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भारत में कैसे शुरू हुई खुफिया एजेंसी Raw? वो गुमनाम योद्धा जिन्हें कभी कोई तमगा नहीं मिला

1962 के युद्ध में खुफिया नाकामी के बाद भारत ने RAW की स्थापना की, जिसने 1971 में बांग्लादेश युद्ध में अहम भूमिका निभाई. यह कहानी उन गुमनाम जासूसों की भी है, जो बिना नाम और पहचान के देश के लिए सब कुछ कुर्बान कर देते हैं.

भारत में कैसे शुरू हुई खुफिया एजेंसी Raw? वो गुमनाम योद्धा जिन्हें कभी कोई तमगा नहीं मिला
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How did the intelligence agency RAW start in India?
( Image Source:  AI Sora )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय10 Mins Read

Updated on: 2 April 2026 6:34 PM IST

हाल ही फिल्म 'धुरंधर' फ्रैंचाइजी आई जिसने एक बार फिर भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी को उजागर किया है. जो हमारे देश के लिए सदियों से एक रक्षक बनी हुई है. कैसे हमारे भारत के रॉ एजेंट देश की सुरक्षा के लिए न सिर्फ खुद को बल्कि अपने पूरे जीवन को कुर्बान कर देते है. लेकिन क्या हमने सोचा कि भारत में इंटेलिजेंस ब्यूरो होते हुए भी हमें रॉ की जरूरत क्यों हुई?. ऐसा क्या हुआ कि भारत में रॉ लॉ लाना पाड़ा. इससे पहले यह जान लेते है कि रॉ की शुरुआत कैसे हुई. जिसके पीछे रमेश्वर नाथ काओ (R.N. Kao) का हाथ रहा और उन्हें भारत का पहला स्पाइमास्टर माना जाता है.

1962 की हार और खुफिया सिस्टम की कमजोरी

शुरुआत 1962 से होती है भारत और चीन के बीच हिमालयी सीमा पर युद्ध छिड़ा. भारतीय सेना ने बहादुरी दिखाई, लेकिन खुफिया जानकारी की भारी कमी ने देश को करारी हार दी. इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB), जो उस समय भारत की एकमात्र प्रमुख खुफिया एजेंसी थी, दोनों घरेलू और विदेशी खुफिया जिम्मेदारी संभाल रही थी. IB ने चीन की सेना की ताकत, उनके आंदोलनों और योजनाओं का सही आकलन नहीं किया. चीनी सैनिकों ने अचानक हमला किया और भारतीय ठिकानों पर कब्जा कर लिया. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सदमे में थे. युद्ध के बाद जांच समितियों ने IB की आलोचना की. विदेशी खुफिया पर ज्यादा फोकस नहीं था. 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ, जिसमें भारत बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन फिर भी पाकिस्तानी सेना की तैयारियों और घुसपैठ की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी. ये दोनों जंगें साबित करती थीं कि भारत को एक अलग, डेडिकेटेड विदेशी खुफिया एजेंसी की जरूरत है, जो सिर्फ पड़ोसी देशों खासकर चीन और पाकिस्तान पर नजर रखे. इंदिरा गांधी 1966 में प्रधानमंत्री बनीं. उन्होंने IB के डिप्टी डायरेक्टर रमेश्वर नाथ काओ को बुलाया. काओ उस समय IB के एक्सटर्नल विंग के हेड थे. वे एक कश्मीरी पंडित परिवार से थे, 1918 में बनारस में जन्मे. शांत स्वभाव, बुद्धिमान और डिस्गाइज में माहिर थे. एक बार वे बांग्लादेश के राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान को चेतावनी देने के लिए पान-सुपारी बेचने वाले के भेष में गए थे. इंदिरा गांधी और उनके प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी.एन. हक्सर जो काओ के पुराने दोस्त भी थे ने फैसला किया कि IB को बांट दिया जाए. घरेलू खुफिया IB के पास रहे, और विदेशी खुफिया के लिए नई एजेंसी बने.

