ममता बनर्जी ने जो बोया, वही काट रहीं! कांग्रेस से निकली फायरब्रांड लीडर की "बुझती" कहानी
कांग्रेस की युवा नेता से लेकर बंगाल की सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेता बनने तक ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक सफर संघर्ष, बगावत, आंदोलन और सत्ता के इर्द-गिर्द घूमता रहा है।
कभी कांग्रेस की सबसे आक्रामक युवा नेता मानी जाने वाली ममता बनर्जी ने शायद यह नहीं सोचा होगा कि जिस राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ लड़कर वह सत्ता तक पहुंची, एक दिन वही सवाल उनकी अपनी सरकार के सामने खड़े होंगे. यह कहानी सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति के उस लंबे दौर की है, जहां संघर्ष ने सत्ता को जन्म दिया और सत्ता ने नए संघर्षों को. कॉलेज की छात्र राजनीति से निकलकर राजीव गांधी की भरोसेमंद नेता बनने तक, फिर कांग्रेस से बगावत कर तृणमूल कांग्रेस खड़ी करने और 34 साल पुराने वाम किले को ढहा देने तक ममता का सफर सभी के लिए चौंकाने वाला रहा.
दरअसल, ममता ने वामपंथ पर कैडर राज, राजनीतिक हिंसा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाकर जनता का समर्थन जुटाया. उन्होंने कम्युनिस्टों को उसी के हिंसक राजनीति के अंदाल में सियासी जवाब भी दिया, लेकिन सत्ता में डेढ़ दशक पूरे करने के बाद आज विपक्ष उन्हीं आरोपों के साथ ममता को घेर रहा है. इसलिए, बंगाल की राजनीति में एक सवाल बार-बार उठ रहा है- क्या ममता बनर्जी आज वही काट रही हैं, जो उन्होंने कभी बोया था?
पॉलिटिक्स में ममता की एंट्री कब?
पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर 1970 के दशक में छात्र राजनीति से शुरू हुआ. वह युवा कांग्रेस से जुड़ीं और जल्द ही अपनी आक्रामक शैली, बतौर स्ट्रीट फाइटर्स सड़क पर संघर्ष करने की क्षमता और संगठनात्मक सक्रियता के कारण पहचान बनाने लगीं. बंगाल में उस समय वामपंथी राजनीति का दबदबा था और कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही थी. ऐसे में ममता ने खुद को ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जो सीधे जनता के बीच जाकर लड़ाई लड़ सकती थीं.
यही वजह थी कि कम उम्र में ही वह कांग्रेस के भीतर उभरते चेहरों में शामिल हो गईं. उनकी राजनीति का मूल आधार जन आंदोलन, जनसंपर्क और सत्ता के खिलाफ संघर्ष रहा, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी सियासी पूंजी बनी.
राजीव गांधी की नजर में कैसे आईं ममता?
1984 का लोकसभा चुनाव ममता बनर्जी के करियर का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है. उन्होंने बंगाल की राजनीति के दिग्गज वाम नेता और सांसद रहे Somnath Chatterjee को हराकर राष्ट्रीय स्तर पर सनसनी पैदा कर दी. चटर्जी को हराने के बाद उन्हें जॉयंट किलर कहा जाने लगा. उस दौर में युवा चेहरों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे राजीव गांधी ने ममता की राजनीतिक क्षमता को पहचाना. उनकी संघर्षशील छवि और जनाधार ने उन्हें राजीव गांधी के करीबी युवा नेताओं की श्रेणी में ला खड़ा किया. कांग्रेस संगठन में भी उन्हें तेजी से जिम्मेदारियां मिलने लगीं और वह राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने लगीं.
तत्कालीन पीएम राजीव गांधी भी ममता पर जॉयंट किलर बनने के बाद से आंख मूंदकर भरोसा करने लगे थे. राजीव गांधी के करीब पहुंचने की वजह से दिल्ली लॉबी में ममता की धमक सुनाई देने लगी थी. उनके इस अंदाज और तेवर की वजह से बंगाल कांग्रेस के नेता सियासी जलन भी रखने लगे थे.
कांग्रेस में क्यों बढ़ा विरोध?
