SIR प्रोटेस्ट: क्या है लोहिया का सड़क वाला फॉर्मूला, जिस पर विपक्ष बढ़ रहा है आगे, यूं ही नहीं हर मुद्दे पर हो रहे विरोध-प्रदर्शन?
SIR के खिलाफ विपक्ष के प्रदर्शन के बीच लोहिया के सड़क वाले फॉर्मूले की चर्चा तेज है. जानिए सड़क, संसद और विपक्ष को लेकर उनके विचार आज क्यों अहम हैं.
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष का विरोध अब संसद से निकलकर सड़क तक पहुंच चुका है. 6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के विपक्षी सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च निकालने की कोशिश की. विपक्षी नेताओं की मांग SIR प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से भी जुड़ी रही. पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोका, जिसके बाद कई नेता सड़क पर धरने पर बैठ गए. इसी विरोध के बीच विपक्ष की राजनीति को समझने के लिए समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया का वह विचार फिर चर्चा में है, जिसमें उन्होंने सड़क और संसद के रिश्ते को लोकतंत्र की निगरानी से जोड़ा था.
देश के सबसे बड़े सोशलिस्ट के थिंकर डॉ. राममनोहर लोहिया कस सरकार, संसद और विपक्ष को लेकर विचारों का जिक्र 'लोहिया ग्रंथावली' (Collected Works of Dr. Ram Manohar Lohia) में है.
क्या लोहिया के लिए सड़क सिर्फ प्रदर्शन की जगह थी?
लोहिया की राजनीति में सड़क का मतलब सिर्फ भीड़ जुटाना नहीं था. उनका जोर इस बात पर था कि जनता और विपक्ष सरकार के कामकाज पर लगातार नजर रखें और गलत नीतियों या अन्याय के खिलाफ चुनाव का इंतजार किए बिना आवाज उठाएं.
इसी सोच से उनका चर्चित कथन जोड़ा जाता है. जैसे- “जब सड़कें सुनसान हो जाती हैं, तब संसद आवारा हो जाती है.” इसके साथ उनका एक और विचार था कि “जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं.” दोनों विचारों का मूल भाव यही था कि लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन सक्रिय रहने वाली व्यवस्था नहीं है, बल्कि जनता की लगातार भागीदारी से चलता है.
क्या SIR पर विपक्ष वही सड़क वाला फॉर्मूला अपना रहा है?
SIR के मामले में विपक्ष की रणनीति को इसी राजनीतिक परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है. विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सार्वजनिक रूप से मिलना चाहिए. इसी मुद्दे को लेकर INDIA ब्लॉक ने संसद के भीतर विरोध के साथ सड़क पर प्रदर्शन का रास्ता चुना. 6 अक्टूबर को 19 विपक्षी दलों के सांसदों ने संसद के मकर द्वार से चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया. मार्च को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया. इसके बाद कई नेता वहीं धरने पर बैठ गए.
क्या सड़क पर उतरना विपक्ष की मजबूरी या रणनीति दोनों है?
विपक्ष के लिए सड़क का आंदोलन संसद की बहस से अलग राजनीतिक मंच तैयार करता है. संसद में किसी मुद्दे पर बहस की अपनी प्रक्रिया और सीमाएं होती हैं, जबकि सड़क पर प्रदर्शन के जरिए विपक्ष सीधे जनता के बीच अपना सवाल ले जाता है. SIR के मामले में भी यही दिखाई दे रहा है. विपक्ष चुनाव आयोग तक मार्च, धरना और सार्वजनिक सभाओं के जरिए मुद्दे को लगातार राजनीतिक चर्चा में बनाए रखना चाहता है.
हालांकि, SIR को लेकर विपक्ष के आरोप राजनीतिक दावे हैं. चुनाव आयोग का अपना पक्ष है और वह SIR की प्रक्रिया को संवैधानिक अधिकार और चुनावी व्यवस्था का हिस्सा बताता रहा है.
लोहिया सरकार और विपक्ष के रिश्ते को कैसे देखते थे?
लोहिया के राजनीतिक विचारों में मजबूत विपक्ष लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा था. उनके लिए विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को सत्ता के सामने मजबूती से रखना भी था. संसद में बहस और सड़क पर आंदोलन उनके लिए एक-दूसरे के विरोधी रास्ते नहीं थे. संसद संस्थागत बहस की जगह थी तो सड़क जनता की सीधी राजनीतिक भागीदारी का माध्यम बन सकती थी. इसलिए लोहिया के विचारों को सिर्फ “प्रदर्शन करो” तक सीमित करना सही नहीं होगा. उनके मॉडल में सड़क, संसद और जनता के बीच लगातार संवाद शामिल थी.