21 सितंबर 1968: RAW का जन्म

21 सितंबर 1968 को रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आई. इसे कैबिनेट सेक्रेटेरिएट के अंदर रखा गया ताकि यह प्रधानमंत्री के सीधे कंट्रोल में रहे. काओ को इसका पहला चीफ बनाया गया. शुरू में यह बहुत छोटी थी केवल 250 कर्मचारी, ज्यादातर IB से आए, और सालाना बजट सिर्फ 2 करोड़ रुपये. नाम 'रिसर्च एंड एनालिसिस विंग'. काओ की एजेंसी में IB से 200 अधिकारी उनके साथ आए, लेकिन कुछ ने उन्हें 'ट्रेटर' कहा क्योंकि वे पुरानी एजेंसी छोड़ रहे थे. यतीश यादव की किताब में लिखा है कि ये 'काओ बॉयज' कहलाए एक छोटा लेकिन डेडिकेटेड ग्रुप, जिसमें के. संकरन नायर, एम.बी.के. नायर, आई.एस. हसनव और पी.एन. बनर्जी जैसे नाम शामिल थे. काओ ने CIA की तरह स्ट्रक्चर बनाया, लेकिन भारत की जरूरतों के हिसाब से ह्यूमन इंटेलिजेंस ,टेक्निकल इंटेलिजेंस और सीक्रेट ऑपरेशन पर फोकस रखा. RAW की पहली प्रिऑरिटीज़ थीं- चीन और पाकिस्तान पर नजर रखना, और पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में स्वतंत्रता आंदोलन को सपोर्ट करना. काओ ने तेजी से काम शुरू किया. उन्होंने विदेशी एजेंसियों से संपर्क बढ़ाया, जासूस भर्ती किए कुछ सिविल सर्विस से, कुछ आर्मी से ट्रेनिंग सेंटर्स बनाए.

1971 का बांग्लादेश युद्ध: RAW की पहली बड़ी परीक्षा

RAW की असली कहानी 1971 में चमकी. पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग चुनाव जीती. लेकिन पश्चिम पाकिस्तान ने सत्ता नहीं सौंपी. पाकिस्तानी सेना ने क्रूर दमन शुरू किया. लाखों लोग मारे गए, करोड़ों शरणार्थी भारत आए. इंदिरा गांधी ने RAW को काम सौंपा. काओ और उनकी टीम ने मुक्ति बहिनी सेनानियों को ट्रेनिंग हथियार और इंटेलिजेंस दी. RAW के जासूस पूर्वी पाकिस्तान में घुसे, पाकिस्तानी सेना की पोजीशन, सप्लाई लाइन्स और योजनाओं की जानकारी जुटाई. काओ खुद मुजीब को चेतावनी देने गए थे. RAW ने भारत की सेना को क्रिटिकल सपोर्ट दिया. जिससे 13 दिनों के युद्ध में पाकिस्तान हार गया और बांग्लादेश आजाद हुआ. यतीश यादव की किताब और B. Raman की 'Kaoboys' में लिखा है कि RAW ने गुप्त रूप से 'मुक्ति बहिनी' को ऑर्गनाइज किया, बॉर्डर पर कैंप बनाए और इंटेलिजेंस शेयर किया. काओ को 'आर्किटेक्ट ऑफ बांग्लादेश' कहा जाने लगा. यह RAW की पहली बड़ी सफलता थी, जो साबित करती थी कि नई एजेंसी काम कर रही है.

रॉ की भर्ती: 'जेंटलमैन स्पाई' से 'पुलिस डोमिनेंस' तक- एक बदलती हुई कहानी

1971 में रॉ के संस्थापक रामनाथ काव ने एक अनोखा प्रयोग शुरू किया था. उन्होंने सीधे कॉलेजों और यूनिवर्सिटी से यंग, एडुकेटेड और टैलेंटेड लोगों को स्पाई ऑर्गनाइजेशन में भर्ती करना शुरू कर दिया. उनका मानना था कि खुफिया काम के लिए नई जनरेशन के दिमाग, लैंग्वेज स्किल और फ्रेश आइडिया की जरूरत है. लेकिन जल्द ही इस प्रयोग के साइड इफेक्ट भी दिखने लगे. कई मामलों में रिश्तेदारों और दोस्तों की एंट्री आसान हो गई, जिसके चलते ऑर्गनाइजेशन को मजाक में 'रिलेटिव एंड एसोसिएट्स वेलफेयर एसोसिएशन' कहने लगे. 1973 के बाद रामनाथ काव ने इस सिस्टम को बदल दिया. अब सीधे भर्ती के लिए इंटेंस कॉम्पिटिशन और कई लेवल के टफ़्फ़ ट्रेनिंग शुरू की गई. नितिन गोखले की किताब 'आरएन काव, जेंटलमैन स्पाईमास्टर' में इसका जिक्र है कि कैंडिडेट्स को सुबह 3 बजे बुलाकर पहले साइकोलोजिस्ट टेस्ट लिया जाता था. उसके बाद इंटरव्यू के कई राउंड होते थे, जिसमें रॉ के सीनियर ऑफिसर, विदेश सचिव और मनोवैज्ञानिक शामिल होते थे. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू के मुताबिक, 1973 में इसी प्रक्रिया से चुने गए जयदेव रानाडे जो बाद में अतिरिक्त सचिव पद से रिटायर हुए बताते हैं कि उनके इंटरव्यू में रॉ प्रमुख आरएन काव भी शामिल थे और इंटरव्यू 45 मिनट तक चला. उनके साथ प्रताप हेबलीकर, चकरू सिन्हा और बिधान रावल भी उसी बैच में आए थे. 1985 से 1990 के बीच 'स्पेशल सर्विस' के तहत कुछ और डायरेक्ट रिक्रूटमेंट हुए, लेकिन बाद में इस प्रयोग को अज्ञात कारणों से बंद कर दिया गया.

