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एक तरफ तूफानी हवाएं, दूसरी ओर 30 फीट ऊंची लहरें... 5 अक्टूबर 1864 को ऐसे तबाह हुआ था कलकत्ता, 50 हजार से ज्यादा लोगों ने गंवाई जान

5 अक्टूबर 1864 को कलकत्ता में ऐसा भयानक चक्रवाती तूफान आया, जिसने कुछ ही घंटों में शहर और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचा दी. तूफानी हवाओं और करीब 30 फीट ऊंची समुद्री लहरों के बीच 50 हजार से ज्यादा लोगों की जान जाने का दावा किया जाता है.

एक तरफ तूफानी हवाएं, दूसरी ओर 30 फीट ऊंची लहरें... 5 अक्टूबर 1864 को ऐसे तबाह हुआ था कलकत्ता, 50 हजार से ज्यादा लोगों ने गंवाई जान
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हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत4 Mins Read

Updated on: 5 Oct 2026 11:01 AM IST

सोचिए, एक ऐसा तूफान जो कुछ ही घंटों में समुद्र से उठे और देखते ही देखते जमीन पर तबाही मचा दे. 5 अक्टूबर 1864 को कलकत्ता और बंगाल के तटीय इलाकों में कुछ ऐसा ही हुआ था. सुबह की शुरुआत तेज हवाओं के साथ हुई, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर में यह हवा एक बेहद खतरनाक चक्रवात का रूप ले लेगी. इसके बाद समुद्र की उठती लहरों और तूफानी हवाओं ने मिलकर ऐसी तबाही मचाई कि हजारों लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई.

इतिहास में दर्ज इस आपदा को कलकत्ता के सबसे विनाशकारी चक्रवातों में गिना जाता है. अलग-अलग रिपोर्टों में मृतकों की संख्या अलग बताई गई है. कुछ ऐतिहासिक रिकॉर्ड करीब 50 हजार मौतों का जिक्र करते हैं. यानी एक बात साफ है कि यह सिर्फ एक तूफान नहीं था, बल्कि उस दौर की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों में से एक था.

बंगाल में कैसे आया था चक्रवात?

5 अक्टूबर की सुबह बंगाल के तटीय हिस्से में मौसम अचानक बिगड़ने लगा. पूर्व से उत्तर-पूर्व दिशा की ओर से तेज हवाएं चल रही थीं. शुरुआत में यह एक सामान्य आंधी जैसी लग रही थी, लेकिन हवा की रफ्तार तेजी से बढ़ती चली गई. कुछ ही घंटों में हालात इतने खराब हो गए कि पूरा इलाका भयंकर चक्रवाती तूफान की चपेट में आ गया. यह चक्रवात उत्तरी अंडमान के पश्चिमी हिस्से के आसपास बना था और इसके बाद बंगाल की खाड़ी में तेजी से आगे बढ़ा. तूफान के साथ समुद्र में भी जबरदस्त हलचल हुई. देखते ही देखते विशाल लहरें तटीय इलाकों की ओर बढ़ने लगीं.

कितनी फीट ऊंची थी लहरें?

इस तूफान की सबसे डरावनी तस्वीर समुद्र से उठी विशाल लहरों ने दिखाई. जब समुद्र की करीब 30 फीट ऊंची लहरें तट की ओर बढ़ीं, तब लोगों के पास खुद को बचाने के लिए न कोई पुख्ता चेतावनी थी और न ही सुरक्षित जगह तक पहुंचने का कोई इंतजाम. कुछ ही समय में पानी रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ने लगा और चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई. उस दौर में आज जैसी मौसम की जानकारी या राहत-बचाव की सुविधाएं मौजूद नहीं थीं, इसलिए बहुत से लोगों को खतरे का अंदाजा तब हुआ, जब तूफान सिर पर आ चुका था. देखते ही देखते कई लोग अपने घरों और आसपास के इलाकों में फंस गए और उनके सामने बच निकलने के रास्ते बंद होते चले गए.

हवा और पानी ने मिलकर मचाई भारी तबाही

तूफान की रफ्तार बढ़ते ही तटीय बंगाल की तस्वीर पूरी तरह बदल गई. एक ओर तेज हवाएं थीं, तो दूसरी तरफ समुद्र का पानी लगातार अंदर की ओर बढ़ रहा था. देखते ही देखते कई घर और इमारतें इसकी चपेट में आने लगीं. पेड़ उखड़कर जमीन पर गिर गए और जगह-जगह ढांचे टूटने लगे. जिन घरों को लोग अपने लिए सुरक्षित ठिकाना समझ रहे थे, वही कुछ समय बाद खतरे में बदल गए.

चक्रवात का कहर सिर्फ कलकत्ता तक नहीं रुका. बंगाल के तटीय हिस्सों और आसपास के कई इलाकों में भी इसका असर पहुंचा. पानी और तेज हवाओं के बीच हालात इतने बिगड़ गए कि बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई. हजारों परिवारों के सामने एक ही झटके में घर, जरूरी सामान और कमाई का साधन गंवाने का संकट खड़ा हो गया. तूफान गुजर गया, लेकिन पीछे छोड़ गया ऐसी तबाही, जिससे उबरने में लोगों को लंबा वक्त लगा.

कितने लोगों की गई जान?

चक्रवात के बाद जब तबाही का हिसाब लगाने की कोशिश हुई, तो सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर इस तूफान ने कितनी जिंदगियां छीन लीं? इसका सटीक जवाब आज भी सामने नहीं आता है. उस समय की सरकारी रिपोर्टों में मृतकों की संख्या करीब 50 हजार से ज्यादा बताई गई थी. उस दौर में न तो आज जैसी तेज कम्युनिकेशन सिस्टम था और न ही हर इलाके में घटनाओं का रिकॉर्ड आसानी से दर्ज हो पाता था. खासकर गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में हुई मौतों का पूरा ब्यौरा जुटाना बेहद मुश्किल था. यही कारण है कि 1864 के इस विनाशकारी चक्रवात में जान गंवाने वाले लोगों की वास्तविक संख्या को लेकर इतिहास में आज भी अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं.

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