विपक्ष का प्रदर्शन, 150 से 300 सांसदों के शामिल होने का दावा फिर कैसे राहुल गांधी पर ही सिमटी पूरी पिक्चर, क्या INDIA गठबंधन से अलग चल रही कांग्रेस?
SIR के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शन में 300 सांसदों के दावे के बीच राहुल गांधी ही सबसे बड़ा चेहरा क्यों बने? क्या कांग्रेस INDIA गठबंधन से अलग रणनीति पर चल रही है?
6 अक्टूबर को SIR यानी मतदाता सूची के Special Intensive Revision के खिलाफ विपक्षी सांसदों का प्रदर्शन सिर्फ कांग्रेस का कार्यक्रम नहीं था. 30 सितंबर को हुई विपक्षी बैठक में 19 दलों ने मिलकर 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च का फैसला किया था. मकसद था SIR पर सवाल उठाना और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना. मंगलवार को हुए में लेकिन प्रदर्शन के दौरान कैमरों और सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस नेताओं की तस्वीरें दिखाई दीं.
जबकि 6 अक्टूबर को SIR के खिलाफ हुए विपक्षी प्रदर्शन में कई प्रमुख नेता शामिल हुए. इनमें कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और महुआ मोइत्रा, NCP (SP) की सांसद सुप्रिया सुले, RJD के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा और CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास भी प्रदर्शन में मौजूद रहे. प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी प्रमुख चेहरों के तौर पर नजर आए. लेकिन न्यूज चैनलों से लेकर सोशल मीडिया पर बाजी मार ले गए राहुल गांधी. ऐसा क्यों?
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क्या प्रदर्शन सच में साझा था?
प्रदर्शन तो साझा ही था. इसकी शुरुआत विपक्षी साझा कार्यक्रम के तौर पर हुई थी. विपक्ष का दावा था कि करीब 300 लोकसभा और राज्यसभा सांसद चुनाव आयोग से मिलकर SIR और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाना चाहते थे. राहुल गांधी ने भी कहा कि इतने सांसद आयोग से मिलने आए हैं, फिर उन्हें मिलने का मौका क्यों नहीं दिया जा रहा. हालांकि चुनाव आयोग का कहना था कि शाम 4 बजे तक किसी राजनीतिक दल की ओर से तय प्रक्रिया के तहत मुलाकात का अनुरोध नहीं मिला था. यही दावा और जवाब पूरे विवाद का अहम हिस्सा बन गया.
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राहुल ही चेहरा क्यों बने?
इसका सबसे बड़ा कारण प्रदर्शन के दौरान के घटनाक्रम और नजारा. पुलिस बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा लहराते राहुल गांधी, फिर आकाशवाणी भवन के भीतर राहुल गांधी का घुस जाना, प्रियंका गांधी का उनके साथ धरने पर बैठना और कई घंटे तक वहां बने रहना. इन तस्वीरों ने पूरे प्रदर्शन को एक अलग तस्वीर पेश कर दी. बाद में राहुल और प्रियंका की हिरासत ने भी कवरेज को और केंद्रित कर दिया. करीब नौ घंटे तक चला यह गतिरोध मंगलवार शाम तक खबर का मुख्य केंद्र बन गया.
बाकी नेता पीछे क्यों दिखे?
विपक्ष के कई नेताओं को पुलिस ने अलग-अलग समय पर हिरासत में लिया और बाद में छोड़ा. अखिलेश यादव, डेरेक ओ'ब्रायन समेत कई नेता इस कार्रवाई का हिस्सा बने. लेकिन राहुल और प्रियंका आकाशवाणी भवन में लंबे समय तक बैठे रहे. कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा, दीपेंद्र हुड्डा और दूसरे नेता भी बाद में उनके साथ दिखाई दिए. इसलिए कैमरों के सामने लगातार चल रही तस्वीर कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई.
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क्या कांग्रेस अलग राह पकड़ रही?
अभी इसे INDIA गठबंधन से कांग्रेस के अलग होने का प्रमाण कहना जल्दबाजी होगी. 30 सितंबर की बैठक में कांग्रेस ने खुद विपक्षी एकजुटता की रणनीति का हिस्सा बनने की घोषणा की थी और 6 अक्टूबर का मार्च उसी फैसले का परिणाम था. 7 अक्टूबर को भी मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की बैठक बुलाई, जिससे यह संकेत मिलता है कि साझा रणनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
लेकिन एक राजनीतिक फर्क जरूर दिखाई देता है. साझा प्रदर्शन का मुद्दा SIR और चुनाव आयोग था, जबकि कांग्रेस ने राहुल गांधी की मौजूदगी, उनके भाषण और हिरासत को अपने राजनीतिक संदेश का बड़ा हिस्सा बना दिया. यानी गठबंधन का मंच साझा हो सकता है, लेकिन उसके भीतर हर दल अपने राजनीतिक चेहरे और संदेश को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
क्या INDIA में मतभेद बढ़े हैं?
इसके संकेत जरूर हैं. आम आदमी पार्टी ने 6 अक्टूबर के INDIA ब्लॉक मार्च से पहले ही दूरी बना ली थी और कहा था कि वह SIR के खिलाफ अपनी अलग मुहिम चला रही है. AAP और DMK 30 सितंबर की उस बैठक में भी शामिल नहीं हुए थे. 6 अक्टूबर के प्रदर्शन में भी दोनों की गैरमौजूदगी ने विपक्षी एकता की सीमा सामने रख दी.
यानी तस्वीर पूरी तरह एकजुट विपक्ष की भी नहीं है. एक तरफ 19 दलों की बैठक और साझा आंदोलन है, दूसरी तरफ AAP और DMK जैसे दलों की अलग रणनीति है. ऐसे में कांग्रेस का राहुल गांधी को आगे रखना केवल मीडिया की पसंद नहीं, बल्कि कांग्रेस की अपनी राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है.
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मीडिया राहुल पर ही क्यों टिका?
राजनीतिक प्रदर्शनों में मीडिया कवरेज अक्सर उस चेहरे पर ज्यादा टिकता है जिसके पास सबसे ज्यादा दृश्यात्मक और राजनीतिक वजन हो. राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं. जब वही बैरिकेड पर चढ़ते हैं, तिरंगा लहराते हैं, पुलिस कार्रवाई का सामना करते हैं और फिर घंटों धरने पर बैठे रहते हैं, तो बाकी नेताओं की मौजूदगी के बावजूद कहानी का मुख्य विजुअल वही बन जाता है. 6 अक्टूबर की कवरेज में यही हुआ.
कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती?
कांग्रेस के लिए राहुल गांधी का प्रदर्शन सिर्फ SIR का मुद्दा नहीं है. पार्टी इसे चुनावी प्रक्रिया, वोटर लिस्ट और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जोड़ रही है. राहुल ने प्रदर्शन के दौरान चुनाव आयोग से सवाल पूछने और विपक्षी सांसदों से मिलने की मांग को लगातार दोहराया. इससे कांग्रेस को अपने सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरे को एक बड़े लोकतांत्रिक मुद्दे के केंद्र में रखने का मौका मिला.