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी आक्रामक राजनीति थी, लेकिन यही बात कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को असहज करती थी. बंगाल कांग्रेस के भीतर उस समय कई गुट सक्रिय थे. ममता का टकराव समय-समय पर प्रियरंजन दास मुंशी, सोमेन मित्रा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रणब मुखर्जी और राज्य कांग्रेस के अन्य प्रभावशाली नेताओं से देखने को मिला. ममता का आरोप था कि कांग्रेस नेतृत्व बंगाल में वामपंथ के खिलाफ गंभीर लड़ाई नहीं लड़ना चाहता और दिल्ली में बैठे नेता राज्य की वास्तविक राजनीतिक परिस्थितियों को नहीं समझते. उन्हें लगता था कि पार्टी के भीतर एक ऐसा समूह मौजूद है जो उनके बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता है. धीरे-धीरे यह असंतोष वैचारिक और संगठनात्मक संघर्ष में बदल गया. वह अपने ही पार्टियों के नेताओं पर ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार से मिले होने का आरोप लगाने तक से भी नहीं चूंकती थी.
कांग्रेस छोड़ने का फैसला क्यों लिया?
1990 के दशक के मध्य तक ममता बनर्जी इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी थीं कि कांग्रेस के भीतर रहते हुए वह बंगाल में वाम मोर्चे को चुनौती नहीं दे सकतीं. उनका मानना था कि कांग्रेस की राज्य इकाई और केंद्रीय नेतृत्व दोनों ही निर्णायक संघर्ष से बच रहे हैं. लगातार मतभेदों और संगठनात्मक खींचतान के बाद 1997 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया. यह केवल पार्टी छोड़ना नहीं था, बल्कि बंगाल में एक वैकल्पिक विपक्षी राजनीति की शुरुआत थी. ममता ने खुद को कांग्रेस की परंपरागत राजनीति से अलग एक जनआंदोलन आधारित नेता के रूप में पेश करना शुरू कर दिया.
तृणमूल कांग्रेस का जन्म कैसे हुआ?
कांग्रेस पार्टी के कामकाज के तरीकों से नाराज और राजीव गांधी के निधन के बाद ममता बनर्जी को पार्टी के नेताओं ने दिल्ली से कोलकाता तक साइडलाइन कर दी गईं. इससे निराश ममता ने 1 जनवरी 1998 को All India Trinamool Congress के गठन का एलान कर दिया. "तृणमूल" का अर्थ जमीनी स्तर या ग्रासरूट्स से जुड़ा हुआ है. पार्टी का मूल संदेश था कि बंगाल में वामपंथी शासन के खिलाफ एक आक्रामक, जनाधारित और संघर्षशील विकल्प तैयार किया जाए. शुरुआती वर्षों में ममता ने केंद्र में अलग-अलग गठबंधनों के साथ काम किया, लेकिन बंगाल में उनका मुख्य लक्ष्य केवल एक था— वाम मोर्चे की सत्ता को खत्म करना. नंदीग्राम, सिंगूर और भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने उनकी पार्टी को गांव-गांव तक पहुंचा दिया.
कांग्रेसी नेता से ‘एंटी-लेफ्ट’ कैसे बनीं?
दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी मूल रूप से कांग्रेस की राजनीति से निकलीं, लेकिन उनका राजनीतिक व्यक्तित्व पूरी तरह वाम-विरोधी संघर्ष पर खड़ा हुआ. उन्होंने वामपंथ पर राजनीतिक हिंसा, कैडर राज, बूथ कब्जाने और विपक्ष को दबाने के आरोप लगाए. सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान उन्होंने खुद को गरीबों, किसानों और विस्थापन विरोधी राजनीति के चेहरे के रूप में स्थापित किया. कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहीं से उनकी राजनीति ने वैचारिक से ज्यादा आंदोलनकारी और जनभावनाओं पर आधारित रूप ले लिया.
ममता का सियासी फॉर्मूला क्या?
