होंने यह भी कहा “मेरे खिलाफ पांच मामले दर्ज किए गए हैं, लेकिन अल्लाह जिसके साथ है उसे कोई नहीं रोक सकता. अदालत ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत के संविधान में लिखा है कि मस्जिद बनाना एक अधिकार है.” बता दें, 2 जनवरी को मुर्शिदाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में हुमायूं कबीर ने मस्जिद के साथ-साथ एक अस्पताल और एक विश्वविद्यालय बनाने की भी घोषणा की थी.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए संकेत दिया कि किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के नाम पर धार्मिक स्थल के निर्माण पर प्रतिबंध लगाने की मांग न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आती. अदालत ने मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया.




