प्रश्नकाल से कैसे अलग है Zero Hour, विपक्ष ने कैसे किया इनका इस्तेमाल, नोटबंदी से लेकर कोविड-मणिपुर हिंसा समेत कई मुद्दों पर घिरी सरकार
प्रश्नकाल और Zero Hour में क्या अंतर है? जानिए संसद में विपक्ष ने नोटबंदी, राफेल, पेगासस, किसान आंदोलन, मणिपुर हिंसा और कोविड जैसे मुद्दों पर सरकार को कैसे घेरा.
संसद का हर सत्र केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि सरकार से जवाबदेही तय करने और जनता की आवाज उठाने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच भी होता है. इसी प्रक्रिया में प्रश्नकाल (Question Hour) और जीरो आवर (Zero Hour) की अहम भूमिका होती है. प्रश्नकाल के दौरान सांसद सरकार से सीधे सवाल पूछकर जवाब मांगते हैं, जबकि जीरो आवर में वे तत्काल जनहित के मुद्दों को सदन के सामने रखते हैं.
अक्सर यह सवाल उठता है कि कौन-सा संसदीय माध्यम अधिक प्रभावी है और क्या कोई राजनीतिक दल जीरो आवर या प्रश्नकाल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है. आइए समझते हैं कि दोनों व्यवस्थाएं कैसे काम करती हैं, इनमें क्या अंतर है और संसदीय जवाबदेही के लिहाज से कौन ज्यादा असरदार माना जाता है.
हालांकि, विपक्षी दल आमतौर पर सरकार को घेरने के लिए Zero Hour का अधिक उपयोग करते हैं, जबकि सत्ता पक्ष के सांसद भी अपने क्षेत्रीय और जनहित के मुद्दे उठाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.
जीरो आवर (Zero Hour) क्या है?
Zero Hour संसद की एक भारतीय संसदीय परंपरा (Indian Innovation) है. यह प्रश्नकाल समाप्त होने के तुरंत बाद शुरू होता है. इसका उद्देश्य ऐसे तात्कालिक जनहित के मुद्दे उठाना है जिन पर तत्काल सरकार का ध्यान आकर्षित करना जरूरी हो.
हालांकि, संविधान में इसका उल्लेख नहीं है. संसद के नियमों (Rules of Procedure) में औपचारिक रूप से शामिल नहीं. यह व्यवस्था 1962 से प्रचलन में है. लोकसभा और राज्यसभा स्पीकर की अनुमति से सवाल उठाए जा सकते हैं. संबंधित को इसका तत्काल जवाब देना होता है. इसका मतलब यह भी नहीं है कि मंत्री तत्काल जवाब देने के लिए बाध्य होते हैं.
प्रश्नकाल (Question Hour) क्या?
प्रश्नकाल सदन की कार्यवाही का पहला घंटा होता है, जिसमें सांसद सरकार से मंत्रालयों के कामकाज पर सवाल पूछते हैं. संबंधित मंत्री को उत्तर देना अनिवार्य होता है. प्रश्न काल के जरिए सांसद लोकसभा और राज्यसभा में तो विधायक विधानसभा और विधान परिषद में तीन तरह के प्रश्न सरकार से पूछ सकते हैं. पहला तारांकित, दूसरा अतारांकित और तीसरा अल्प तारांकित प्रश्न.
देश की संसदीय परंपरा में प्रश्नकाल संसदीय जवाबदेही का सबसे प्रभावी औजार माना जाता है, क्योंकि सरकार को रिकॉर्ड पर जवाब देना पड़ता है.
Zero Hour और Question Hour में अंतर क्या?
प्रश्नकाल (Question Hour) और जीरो आवर (Zero Hour) दोनों ही संसद की कार्यवाही के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन इनके उद्देश्य, प्रक्रिया और प्रभाव में स्पष्ट अंतर है.
प्रश्नकाल सदन की कार्यवाही का पहला घंटा होता है और यह संसद के नियमों के तहत संचालित होता है. इसमें सांसद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पहले से नोटिस देकर सरकार से विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े सवाल पूछते हैं. संबंधित मंत्री के लिए इन प्रश्नों का उत्तर देना अनिवार्य होता है, जिससे सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित होती है.
इसके उलट जीरो आवर प्रश्नकाल समाप्त होने के तुरंत बाद शुरू होता है. यह किसी औपचारिक नियम के बजाय संसदीय परंपरा पर आधारित व्यवस्था है, जिसमें सांसद उसी दिन सीमित नोटिस देकर किसी तत्काल जनहित के मुद्दे को सदन में उठा सकते हैं. जीरो आवर में संबंधित मंत्री का जवाब देना अनिवार्य नहीं होता है.
हालांकि सरकार चाहे तो उसी समय या बाद में प्रतिक्रिया दे सकती है. सरल शब्दों में कहा जाए तो Question Hour सरकार से जवाब मांगने और उसकी जवाबदेही तय करने का औपचारिक मंच है, जबकि Zero Hour अचानक सामने आए महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों पर सरकार और सदन का तत्काल ध्यान आकर्षित करने का माध्यम है.
दोनों में ज्यादा कारगर कौन?
यदि सरकार से जवाबदेही तय करनी हो तो Question Hour अधिक प्रभावी माना जाता है. इसकी ताकत यह है कि मंत्री को इसका जवाब देना पड़ता है. जवाब संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बनता है. पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं. कई बार सरकारी नीतियों में बदलाव या जांच की शुरुआत भी प्रश्नकाल से हुई है.
Zero Hour की ताकत क्या?
इसके जरिए जनप्रतिनिधि अचानक सामने आए मुद्दे तुरंत उठाए जा सकते हैं. मीडिया और सरकार का ध्यान तेजी से आकर्षित होता है. क्षेत्रीय समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर लाने का प्रभावी माध्यम है.