ममता बनर्जी का राजनीतिक फॉर्मूला तीन स्तंभों पर आधारित रहा- व्यक्तिगत करिश्मा, अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोटों का मजबूत गठबंधन तथा विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण. उन्होंने खुद को "दीदी" की छवि में पेश किया, जो सीधे जनता से संवाद करती है और सत्ता प्रतिष्ठान से टकराने से नहीं डरती. उनका मॉडल किसी वैचारिक ढांचे से ज्यादा चुनावी सामाजिक गठबंधन पर आधारित था. उन्होंने बंगाल की राजनीति को वर्ग संघर्ष से पहचान आधारित और कल्याणकारी राजनीति की ओर मोड़ दिया.
क्यों लगे अल्ट्रा वामपंथी होने के आरोप?
2011 में 34 साल पुराने वाम शासन को हटाकर ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन सत्ता में आने के बाद उन पर वही आरोप लगने लगे जिनके खिलाफ वह लड़कर आई थीं. विपक्ष का आरोप रहा कि राज्य में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की जगह एक-दलीय प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश हुई. पंचायतों से लेकर स्थानीय निकायों तक राजनीतिक संघर्ष अधिक तीखा होता गया.
बीजेपी के उभार के साथ यह टकराव और बढ़ा. आलोचकों ने कहा कि ममता ने विपक्ष के लिए राजनीतिक जगह लगातार सीमित करने की कोशिश की, जबकि समर्थकों का तर्क रहा कि यह भाजपा और अन्य दलों के आक्रामक विस्तार का जवाब था.
वाम मोर्चे के खिलाफ ममता का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार था- कैडर संस्कृति, राजनीतिक हिंसा और प्रशासन के राजनीतिक उपयोग का आरोप. लेकिन समय के साथ तृणमूल कांग्रेस पर भी बूथ हिंसा, विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमले, स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक दबदबे और राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगने लगे. यही कारण है कि कई राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि बंगाल में सत्ता बदली, लेकिन राजनीतिक संस्कृति पूरी तरह नहीं बदली. सत्ता संचालन के कई तौर-तरीकों में निरंतरता दिखाई दी.
TMC प्रमुख पर लाठीचार्ज कब-कब?
ममता बनर्जी का राजनीतिक करियर सड़क पर संघर्ष और आंदोलनों से भरा रहा है. 1980 और 1990 के दशक में वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान उन्हें कई बार पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा. 16 अगस्त 1990 को कोलकाता के हाजरा मोड़ पर युवा कांग्रेस के एक प्रदर्शन के दौरान उन पर कथित रूप से हमला हुआ, जिसमें उनके सिर पर गंभीर चोट लगी और यह घटना उनकी राजनीतिक पहचान का बड़ा प्रतीक बनी.
1993 के राइटर्स बिल्डिंग मार्च के दौरान भी पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज हुआ. भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों, विशेषकर सिंगूर (2006) और नंदीग्राम (2007) के दौर में उन्हें कई बार हिरासत में लिया गया. विपक्षी नेता रहते हुए गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई को उन्होंने अपने राजनीतिक संघर्ष की ताकत में बदल दिया.
अब स्ट्रीट फाइटर के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी और पहली चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस को उत्तराधिकार, भ्रष्टाचार के आरोपों, परिवारवाद, संगठनात्मक थकान और बीजेपी की चुनौती के बीच प्रासंगिक बनाए रखना है. दूसरी चुनौती यह है कि वह अपनी पार्टी को केवल एक नेता केंद्रित संगठन से आगे ले जाकर संस्थागत स्वरूप देने की है.
तीसरी चुनौती बंगाल में लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और प्रशासनिक विश्वसनीयता को लेकर बनी धारणा है. यदि वह इन मोर्चों पर संतुलन नहीं बना पातीं, तो वही राजनीतिक चक्र उनके खिलाफ काम कर सकता है जिसने कभी उन्हें बंगाल की सबसे शक्तिशाली नेता बनाया था.
कैसे ममता खुद बन गईं परिवारवादी?
ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर में लंबे समय तक परिवारवाद की राजनीति का विरोध किया और खुद को एक ऐसी नेता के रूप में पेश किया जो संगठन और संघर्ष के दम पर आगे बढ़ी हैं. लेकिन समय के साथ तृणमूल कांग्रेस में उनके भतीजे Abhishek Banerjee का बढ़ता प्रभाव विपक्ष को परिवारवाद का आरोप लगाने का मौका देता रहा. अभिषेक पहले सांसद बने, फिर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और संगठन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए. उम्मीदवार चयन से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक उनकी भूमिका लगातार बढ़ी.
