Road vs Rail: आने वाले वर्षों में भारत में किससे होगा सस्ता और बेहतर सफर?
भारत में भविष्य का सफर रेल से सस्ता होगा या सड़क से? रेलवे और रोड ट्रांसपोर्ट की लागत, समय, सुविधा, सरकारी निवेश और विशेषज्ञों के आंकड़ों के आधार पर जानिए कौन रहेगा आगे.
अगर आप आने वाले दिनों में सफर का प्लान बना रहे हैं तो आपके सामने दो विकल्प हैं- एक चमचमाती वंदे भारत या दूसरी ओर नया एक्सप्रेसवे, जिस पर कार या लग्जरी बस दौड़ रही है. सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन पहले पहुंचाएगा, बल्कि यह भी है कि आपकी जेब पर किसका असर कम पड़ेगा. आजादी के बाद भारत ने विकास की रीढ़ के तौर पर रेलवे को चुना था, लेकिन बदलते समय के साथ हाईवे और एक्सप्रेसवे का नेटवर्क तेजी से फैल रहा है.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले वर्षों में आम यात्रियों के लिए कौन होगा ज्यादा सस्ता, सुविधाजनक और टिकाऊ विकल्प- रेल या सड़क? आइए, आंकड़ों और रिपोर्टों के जरिए इसका जवाब समझते हैं.
दरअसल, इस बात की चर्चा इसलिए कि भारत में परिवहन व्यवस्था तेजी से बदल रही है. एक ओर एक्सप्रेसवे और ग्रीनफील्ड हाईवे का जाल बिछाया जा रहा है, तो दूसरी ओर रेलवे वंदे भारत, अमृत भारत, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और हाई-स्पीड रेल जैसी परियोजनाओं पर बड़ा निवेश कर रहा है.
इसका जवाब सिर्फ गति से नहीं, बल्कि लागत, क्षमता, लेस पॉवर कंज्यूप्शन, पर्यावरण और सरकार की भविष्य की योजनाओं को देखकर समझा जा सकता है.
रेल यात्रा क्यों मानी जाती है ज्यादा किफायती?
भारत सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) और नीति आयोग की विभिन्न परिवहन संबंधी रिपोर्टों के अनुसार, लंबी दूरी के लिए रेल परिवहन सड़क की तुलना में अधिक ऊर्जा दक्ष और कम लागत वाला माध्यम है. रेलवे एक बार में हजारों यात्रियों को ले जा सकती है, जिससे प्रति यात्री लागत कम हो जाती है. यही वजह है कि 500 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी की यात्रा में रेल अक्सर सड़क परिवहन से सस्ती पड़ती है.
रेलवे का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इसमें ईंधन की खपत प्रति यात्री कम होती है. भारतीय रेलवे लगातार इलेक्ट्रिफिकेशन की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे डीजल पर निर्भरता घट रही है और परिचालन लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.
सड़क परिवहन की सबसे बड़ी ताकत क्या?
दूसरी तरफ, सड़क परिवहन की सबसे बड़ी ताकत इसकी 'डोर-टू-डोर' सुविधा है. जहां रेलवे स्टेशन तक पहुंचने और वहां से गंतव्य तक जाने के लिए अतिरिक्त साधनों की जरूरत पड़ती है, वहीं सड़क सीधे घर से गंतव्य तक पहुंचने की सुविधा देती है.
सरकार ने हाल के वर्षों में एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और आर्थिक गलियारों पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है. बेहतर सड़कें बनने से यात्रा का समय कम हुआ है और निजी वाहन तथा बस सेवाएं पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक बनी हैं.
हालांकि, सड़क यात्रा की लागत पर ईंधन की कीमत, टोल टैक्स और वाहन रखरखाव का सीधा असर पड़ता है. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी सड़क यात्रा को महंगा बना सकती है.
आंकड़े क्या कहते हैं?
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और विश्व बैंक के विश्लेषण बताते हैं कि रेल परिवहन, सड़क परिवहन की तुलना में प्रति यात्री किलोमीटर कम ऊर्जा खर्च करता है और कार्बन उत्सर्जन भी काफी कम होता है. दूसरी ओर, भारत में कुल माल परिवहन का बड़ा हिस्सा अभी भी सड़क मार्ग से होता है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाएं लंबी दूरी के माल और यात्री परिवहन में रेल को प्राथमिकता देती हैं.
राष्ट्रीय रेल योजना (National Rail Plan 2030) का लक्ष्य माल परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी को लगभग 27% से बढ़ाकर 45% तक ले जाना है. इसका उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत कम करना और सड़क पर बढ़ते दबाव को घटाना है.
कौन, किस मायने में बेहतर?
अगर बात 100 से 300 किलोमीटर की यात्रा, अंतिम मील कनेक्टिविटी यानी डोर टू डोर और लचीलेपन की हो तो सड़क परिवहन की उपयोगिता बनी रहेगी. लेकिन 300 से 500 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी के लिए रेल आर्थिक रूप से अधिक आकर्षक विकल्प बन सकती है, खासकर तब जब सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों और आधुनिक रेलवे नेटवर्क का विस्तार होगा.
रेल और रोड ट्रांसपोर्ट सेवा के विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में मुकाबला 'रोड बनाम रेल' का नहीं, बल्कि दोनों के बेहतर तालमेल का होगा. सरकार की PM Gati Shakti जैसी पहल भी मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर जोर देती है, जहां सड़क, रेल, बंदरगाह और हवाई परिवहन एक-दूसरे के पूरक बनें.
भविष्य की तस्वीर साफ संकेत देती है कि दोनों परिवहन माध्यमों की अपनी-अपनी भूमिका रहेगी. छोटी दूरी, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और लचीलापन सड़क की ताकत है, जबकि लंबी दूरी, कम लागत, ऊर्जा दक्षता और पर्यावरण संरक्षण के मामले में रेल की बढ़त दिखाई देती है.
यदि भारत का लक्ष्य सस्ता, टिकाऊ और कम कार्बन उत्सर्जन वाला परिवहन तंत्र विकसित करना है, तो आंकड़े बताते हैं कि लंबी दूरी की यात्रा में रेलवे भविष्य का अधिक मजबूत विकल्प बनकर उभर सकती है, जबकि सड़क परिवहन उसकी सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बनी रहेगी.
भविष्य की दौड़ में आगे कौन?
बता दें कि आजादी के बाद भारत ने परिवहन व्यवस्था की रीढ़ के रूप में रेलवे को चुना और दशकों तक उस पर बड़े पैमाने पर निवेश किया. उस दौर में यह फैसला देश की जरूरतों के अनुरूप था, क्योंकि खाद्यान्न, सैन्य साजो-सामान और जरूरी वस्तुओं को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाने के लिए मजबूत रेल नेटवर्क सबसे प्रभावी विकल्प था.
लेकिन 78 साल बाद तस्वीर बदल चुकी है. बढ़ती आबादी, तेज रफ्तार यात्रा की मांग और एक ही ट्रैक पर अलग-अलग गति वाली ट्रेनों के संचालन ने रेलवे की क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं.
दूसरी ओर, एक्सप्रेसवे और आधुनिक हाईवे नेटवर्क सड़क परिवहन को नई ताकत दे रहे हैं. ऐसे में बहस यह है कि क्या भारत ने उस समय सही प्राथमिकता तय की थी, या फिर अल्पकालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दीर्घकालिक परिवहन रणनीति से समझौता कर लिया? यही सवाल आज रोड बनाम रेल की बहस को फिर से प्रासंगिक बना रहा है.




