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West Bengal SIR: 13 लाख या 50.89 लाख? SIR में मतदाताओं की गिनती पर EC के आंकड़ों में बड़ा झोल

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया के दौरान 18 जनवरी के दो आधिकारिक डेटा सेट सामने आए हैं, जिनमें 13 लाख और 50.89 लाख का बड़ा अंतर दिखता है. इस विरोधाभास ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है.

West Bengal SIR: 13 लाख या 50.89 लाख? SIR में मतदाताओं की गिनती पर EC के आंकड़ों में बड़ा झोल
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( Image Source:  ANI )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी

Updated on: 4 Feb 2026 8:40 AM IST

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया के दौरान ऐसा डेटा सामने आया है, जिसने न सिर्फ चुनाव आयोग (EC) की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक में हलचल मचा दी है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, एक ही तारीख- 18 जनवरी के दो आधिकारिक डेटा सेट, और दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है.

एक तरफ EC का सुप्रीम कोर्ट में दिया गया हलफनामा, जिसमें “6 या उससे अधिक संतान” वाले मामलों में करीब 13 लाख नोटिस की बात कही गई है. दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल के Chief Electoral Officer (CEO) ऑफिस का डेटा, जिसमें इसी कैटेगरी में 50.89 लाख मतदाताओं की बात कही गई है. सवाल सीधा है- आख़िर सच क्या है?

SIR क्या है और बंगाल में क्यों हो रही है इतनी सख्त जांच?

SIR यानी Special Intensive Revision-वोटर लिस्ट को “ज़ीरो से दोबारा तैयार करने” की प्रक्रिया. यह कोई मामूली अपडेट नहीं, बल्कि पिछले 20 साल में पहली बार हो रहा ऐसा बड़ा अभ्यास है. बंगाल में यह प्रक्रिया अक्टूबर 2025 से शुरू हुई, जिसमें हर वोटर से कहा गया कि वह खुद या अपने माता-पिता से जुड़े दस्तावेज़ दोबारा जमा करे. इस बार EC ने सॉफ्टवेयर आधारित जांच का इस्तेमाल किया, जो “logical discrepancies” पकड़ता है. अगर डेटा में कुछ भी अटपटा लगा- तो नोटिस तय.

13 लाख बनाम 50.89 लाख: आंकड़ों में इतना बड़ा फर्क कैसे?

18 जनवरी को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया. इसमें कहा गया कि “6 progeny or more” यानी एक ही व्यक्ति को 6 या उससे ज्यादा वोटर्स ने अपना माता-पिता बताया- ऐसे मामलों में करीब 13.26 लाख नोटिस जारी हुए. लेकिन उसी दिन का बंगाल CEO ऑफिस का डेटा कुछ और ही कहानी कहता है. Indian Express के मुताबिक, CEO चार्ट में इस कैटेगरी में 50,89,519 लोग चिन्हित हैं.

मतलब एक डेटा कहता है 13 लाख और दूसरा कहता है लगभग 51 लाख.

ये “6 progeny or more” वाला मामला आखिर है क्या?

इस कैटेगरी में वे वोटर आते हैं, जिनके दस्तावेज़ों में- एक ही व्यक्ति को 6 या उससे ज्यादा वोटर्स ने अपना पिता/माता बताया. कहीं-कहीं यह संख्या 100 से भी ऊपर निकल गई. EC के मुताबिक, यह शक इसलिए पैदा हुआ क्योंकि कुछ लोग पिछली वोटर लिस्ट से लिंक बनाने के लिए किसी भी नाम को पैरेंट दिखा रहे थे. EC का कहना है कि 'यह सुनिश्चित करना ज़रूरी था कि पश्चिम बंगाल के नागरिकों का डेटा किसी ऐसे नाम से मैप न हो, जहां माता-पिता और संतान का कोई प्रमाणिक रिश्ता न हो.'

EC ने अपनी गिनती कैसे बताई?

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो ब्रेक-अप दिया, वह इस तरह है:

  • 2.06 लाख वोटर्स- 6 से ज्यादा बच्चों से जुड़े
  • 8,682- 10 से ज्यादा
  • 50- 20 से ज्यादा
  • 14-30 से ज्यादा
  • 10-10-40 और 50 से ज्यादा
  • 7-100 से ज्यादा
  • 2-200 से ज्यादा

इन सबको जोड़ने पर आंकड़ा पहुंचता है करीब 13.26 लाख. लेकिन ध्यान देने वाली बात- EC ने खुद कुल संख्या अलग से नहीं लिखी, बस ब्रेक-अप दे दिया.बंगाल CEO ऑफिस के चार्ट में सिर्फ यही कैटेगरी नहीं, बल्कि कई तरह की “logical discrepancies” शामिल हैं.

पिता के नाम में मिसमैच

माता-पिता और वोटर की उम्र में 50 साल या उससे ज्यादा का अंतर, दादा-दादी से उम्र का 40 साल या उससे कम का फर्क. इन सबको मिलाकर कुल संख्या बैठती है 1,16,91,908 वोटर्स, जो पहले राउंड की SIR में नोटिस के दायरे में आए. लेकिन “6 progeny or more” अकेले में ही 50.89 लाख दिखना- यहीं से सवाल उठते हैं.

क्या पहले भी आंकड़े बदले गए थे?

हां. दिसंबर 2025 में बंगाल CEO ने इसी कैटेगरी में 23.64 लाख वोटर्स बताए थे. जनवरी 2026 में वही आंकड़ा बढ़कर 50.89 लाख हो गया. यानि एक महीने में आंकड़ा लगभग दोगुना. इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, ओर से EC से सवाल पूछा गया कि- असली संख्या क्या है? क्या नोटिस की संख्या बदली है? वहीं बंगाल CEO ऑफिस ने टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि 'ये नोटिस EC द्वारा जनरेट किए गए हैं.' मतलब- जिम्मेदारी गेंद की तरह इधर-उधर.

क्या मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है?

SIR की पूरी प्रक्रिया, सभी वोटर्स से फॉर्म भरवाना. कुछ कैटेगरी में नागरिकता जैसे दस्तावेज़ मांगना. इन सबको लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रक्रिया NRC जैसी है और वोटिंग अधिकार पर असर डाल सकती है.

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