रॉ के जासूस वो गुमनाम योद्धा जिन्हें कभी तमगा नहीं मिला

दुनिया के दूसरे खुफिया संगठनों की तरह रॉ के एजेंट्स का सीना कभी मेडल्स या तमगों से सजा नहीं दिखता. उनकी बहादुरी, उनके बलिदान और उनके काम हमेशा छाया में रहते हैं. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी यही हुआ. पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ पहली बड़ी और सफल कार्रवाई रॉ के ही 80 लड़ाकू अधिकारियों ने की थी. ये लोग सीमा पर गुप्त रूप से तैनात थे और उन्होंने दुश्मन के इरादों को पहले ही भांप लिया था. लेकिन इस मुहिम में कुछ जासूस वापस नहीं लौटे. उनकी मौत हुई, लेकिन उनका नाम कभी सार्वजनिक नहीं किया गया. कोई शहीदों की सूची में उनका जिक्र नहीं आया, कोई अंतिम संस्कार का सम्मान नहीं हुआ. यतीश यादव अपनी किताब RAW: A History of India's Covert Operations में इस घटना का मार्मिक वर्णन करते हैं. युद्ध के बाद जब टीवी पर सेना के शहीदों को सम्मानित किया जा रहा था, तब रॉ के उन अधिकारियों ने चुपचाप खड़े होकर अपने साथियों को खोने का दर्द महसूस किया. एक अधिकारी, जिनका कोडनेम 'रहमान' था, ने रॉ के उच्चाधिकारियों से अनुरोध किया कि उन साथियों के बलिदान को कम से कम अंदरूनी तौर पर स्वीकार किया जाए. यह प्रस्ताव तब के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्रा तक पहुंचा, लेकिन उन्होंने इसका विरोध कर दिया।फिर भी बात किसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी तक पहुंच गई. प्रधानमंत्री निवास (7, रेसकोर्स रोड) के एक बंद हॉल में एक गुप्त समारोह आयोजित किया गया. वहां रॉ के 18 अधिकारियों के नाम ज़ोर-ज़ोर से पढ़े गए. उनके कारगिल में किए गए साहसिक कारनामों का विस्तार से बयान किया गया. रॉ के इतिहास में पहली बार इन गुमनाम योद्धाओं को विशेष पदक प्रदान किए गए. वाजपेयी ने रॉ के वरिष्ठ अधिकारियों से हाथ मिलाया और इन अज्ञात वीरों के बलिदान के लिए धन्यवाद व्यक्त किया. समारोह का कोई फोटो नहीं खींचा गया, कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा गया और अगले दिन अखबारों में इसका जरा भी जिक्र नहीं छपा. ये वो पल थे जब रॉ के जासूसों को एहसास हुआ कि उनका काम हमेशा अंधेरे में ही रहेगा बिना किसी बाहरी सम्मान के, बिना किसी सार्वजनिक स्वीकृति के. फिर भी वे चुपचाप अपना काम करते रहे, क्योंकि उनका फर्ज सिर्फ देश की सुरक्षा था, तमगे या तारीफ का नहीं. रॉ के जासूसों की यही सबसे बड़ी खासियत है वो लड़ते हैं, कुर्बानी देते हैं और फिर गुमनामी में लौट जाते हैं, बिना किसी को बताए कि असली हीरो कौन थे.

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