आंखों से खून की धारा, फिर भी बंकर में घुसकर दुश्मनों का लगाया ठिकाने; ऐसी है राजस्थान के 'रणधीर' मेजर पीरू सिंह की शौर्यगाथा
तिथवाल की जंग में शरीर गोलियों से छलनी हुआ, आंखों से खून बहा, साथी एक-एक कर शहीद हुए, लेकिन मेजर पीरू सिंह शेखावत ने दुश्मन की पोस्ट पर आखिरी सांस तक हमला जारी रखा.
'जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी'
'पुष्पा' फिल्म का वो डायलॉग तो आपने सुना ही होगा-'दम हो तो रोक के दिखा शिखावत', लेकिन आज कहानी किसी फिल्मी हीरो की नहीं, बल्कि उस असली रणबांकुरे की है जिसने युद्धभूमि में ऐसा पराक्रम दिखाया कि दुश्मन के बंकर में घुसकर नाको चले चबा दिया. वैसे तो राजस्थान की धरती ने देश को ऐसे कई वीर दिए हैं, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी जान की परवाह तक नहीं की. इन्हीं वीरों में एक नाम है मेजर पीरू सिंह शेखावत, जिनकी बहादुरी आज भी भारतीय सेना के इतिहास में मिसाल मानी जाती है.
गोलियों की बौछार के बीच आगे बढ़ते रहे, शरीर छलनी हुआ लेकिन कदम नहीं रुके. दुश्मन के बंकर से लगातार फायरिंग हो रही थी, साथी एक-एक कर शहीद हो रहे थे, मगर पीरू सिंह को पीछे मुड़ना मंजूर नहीं. घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन के मोर्चे तक पहुंचकर ऐसा हमला किया कि सामने वाले सैनिकों को संभलने का मौका तक नहीं मिला. जवान तुझे सलाम की सीरीज में हम उनकी वीरगाथा और जज्बे की कुछ कहानी आपके सामने पेश करने जा रहे हैं.
18 जुलाई 1948 की वह रात थी जम्मू-कश्मीर के तिथवाल सेक्टर में पहाड़ों पर चारों तरफ सन्नाटा था... लेकिन यह सन्नाटा तूफान से पहले का था. सामने ऊंची पहाड़ी पर दुश्मन ने अपनी मजबूत चौकियां बना रखी थी. मशीन गनें भारतीय जवानों का रास्ता रोक रही थीं. इस पहाड़ी पर कब्जा किए बिना भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ना बेहद मुश्किल था.
इसी मुश्किल मिशन की जिम्मेदारी 6 राजपूताना राइफल्स के जवानों को मिली. इस टुकड़ी के साथ कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत भी थे. उन्हें शायद अंदाजा था कि यह उनका आखिरी युद्ध हो सकता है, लेकिन उनके कदमों में जरा भी झिझक नहीं थी. कुछ ही देर बाद उनका नाम भारतीय सैन्य इतिहास की उन अमर वीरगाथाओं में दर्ज होने वाला था, जिन्हें पीढ़ियां आज भी याद करती हैं और उनके वीरगाथा के किस्से सुनकर हैरान हो जाती हैं तो आइए एक नजर डालते हैं....
पहाड़ी पर दुश्मन का कब्जा और सामने मौत का रास्ता
तिथवाल सेक्टर में भारतीय सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी पहाड़ी थी, जहां दुश्मन ऊंचाई का फायदा उठाकर बैठा था. वहां से मशीन गनों की लगातार गोलियां बरस रही थी. भारतीय सैनिक जिस रास्ते से आगे बढ़ रहे थे, वह बेहद संकरा था और उसके दोनों तरफ गहरी खाइयां थी यानी एक तरफ दुश्मन की गोलियां थीं और दूसरी तरफ मौत की खाई लेकिन पीरू सिंह और उनके साथी आगे बढ़ते रहे.
रात के अंधेरे में शुरू हुआ यह हमला धीरे-धीरे बेहद खूनी संघर्ष में बदल गया. दुश्मन ने मशीन गनों और हथगोलों से भारतीय जवानों पर जबरदस्त हमला कर दिया. कुछ ही देर में साथी गिरते गए. दुश्मन की मशीन गन लगातार आग उगल रही थी. भारतीय टुकड़ी के जवान एक-एक करके घायल होने लगे और कई वीर शहीद हो गए. हालात इतने खराब हो गए कि पीरू सिंह की टुकड़ी के 50 से ज्यादा जवान या तो शहीद हो चुके थे या घायल पड़े थे लेकिन पीरू सिंह रुके नहीं. उन्हें समझ आ गया था कि अगर मशीन गन वाली पोस्ट को खत्म नहीं किया गया तो आगे बढ़ना लगभग नामुमकिन होगा. उन्होंने खुद आगे बढ़ने का फैसला किया. उस समय उनके सामने सिर्फ एक लक्ष्य था. दुश्मन की पोस्ट को खामोश करना.
