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मणिपुर हिंसा में अबतक 640 मौतें, राहत शिविरों में भी सुरक्षित नहीं लोग, हो रही Unnatural Deaths... सुप्रीम कोर्ट ने किससे मांगा जवाब?

मणिपुर में पिछले 3 साल से हिंसा जारी है. जिसमें 600 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है और कई लोग बेघर हो गए हैं जो राहत शिविरों में रहने को मजबूर है. अब इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है.

Manipur Violence
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विशाल पुंडीर
Edited By:विशाल पुंडीर5 Mins Read

Updated on: 18 Sept 2026 9:53 AM IST

मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा के बाद बेघर लोगों के लिए बनाए गए राहत शिविरों में हुई अननेचुरल मौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य के मुख्य सचिव से इन मौतों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है. अदालत ने शिविरों में रह रहे आंतरिक रूप से बेघर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया.

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की सदस्यता वाली पीठ मणिपुर हिंसा के बाद की स्थिति से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. अदालत ने राहत एवं पुनर्वास की निगरानी के लिए पूर्व जम्मू-कश्मीर मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट का अध्ययन करते हुए पाया कि राज्य के राहत शिविरों में रह रहे 25 आंतरिक रूप से बेघर लोगों की अननेचुरल मौतों का उल्लेख किया गया है. इनमें एक मौत यौन उत्पीड़न से जुड़ी बताई गई है.

क्यों नाराज हुआ सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि समिति की ओर से मौतों से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगे जाने के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है. अदालत के मुताबिक, समिति ने 11 जून को राज्य के मुख्य सचिव से राहत शिविरों में हुई मौतों के बारे में जानकारी मांगी थी. सरकार की ओर से कुछ विवरण दिए गए, लेकिन उनमें आवश्यक जानकारियां मौजूद नहीं थीं. इसके बाद समिति ने 4 जुलाई को दोबारा जानकारी मांगी, लेकिन अदालत की सुनवाई तक पूरा विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया था.

क्या है मणिपुर सरकार से कोर्ट का सवाल?

मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार से सवाल किया "राहत शिविरों में 25 विस्थापित लोगों की अप्राकृतिक मौत हुई है. समिति को मिली एक घटना बेहद चौंकाने वाली है. यौन उत्पीड़न के कारण एक पीड़िता की मौत हो गई है और यह जानकारी 4 जुलाई को मांगी गई थी. यह जानकारी अभी तक क्यों नहीं दी जा रही है?" राज्य की ओर से पेश वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि मामले को तत्काल देखा जाएगा. उन्होंने कहा "मैं इस पर तुरंत कार्रवाई करूंगा. हम इसे जल्द से जल्द निपटाएंगे."

राहत शिविरों में मौतों का आंकड़ा कितना?

सुनवाई के दौरान पीठ ने राहत शिविरों में हुई मौतों से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख किया. अदालत के अनुसार, नोडल अधिकारी ने समिति को बताया था कि आठ जिलों में बनाए गए राहत शिविरों में कुल 640 मौतें हुई हैं. इनमें 34 मौतों को अननेचुरल बताया गया. अदालत के सामने रखी जानकारी के मुताबिक, 20 मामलों में पोस्टमार्टम कराया गया, जबकि 25 मौतों के संबंध में आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें से चार मामलों में अभियोजन की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी गई.

34 अननेचुरल मौतों में सिर्फ 20 पोस्टमार्टम क्यों?

पीठ ने खास तौर पर सवाल उठाया कि जब 34 मौतों को अननेचुरल बताया गया है तो केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम क्यों कराया गया. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर अप्राकृतिक मौतों के कारणों को भी स्पष्ट किया जाए. अदालत यह जानना चाहती है कि जिन मौतों को अप्राकृतिक माना गया, उनमें मृत्यु की परिस्थितियां क्या थीं और संबंधित मामलों में अब तक क्या कार्रवाई हुई है.

मुआवजे की रकम पर क्या सवाल?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राहत शिविरों में रहने वाले आंतरिक रूप से बेघर लोगों की अननेचुरल मौतों के मामलों में उनके परिवारों को दिए गए मुआवजे पर भी सवाल उठाया. पीठ ने मुआवजे की रकम में कथित असमानता का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने विशेष रूप से पूछा कि कुछ मामलों में मृतकों के परिजनों को केवल 20,000 से 30,000 रुपये की राशि ही क्यों दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा "34 मामलों के बजाय केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम क्यों किया गया. इसी तरह, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार अननेचुरल मौतों के कारणों को भी स्पष्ट किया जाए. राज्य सरकार को यह भी बताना होगा कि राहत शिविरों में शरण लिए हुए आंतरिक रूप से बेघर लोगों की अननेचुरल मौत के परिजनों को मात्र 20,000 से 30,000 रुपये की मामूली राशि ही क्यों दी गई है."

कौन कर रहा राहत शिविरों की निगरानी?

मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा के बाद बड़ी संख्या में लोग बेघर हुए थे. उनकी राहत, पुनर्वास और अन्य जरूरतों की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जम्मू-कश्मीर मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की थी. समिति समय-समय पर अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करती रही है. इसी प्रक्रिया के तहत सामने आई रिपोर्ट में राहत शिविरों में हुई मौतों का विवरण भी शामिल था. अब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से इन मौतों, पोस्टमार्टम, आपराधिक मामलों और मुआवजे से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराने को कहा है.

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