यही वजह है कि जिस शुभेंद्र बनर्जी सहित दर्जनों कांग्रेस और वापमपंथी नेताओं को टीएमसी का नेता बनाया, आज वहीं उनका खुलकर विरोध कर रहे हैं. शुभेंदु तो विरोध कर सीएम बन गए और अब रिताब्रता बनर्जी पार्टी तोड़कर विपक्ष का नेता बनना की राह पर हैं.
भाजपा और कांग्रेस का आरोप है कि TMC में शक्ति का केंद्रीकरण ममता- अभिषेक के इर्द-गिर्द हो गया है. हालांकि तृणमूल का तर्क है कि अभिषेक अपनी राजनीतिक क्षमता और संगठनात्मक कौशल के दम पर आगे बढ़े हैं, न कि केवल पारिवारिक रिश्ते की वजह से.
ममता बनर्जी की सियासी टाइमलाइन
1970 के दशक की शुरुआत - छात्र राजनीति से जुड़ीं और युवा कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की.
1976-1980 - पश्चिम बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव बनीं.
!984 - जादवपुर लोकसभा सीट से वाम नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर पहली बार सांसद बनीं.
1989 - लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.
1991 - दक्षिण कोलकाता से सांसद चुनी गईं और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री बनीं.
1993 - कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग मार्च के दौरान पुलिस फायरिंग में 13 युवकों की मौत; ममता विपक्षी संघर्ष का बड़ा चेहरा बनीं.
1996-97 - पश्चिम बंगाल कांग्रेस नेतृत्व से टकराव तेज हुआ.
1 जनवरी 1998- कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना की.
1998 - पहली बार लोकसभा चुनाव में TMC ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया.
1999 - NDA सरकार में शामिल हुईं और रेल मंत्री बनीं.
2001 - पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को कड़ी चुनौती दी, लेकिन सत्ता नहीं मिली.
2004 - लोकसभा चुनाव में TMC को बड़ा झटका लगा.
2006 - सिंगूर भूमि अधिग्रहण आंदोलन का नेतृत्व किया.
2007 - नंदीग्राम आंदोलन ने ममता को राज्यव्यापी जननेता बना दिया.
2009 - कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लोकसभा में बड़ी सफलता हासिल की.
2011 - 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को हराकर पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं.
2014 - लोकसभा चुनाव में TMC ने बंगाल में अपना दबदबा मजबूत किया.
2016 - लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं.
2019 - भाजपा ने बंगाल में बड़ी चुनौती पेश की, लेकिन TMC सबसे बड़ी पार्टी बनी रही.
2021 - भाजपा की आक्रामक चुनौती के बावजूद तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं.
2022-24 - शिक्षक भर्ती, कोयला और पशु तस्करी जैसे कथित भ्रष्टाचार मामलों में पार्टी के कई नेता जांच के घेरे में आए.
2024 लोकसभा चुनाव - बंगाल में TMC ने मजबूत प्रदर्शन कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखी.
2026 - बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच ममता विपक्षी एकता और राज्य में सत्ता बचाए रखने की दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं.
क्यों कहा जाता है कि ममता ने जो बोया, वही काट रही हैं?
ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर का बड़ा हिस्सा आक्रामक आंदोलन, सड़क की राजनीति और सत्ता विरोधी जनभावनाओं को संगठित करने में लगाया. इसी रणनीति ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया. लेकिन अब वही मॉडल उनके खिलाफ भी इस्तेमाल हो रहा है. बीजेपी और अन्य विपक्षी दल राज्य सरकार पर उन्हीं मुद्दों (भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, संस्थाओं के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक स्पेस को सीमित करने) को लेकर हमला बोला, जिन आरोपों के सहारे ममता ने वामपंथ को सत्ता से बाहर किया था. इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि बंगाल की राजनीति में उन्होंने जिस शैली को वैधता दी, अब उसी के परिणामों का सामना भी उन्हें करना पड़ रहा है.