गोलियां लगीं, ग्रेनेड फटे...फिर भी कदम नहीं रुके
पीरू सिंह जैसे-जैसे आगे बढ़े, दुश्मन ने उन पर गोलियों और ग्रेनेड से हमला तेज कर दिया. उनके शरीर पर चोटें लगीं, लेकिन उन्होंने अपनी रफ्तार नहीं रोकी. वह दुश्मन की पहली पोस्ट तक पहुंच गए और फिर शुरू हुआ आमने-सामने का मुकाबला. उन्होंने पोस्ट पर धावा बोल दिया और अपनी संगीन से दुश्मन के सैनिकों का सामना किया. कुछ ही पलों में पहली पोस्ट भारतीय सेना के कब्जे में थी लेकिन पीरू सिंह के लिए मिशन अभी खत्म नहीं हुआ था.
पीछे देखा तो कोई साथी नहीं था
पहली पोस्ट पर कब्जा करने के बाद जब पीरू सिंह ने पीछे देखा, तो उन्हें एहसास हुआ कि उनकी टुकड़ी में अब उनके अलावा कोई साथी नहीं बचा था. वह अकेले थे. लेकिन शायद उस वक्त उनके लिए अकेले या पूरी टुकड़ी के साथ होने का कोई मतलब नहीं था. उनके सामने अभी दुश्मन की दूसरी पोस्ट थी. उन्होंने फिर आगे बढ़ना शुरू किया.
कहानी यहीं सबसे ज्यादा रोंगटे खड़े कर देती है.
एक ग्रेनेड उनके बेहद करीब आकर फटा. उनका चेहरा बुरी तरह घायल हो गया. उनकी आंखों से खून बहने लगा. शरीर पहले ही गोलियों से छलनी था, लेकिन उन्होंने हथियार नहीं छोड़ा. आंखों से खून बह रहा था, फिर भी दुश्मन की तरफ बढ़ते रहे. सोचिए, एक सैनिक जिसके शरीर पर गोलियों और ग्रेनेड के घाव हों, जिसकी आंखों से खून बह रहा हो और जिसके आसपास उसका कोई साथी जीवित न बचा हो वह उस हालत में क्या करेगा?
पीरू सिंह ने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़ना चुना. उन्होंने दुश्मन की दूसरी पोस्ट की तरफ ग्रेनेड फेंका. उसी दौरान दुश्मन की एक गोली उनके सिर में आ लगी. पीरू सिंह जमीन पर गिर पड़े लेकिन हार नहीं मानी. उनके हाथ से निकला ग्रेनेड अपने लक्ष्य तक पहुंच चुका था. कुछ ही क्षण बाद दुश्मन की पोस्ट में जोरदार धमाका हुआ. जिस पोस्ट से लगातार भारतीय जवानों पर गोलियां बरस रही थीं, वह भी तबाह हो चुकी थी. पीरू सिंह शहीद हो चुके थे. लेकिन मरते-मरते भी वह अपना आखिरी काम पूरा कर चुके थे.
एक जवान गया, लेकिन तिरंगे के लिए रास्ता बना गया
पीरू सिंह की शहादत सिर्फ एक सैनिक की मौत नहीं थी. वह उस जज्बे की मिसाल थी जिसमें एक जवान अपने प्राणों की परवाह किए बिना अपने मिशन को पूरा करता है. उनके अदम्य साहस के बाद भारतीय सेना ने उस महत्वपूर्ण पहाड़ी पर कब्जा कर लिया. युद्धभूमि में उनका शरीर भले शांत हो गया था, लेकिन उनकी वीरता की कहानी हमेशा के लिए जिंदा हो गई.
राजस्थान की मिट्टी से निकला वह 'रणधीर'
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत राजस्थान के झुंझुनू जिले के रामपुर बेरी गांव के रहने वाले थे. बचपन से ही उनके भीतर सेना में जाने की इच्छा थी. सेना में भर्ती होने के लिए उन्हें शुरुआती दौर में उम्र कम होने के कारण दो बार निराशा भी झेलनी पड़ी. लेकिन उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी. आखिरकार वह भारतीय सेना में भर्ती हुए. पंजाब रेजीमेंट से सैन्य जीवन शुरू करने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी मेहनत और क्षमता के दम पर नायक, फिर हवलदार और आगे चलकर कंपनी हवलदार मेजर का पद हासिल किया.
शहादत के बाद मिला देश का सबसे बड़ा सम्मान
1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में दिखाए गए उनके अद्भुत साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. पीरू सिंह की कहानी हमें सिर्फ युद्ध का एक अध्याय नहीं बताती. यह बताती है कि जब देश की सुरक्षा का सवाल सामने हो, तो एक सैनिक अपने प्राणों से भी बड़ा अपने कर्तव्य को मानता है. तिथवाल की उस पहाड़ी पर पीरू सिंह अकेले रह गए थे, लेकिन उन्होंने अकेलेपन को कमजोरी नहीं बनने दिया. गोलियां खत्म हो सकती थीं, साथी खत्म हो सकते थे, शरीर जवाब दे सकता था... लेकिन उनका हौसला आखिरी सांस तक जिंदा रहा. यही वजह है कि राजस्थान की मिट्टी का वह लाल आज भी भारतीय सेना की वीरगाथाओं में अमर है.m




