PM Modi का Netherlands दौरा... 300 साल बाद लौटीं चोल साम्राज्य की अनमोल ‘Leiden Plates’, 10 Points में जानें क्या है इतिहास?
PM मोदी के Netherlands दौरे में 300 साल बाद भारत लौटीं चोल साम्राज्य की ऐतिहासिक Leiden Plates. जानें क्या है इन तांबे की पट्टिकाओं का इतिहास.
करीब 1,000 साल पुरानी चोल-युग की तांबे की पट्टिकाएं, जिन्हें दुनिया 'लीडेन प्लेट्स' या Chola Plates के नाम से जानती है, अब भारत लौट आई हैं. नीदरलैंड्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान इन्हें औपचारिक रूप से भारत को सौंपा. ये सिर्फ प्राचीन धातु की प्लेटें नहीं, बल्कि चोल साम्राज्य के प्रशासन, धार्मिक संरक्षण, समुद्री व्यापार और दक्षिण भारत की समृद्ध सभ्यता के सबसे अहम ऐतिहासिक दस्तावेजों में गिनी जाती हैं. भारत 2012 से इनकी वापसी की कोशिश कर रहा था और आखिरकार वर्षों के कूटनीतिक प्रयासों के बाद यह सांस्कृतिक विरासत वापस मिली.
आखिर क्या हैं Chola Plates और क्यों हैं इतनी खास?
Chola Plates दरअसल 11वीं सदी की तांबे की पट्टिकाएं हैं, जिन पर तमिल और संस्कृत में शिलालेख खुदे हुए हैं. ये अभिलेख चोल साम्राज्य के शक्तिशाली शासक राजा राजराजा चोल प्रथम और उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम के दौर से जुड़े हैं. इन प्लेटों में राजा के आदेश, जमीन दान, मंदिरों और बौद्ध मठों को दिए गए अनुदान, टैक्स व्यवस्था और प्रशासनिक फैसलों का विस्तृत रिकॉर्ड दर्ज है. इतिहासकार इन्हें medieval India के “official government records” मानते हैं, क्योंकि ये उस दौर के शासन और सामाजिक व्यवस्था की सटीक जानकारी देती हैं.
इन प्लेटों से चोल साम्राज्य के बारे में क्या पता चलता है?
इन तांबे की प्लेटों से पता चलता है कि चोल शासन बेहद संगठित और प्रशासनिक रूप से उन्नत था. इनमें नागपट्टिनम स्थित एक बौद्ध मठ को दिए गए अनुदानों का जिक्र मिलता है, जो उस दौर में धार्मिक सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दिखाता है. इतिहासकारों के मुताबिक, ये अभिलेख दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मजबूत समुद्री व्यापारिक संबंधों का भी प्रमाण हैं. इससे साफ होता है कि चोल साम्राज्य केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक उसका प्रभाव फैला हुआ था. यही वजह है कि इन्हें भारत की maritime civilisation और global trade legacy का अहम प्रतीक माना जाता है.
इन प्लेटों की संरचना और ऐतिहासिक प्रक्रिया क्या है?
इस संग्रह में कुल 21 तांबे की प्लेटें हैं, जिनका वजन करीब 30 किलोग्राम बताया जाता है. इन्हें एक कांस्य की अंगूठी से बांधा गया है, जिस पर शाही चोल मुहर अंकित है. कहा जाता है कि राजा राजराजा चोल प्रथम ने पहले इन आदेशों को मौखिक रूप से जारी किया था, जिन्हें ताड़ के पत्तों पर लिखा गया. बाद में उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम ने इन्हें स्थायी रूप देने के लिए तांबे की प्लेटों पर खुदवाया. इन प्लेटों को जोड़ने वाली अंगूठी पर राजेंद्र चोल का प्रतीक चिह्न भी बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि ये दस्तावेज मंदिर अर्थव्यवस्था, कर व्यवस्था और उस दौर के प्रशासनिक ढांचे को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्रोत हैं.
भारत से नीदरलैंड्स कैसे पहुंचीं?
18वीं सदी में जब नागपट्टिनम पर डचों का कब्जा था, तब फ्लोरेंटियस कैंपर नामक व्यक्ति इन्हें नीदरलैंड्स ले गया. वह भारत में एक ईसाई मिशन से जुड़ा हुआ था. इसके बाद दशकों तक ये प्लेटें नीदरलैंड्स में सुरक्षित रहीं और केवल शोधकर्ताओं तथा इतिहासकारों को विशेष अनुमति पर इन्हें देखने दिया जाता था. समय के साथ ये तमिल शिलालेख विशेषज्ञों और इतिहासकारों के बीच काफी चर्चित हो गईं. मशहूर तमिल ऐतिहासिक उपन्यास Ponniyin Selvan में इनके उल्लेख के बाद आम लोगों के बीच भी इनकी पहचान बढ़ी. भारत ने 2012 से इनकी वापसी की कोशिश शुरू की थी, जिसे UNESCO की ‘Intergovernmental Committee on Return and Restitution’ के 24वें सत्र में भी समर्थन मिला.
मोदी सरकार इसे इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रही है?
नीदरलैंड्स द्वारा इन “Chola Plates” की वापसी को सिर्फ सांस्कृतिक धरोहर की वापसी नहीं, बल्कि भारत की “civilisational diplomacy” और “heritage nationalism” के बड़े प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है. प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इसे “हर भारतीय के लिए खुशी का पल” बताया. पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार चोरी हुई मूर्तियों, प्राचीन कलाकृतियों, पांडुलिपियों और मंदिरों से जुड़ी विरासत को विदेशों से वापस लाने का बड़ा अभियान चला रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन मूल शिलालेखों के वापस आने से दक्षिण भारतीय इतिहास, चोल प्रशासन और भारत की प्राचीन समुद्री ताकत पर नए शोध को भी बढ़ावा मिलेगा.
10 points: चोला प्लेट्स की ऐतिहासिक अहमियत क्या?
1. नीदरलैंड्स ने 11वीं सदी की चोल-युग की तांबे की पट्टिकाएं भारत को प्रधानमंत्री Narendra Modi की यात्रा के दौरान लौटाईं.
2. इन ऐतिहासिक तांबे की पट्टिकाओं को यूरोप में “Leiden Plates” या “Chola Plates” के नाम से जाना जाता है.
3. ये प्लेटें चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के शासनकाल (985-1014 ईस्वी) से जुड़ी मानी जाती हैं.
4. इस संग्रह में कुल 21 तांबे की प्लेटें हैं, जिनका कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है.
5.प्लेटों पर तमिल और संस्कृत भाषा में शिलालेख खुदे हुए हैं, जिनमें प्रशासनिक और धार्मिक आदेश दर्ज हैं.
6. इन अभिलेखों में नागपट्टिनम के एक बौद्ध मठ को दिए गए अनुदानों और जमीन दान का उल्लेख मिलता है.
7. इतिहासकार इन प्लेटों को medieval India के सबसे महत्वपूर्ण “official government records” में गिनते हैं.
8. प्लेटों को एक कांस्य की अंगूठी से बांधा गया है, जिस पर राजेंद्र चोल प्रथम की शाही मुहर अंकित है.
9. ये कलाकृतियां 18वीं सदी में डच कब्जे के दौरान फ्लोरेंटियस कैंपर द्वारा नीदरलैंड्स ले जाई गई थीं.
10. भारत 2012 से इन प्लेटों की वापसी की कोशिश कर रहा था और आखिरकार वर्षों के कूटनीतिक प्रयासों के बाद ये वापस मिलीं.




