क्या है Disenfranchise का मतलब, जिसे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने किया इस्तेमाल, किस मामले में और क्यों किया यूज?
‘Disenfranchise’ शब्द का मतलब क्या है और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने SIR विवाद के बीच इसका इस्तेमाल क्यों किया? जानिए वोट के अधिकार, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और लाखों मतदाताओं से जुड़े पूरे मामले को आसान भाषा में.
हैदराबाद में रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने वोट के अधिकार और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने को लेकर अहम टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके जरिए लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाए और उन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया जाए, अपने आप में मनमानी है. यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है. अपने इस बयान के दौरान उन्होंने disenfranchising शब्द का इस्तेमाल किया. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस शब्द का मतलब क्या होता है?
जस्टिस भुइयां ने यह बात हैदराबाद स्थित NALSAR में कही. उन्होंने कहा कि वोटरल लिस्ट से बड़ी तादाद में लोगों को बाहर करने को सही ठहराने के लिए किसी भी तरह की दलील पर्याप्त नहीं हो सकती. उनके मुताबिक, इस तरह की कार्रवाई संविधान की मूल भावना के लिए गंभीर खतरा है.
क्या है Disenfranchise का मतलब?
‘Disenfranchise’ शब्द का मतलब किसी व्यक्ति को उसके कानूनी अधिकार, किसी खास अधिकार या सुविधा से वंचित करना है. इसका सबसे आम इस्तेमाल किसी व्यक्ति से वोट देने का अधिकार छीनने के अर्थ में होता है. यह शब्द अंग्रेजी में पहली बार 17वीं सदी में इस्तेमाल हुआ था.
‘Franchise’ का मूल अर्थ किसी व्यक्ति को बंधन या कंट्रोल से आजादी देना था. वहीं, ‘disenfranchise’ का इस्तेमाल किसी व्यक्ति से कानूनी अधिकार छीनने के लिए किया जाता है. आज इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से वोट देने के अधिकार से वंचित करने या किसी हाशिए पर मौजूद समूह की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को कमजोर करने के संदर्भ में किया जाता है.
क्या होले जस्टिस भुइयां?
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर छात्रों और युवाओं के बीच व्यापक आंदोलन चल रहे हैं. इसी बीच चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा जारी है. दी गई जानकारी के मुताबिक, SIR के तहत अब तक करीब 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता. संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि कुछ नागरिकों को वोट देने का अधिकार हो और कुछ नागरिकों को यह अधिकार न मिले.
दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना मनमानी?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के चलते बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया जाता है और उन्हें अपने ही देश में ऐसे नागरिक बना दिया जाता है, जिनके पास मतदान का अधिकार नहीं है, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 के खिलाफ होगी. अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार से संबंधित है.
जस्टिस भुइयां के मुताबिक, लाखों भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित कर उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बना देने वाली कोई भी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी. उन्होंने कहा कि इसे सही ठहराने के लिए कितनी भी दलीलें दी जाएं, वे पर्याप्त नहीं होंगी. उनके अनुसार, ऐसी कार्रवाई संविधान की मूल भावना पर सीधा असर डालती है.
कोई अदालत इसे नहीं ठहरा सकती गलत..
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) से किसी को भी छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा, “कोई भी अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत भी इसे सही नहीं ठहरा सकती. संविधान से ऊपर कोई नहीं है.” उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार देश की लंबे समय तक चली आजादी की लड़ाई से जुड़ा हुआ है.
वोट का अधिकार का क्या है मतलब?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदाता बनने का अधिकार सिर्फ एक वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह संविधान से जुड़ा अधिकार है और संविधान की ‘Basic Structure’ यानी मूल ढांचे के दायरे में आता है. उन्होंने कहा कि नागरिकता और मतदान का अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता. उनके मुताबिक, वोट देने का अधिकार नागरिकता का मूल हिस्सा है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारत के किसी आम नागरिक के लिए देश के शासन में भाग लेने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका मतदान है.
क्या है Universal Adult Franchise?
‘Universal Adult Franchise’ यानी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का मतलब है कि हर जवान नागरिक को वोट देने का अधिकार मिले. इसमें लिंग, नस्ल, धर्म, आर्थिक स्थिति, शिक्षा या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता. हालांकि, इसमें कुछ सीमित और तर्कसंगत अपवाद हो सकते हैं.