संसद में सवाल और सड़क पर आंदोलन, दोनों क्यों जरूरी ?
लोहिया की राजनीति का एक अहम पक्ष यही था कि विपक्ष सिर्फ सदन के भीतर भाषण देकर अपनी भूमिका पूरी नहीं कर सकता. अगर कोई मुद्दा जनता के अधिकारों से जुड़ा है तो उसे जनता के बीच भी ले जाना जरूरी है. इसी वजह से उनका सड़क वाला विचार आज भी विपक्ष के आंदोलनों में दिखाई दे रहा है. उनका मानना था कि सरकार को लगातार जवाबदेह बनाए रखना लोकतंत्र का हिस्सा है और इसके लिए जनता की सक्रियता जरूरी है.
SIR पर विपक्ष की रणनीति कितने मोर्चों पर चल रही है?
SIR को लेकर विपक्ष ने सड़क के साथ संवैधानिक और संस्थागत रास्ते भी अपनाए हैं. INDIA ब्लॉक के नेता चुनाव आयोग के सामने अपनी आपत्तियां रख रहे हैं, राष्ट्रपति से मिलने की कोशिश कर रहे हैं और न्यायिक प्रक्रिया का भी सहारा ले रहे हैं. 6 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान चुनाव आयोग मुख्यालय और जंतर-मंतर के आसपास सुरक्षा बढ़ाई गई थी. विपक्षी सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया. यानी विपक्ष की रणनीति में सड़क का आंदोलन, संसद के भीतर विरोध और संवैधानिक संस्थाओं के सामने अपनी बात रखने के रास्ते एक साथ दिखाई दे रहे हैं.
क्या SIR का मुद्दा सिर्फ मतदाता सूची का मुद्दा रह गया?
राजनीतिक रूप से SIR अब चुनावी प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका पर बहस का मुद्दा भी बन चुका है. विपक्ष का आरोप है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने विपक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है. SIR से जुड़े दस्तावेजों और प्रक्रिया को लेकर न्यायपालिका में भी सवाल उठे हैं. इसलिए इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोप, चुनाव आयोग का पक्ष और न्यायिक प्रक्रिया-तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है.
क्या हर मुद्दे पर सड़क पर उतरने के पीछे लोहिया की वही सोच है?
विपक्ष के मौजूदा प्रदर्शनों को सीधे लोहिया की राजनीति की हूबहू पुनरावृत्ति कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि आज की राजनीतिक और संवैधानिक परिस्थितियां अलग हैं. लेकिन सड़क को लोकतांत्रिक दबाव और जनता की भागीदारी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने की सोच में समानता जरूर दिखाई देती है. SIR पर विपक्ष का लगातार प्रदर्शन इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें संसद के भीतर सवाल उठाने के साथ सड़क पर भी राजनीतिक दबाव बनाए रखने की कोशिश हो रही है.
क्या विपक्ष लोहिया के “जिंदा कौम” वाले विचार को आगे बढ़ा रहा है?
SIR के विरोध में विपक्ष जिस तरह संसद, चुनाव आयोग, न्यायपालिका और सड़क-चारों स्तरों पर मुद्दा उठा रहा है, उसमें लोहिया के उस विचार की झलक देखी जा सकती है कि जनता को सिर्फ चुनाव के समय सक्रिय नहीं रहना चाहिए. लेकिन लोहिया के विचार का दूसरा हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण था- लोकतांत्रिक संस्थाओं में बहस और जवाबदेही. इसलिए SIR पर विपक्ष का आंदोलन केवल सड़क पर प्रदर्शन तक सीमित नहीं है.
असली सवाल यह है कि मतदाता सूची की प्रक्रिया, चुनावी पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों को लेकर उठाए गए सवालों का संस्थागत जवाब क्या मिलता है. यही वह बिंदु है जहां लोहिया का सड़क वाला फॉर्मूला आज के SIR विवाद से जुड़ता है- सड़क सवाल उठाती है, संसद बहस करती है और संस्थाएं जवाब देती हैं.




