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वीर गाथा अब्दुल हमीद की, जिन्होंने अकेले उड़ाए पाकिस्तान के कई US पैटन टैंक, बाद में ऐसे बटोरा गया उनका शव, आज भी जोश भरती है कहानी

एक जीप, 106 मिमी रिकॉयलेस राइफल और सामने दुश्मन के भारी-भरकम पैटन टैंक... खेमकरण की धरती पर अब्दुल हमीद ने ऐसा शौर्य दिखाया कि उनकी कहानी हिंदुस्तान की रूह में हमेशा के लिए दर्ज हो गई.

वीर गाथा अब्दुल हमीद की, जिन्होंने अकेले उड़ाए पाकिस्तान के कई US पैटन टैंक, बाद में ऐसे बटोरा गया उनका शव, आज भी जोश भरती है कहानी
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी7 Mins Read

Updated on: 11 Aug 2026 9:00 AM IST

'ऐ वतन, आबाद रहे तू… हम तो सफर करते हैं.'

कुछ सैनिक युद्ध लड़ते हैं, कुछ सैनिक युद्ध की कहानी बन जाते हैं. वीर अब्दुल हमीद उन्हीं नामों में से एक हैं. 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग में जब पाकिस्तानी सेना को अपने अमेरिकी पैटन टैंकों की ताकत पर अहंकार में था तब भारतीय सेना के इस जांबाज ने सीमित हथियारों के बावजूद ऐसा साहस दिखाया कि उनका नाम भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया.

खेमकरण की धरती पर वह मुकाबला सिर्फ टैंकों और हथियारों का नहीं था. एक तरफ दुश्मन की भारी सैन्य ताकत थी. तो दूसरी तरफ एक भारतीय जवान का अदम्य हौसला. अब्दुल हमीद जानते थे कि सामने खतरा बड़ा है, लेकिन उनके लिए देश की रक्षा से बड़ा कुछ नहीं था.

1962 की जंग ने और मजबूत किया इरादा

भारतीय सेना में रहते हुए अब्दुल हमीद ने देश के अलग-अलग हिस्सों में सेवा की. 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान भी उनकी यूनिट ने कठिन परिस्थितियों में मोर्चा संभाला. इस दौरान उन्हें चोट भी लगी, लेकिन मुश्किल हालात में भी उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी. उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें सेना पदक से सम्मानित किया गया लेकिन शायद उन्हें भी नहीं पता था कि कुछ ही वर्षों बाद उन्हें ऐसी जंग का सामना करना होगा, जहां उनका नाम हमेशा के लिए अमर हो जाएगा.

1965 में पाकिस्तान ने बढ़ाया युद्ध का दायरा

1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया. पाकिस्तान की सेना के पास अमेरिकी हथियारों की बड़ी खेप थी. इनमें M48 पैटन टैंक भी शामिल थे, जिन्हें उस समय बेहद शक्तिशाली टैंकों में गिना जाता था. पाकिस्तानी सेना को अपनी सैन्य ताकत पर भरोसा था. पंजाब के खेमकरण सेक्टर में भारतीय सेना के सामने इन टैंकों को रोकने की बड़ी चुनौती थी.

इसी मोर्चे पर तैनात थे हवलदार अब्दुल हमीद.

उनके पास कोई भारी टैंक नहीं था. उनके पास थी 106 मिमी रिकॉयलेस राइफल, जिसे एक जीप पर लगाया गया था. लेकिन हथियार छोटा हो सकता था, हौसला नहीं. घर से निकलते वक्त पिता से कही थी बड़ी बात जंग के लिए रवाना होने से पहले अब्दुल हमीद के घर का माहौल भावुक था. परिवार से जुड़ी यादों में ट्रेन छूटने और साइकिल की चेन टूटने जैसी घटनाओं का जिक्र मिलता है, जिन्हें उस समय घरवालों ने अच्छा संकेत नहीं माना.

पिता चिंतित थे. लेकिन बेटे के चेहरे पर डर नहीं था. अब्दुल हमीद ने पिता को भरोसा दिलाया कि वह देश की जिम्मेदारी निभाने जा रहे हैं. उनसे जुड़ी स्मृतियों में यह बात भी मिलती है कि उन्होंने कहा था कि अगर वह वापस नहीं लौटे, तो ऐसा कुछ करके जाएंगे जिससे देश को उन पर गर्व होगा. कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने शब्दों को सच कर दिखाया.