प्रश्नकाल का सबसे ज्यादा लाभ किस दल ने उठाया?
लोकसभा सचिवालय की Rules of Procedure and Conduct of Business और राज्यसभा सचिवालय की Practice and Procedure इसका कोई दलवार रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है. आजाद भारत के संसदीय परंपरा में यह पहलू उभरकर सामने आया है कि जो दल विपक्ष में रहता है, वह अधिक प्रश्न पूछता है क्योंकि उसका प्रमुख दायित्व सरकार से जवाब मांगना और उसे जनता के कटघरे में खड़ा करना होता है. हालांकि, सत्ता पक्ष के सांसद भी प्रश्न पूछते हैं, लेकिन उनकी संख्या और उसका फॅार्मेट अलग होता है.
लोकसभा सचिवालय प्रश्नों का रिकॉर्ड सांसद और मंत्रालय के स्तर पर रखता है, न कि नियमित रूप से दलवार "सबसे ज्यादा उपयोग" की रैंकिंग जारी करता है.
कुल प्रश्नों का रिकॉर्ड क्या?
मोदी सरकार के 2014 से अब तक के कार्यकाल (16वीं, 17वीं और वर्तमान 18वीं लोकसभा तथा इसी अवधि की राज्यसभा) में पूछे गए प्रश्नों का कोई एकीकृत आधिकारिक (Consolidated) आंकड़ा संसद सचिवालय ने जारी नहीं किया है. संसद प्रत्येक सत्र के लिए प्रश्नों का अलग-अलग सांख्यिकीय विवरण (Question Statistical Information) प्रकाशित करती है, लेकिन 2014 से अब तक के सभी सत्रों का संयुक्त कुल उपलब्ध नहीं है.
अभी तक पूछे जा चुके हैं 17.90 लाख सवाल
संसद के डिजिटल (Digital Sansad) के डेटाबेस के अनुसार फरवरी 2026 तक लोकसभा में वर्ष 1952 से अब तक लगभग 11,43,512 तथा राज्यसभा में लगभग 6,43,790 प्रश्न एवं उनके उत्तर दर्ज हैं. हालांकि, ये आंकड़े स्वतंत्र भारत की पूरी संसदीय अवधि के हैं, केवल मोदी सरकार के कार्यकाल के नहीं.
वो मुद्दे जो विपक्ष ने उठाए और सियासी बवाल के कारण बने
लोकसभा एवं राज्यसभा की कार्यवाही (Debates), संसद सचिवालय, PRS Legislative Research, प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), तथा संबंधित संसदीय सत्रों के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार मोदी सरकार (2014–अब तक) के दौरान विपक्ष ने प्रश्नकाल (Question Hour) और शून्यकाल (Zero Hour) में कई ऐसे मुद्दे उठाए, जिन पर संसद के भीतर और बाहर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ. प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:
राफेल लड़ाकू विमान सौदा (2018–19)
कांग्रेस सहित विपक्ष ने कीमत, ऑफसेट पार्टनर और खरीद प्रक्रिया पर प्रश्नकाल व शून्यकाल में सरकार से जवाब मांगा. मामला संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.
नोटबंदी (2016)
विपक्ष ने नोटबंदी के आर्थिक प्रभाव, नकदी संकट, रोजगार और छोटे कारोबार पर असर को लेकर लगातार सवाल उठाए, जिससे कई दिनों तक संसद बाधित रही.
पेगासस जासूसी विवाद (2021)
विपक्ष ने कथित फोन हैकिंग की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की मांग की. यह मुद्दा पूरे मानसून सत्र में छाया रहा.
अडानी–हिंडनबर्ग रिपोर्ट (2023)
विपक्ष ने अडानी समूह और कथित वित्तीय अनियमितताओं पर सरकार से जवाब मांगा और JPC की मांग को लेकर संसद में जोरदार हंगामा किया.
मणिपुर हिंसा (2023)
विपक्ष ने शून्यकाल और प्रश्नकाल के दौरान राज्य की कानून-व्यवस्था, राहत और प्रधानमंत्री के बयान की मांग उठाई. इस मुद्दे पर अविश्वास प्रस्ताव भी लाया गया.
किसान आंदोलन और कृषि कानून (2020–21)
कृषि कानूनों, MSP और किसानों की मौत के मुद्दे पर विपक्ष ने लगातार सरकार को घेरा. बाद में सरकार ने तीनों कानून वापस ले लिए.
कोविड-19 प्रबंधन (2020–21)
ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीन नीति, प्रवासी मजदूरों और स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई प्रश्न पूछे गए, जिन पर व्यापक राजनीतिक बहस हुई.
चीन सीमा विवाद और गलवान (2020)
विपक्ष ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की स्थिति, सेना की तैयारी और सरकार के रुख पर सवाल उठाए.
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना
चुनावी चंदे में पारदर्शिता को लेकर विपक्ष ने संसद में लगातार सवाल उठाए. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया.
जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय
विपक्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित जनगणना कराने, OBC आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे कई बार प्रश्नकाल और शून्यकाल में उठाए.
सबसे ज्यादा सक्रिय कौन रहा?
यदि इन सभी मुद्दों को समग्र रूप से देखें, तो कांग्रेस ने लगभग हर बड़े राष्ट्रीय मुद्दे पर संसद में सरकार को घेरा. इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस (TMC), DMK, CPI(M), RJD, समाजवादी पार्टी (SP) और समय-समय पर AAP, NCP, शिवसेना (उद्धव गुट) भी प्रमुख विपक्षी आवाज बने. लेकिन जो मसले सियासी बवाल के विषय बने उनमें से जातीय जनगणना का मसला आरजेडी ने उठाए थे. शेष मसले कांग्रेस ने उठाए.