गन्ने के खेत में छिपा था मौत का जवाब

खेमकरण के मोर्चे पर पाकिस्तानी पैटन टैंक आगे बढ़ रहे थे. भारी-भरकम टैंकों के सामने भारतीय जवानों को बेहद सावधानी से मोर्चा संभालना था. अब्दुल हमीद ने अपनी जीप और रिकॉयलेस राइफल के साथ गन्ने के खेतों का सहारा लिया. वह जानते थे कि खुले मैदान में सामने से हमला करना आत्मघाती हो सकता है. इसलिए उन्होंने छिपकर सही मौके का इंतजार किया. फिर सामने आया दुश्मन का टैंक.

अब्दुल हमीद ने निशाना साधा. गोली चली और देखते ही देखते पैटन टैंक आग की लपटों में घिर गया. उस एक हमले ने सिर्फ एक टैंक को नहीं रोका, बल्कि भारतीय जवानों का हौसला भी बढ़ा दिया. एक के बाद एक टैंक और बढ़ता गया हौसला. पाकिस्तानी सेना को समझ नहीं आ रहा था कि उनके टैंकों पर हमला आखिर हो कहां से रहा है. अब्दुल हमीद लगातार अपनी पोजीशन बदलते रहे. वह मौका देखते, निशाना साधते और हमला करते. लोकप्रिय सैन्य विवरणों में उनके द्वारा कई पैटन टैंकों, अक्सर आठ टैंकों तक, को नष्ट किए जाने का उल्लेख मिलता है. हालांकि अलग-अलग स्रोतों में संख्या को लेकर अंतर मिलता है. लेकिन उनकी वीरता की असली कहानी किसी संख्या की मोहताज नहीं है.

सामने कई टन वजनी टैंक. पीछे भारतीय तिरंगा. और बीच में एक जवान, जिसके पास एक जीप और रिकॉयलेस राइफल थी. यही वह तस्वीर है जिसने अब्दुल हमीद को सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि शौर्य का प्रतीक बना दिया. आखिरी सांस तक नहीं छोड़ा मोर्चा. 10 सितंबर 1965 को अब्दुल हमीद एक और दुश्मन के टैंक को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे थे. इसी दौरान दुश्मन ने हमला कर दिया और उन्होंने आखिरी पैटन टैंक को उड़ा दिया था लेकिन दुश्मन के प्रहार के उनके भी चिथड़े उड़ गए थे और उनके शव को फिर बटोरा गया था. ऐसी है वीर अब्दुल हमीस की वीर गाथा. जिसे आज भी सुनकर हर कोई सन्न रह जाता है.

लेकिन उनकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई. उनका बलिदान भारतीय सैनिकों के साहस की ऐसी मिसाल बन गया, जिसे आने वाली पीढ़ियां याद करती रहेंगी. मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया. तिरंगे में लौटा गाजीपुर का बेटा. जिस बेटे ने घर से निकलते समय देश को गर्व कराने का वादा किया था, वह आखिरकार वापस आया. लेकिन सैनिक की वर्दी में नहीं... तिरंगे में लिपटकर गया था.

अब सोचिए... परिवार के लिए यह पल कितना दर्दनाक रहा होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है. एक मां के लिए बेटा चला गया था, एक परिवार ने अपना अपना इंसान खो दिया था. लेकिन पूरे देश ने एक ऐसा वीर पाया, जिसकी कहानी कभी खत्म नहीं होगी. परमवीर चक्र ने अमर कर दिया नाम. अब्दुल हमीद की असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

गाजीपुर के छोटे से गांव से निकला देश का वीर बेटा

1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में अब्दुल हमीद का जन्म हुआ. परिवार साधारण था. उनके पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे. घर में सुख-सुविधाओं की भरमार नहीं थी, लेकिन अब्दुल हमीद के भीतर कुछ कर गुजरने का जज्बा जरूर था. बचपन से ही उन्हें कुश्ती, लाठी और निशानेबाजी में दिलचस्पी थी. शारीरिक रूप से मजबूत और निशानेबाजी में कुशल अब्दुल हमीद का झुकाव धीरे-धीरे सेना की ओर बढ़ा. करीब 20 साल की उम्र में वह भारतीय सेना में शामिल हुए और 4 ग्रेनेडियर्स का हिस्सा बने. यहीं से उस सफर की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र तक ले जाने वाला था.

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