लड़ते-लड़ते बर्फ में दफन हो गए लेकिन मोर्चा नहीं छोड़ा, वीर गाथा रेजांग ला के धुरंधर मेजर शैतान सिंह की, जिसकी आज भी है गूंज
रेजांग ला की बर्फीली पहाड़ियों पर मेजर शैतान सिंह और 13 कुमाऊं के जवानों ने 18 नवंबर 1962 को अदम्य साहस की मिसाल कायम की. दोनों हाथ घायल होने के बावजूद मेजर शैतान सिंह ने पैर से मशीनगन चलाकर आखिरी सांस तक दुश्मन का मुकाबला किया.
रेजांग ला की पहाड़ियां आज भी खामोश हैं. लद्दाख की वही बर्फीली हवा आज भी वहां चलती है. ऊंचे पहाड़, चारों तरफ फैली सफेदी और ऐसी ठंड कि कुछ मिनट खड़े रहना भी मुश्किल हो जाए. लेकिन अगर इन पहाड़ियों से पूछा जाए कि 18 नवंबर 1962 को यहां क्या हुआ था? तो शायद उनकी खामोशी में भी एक आवाज सुनाई देगी...'हम यहां हैं... और आखिरी दम तक यहीं रहेंगे.'
ये आवाज थी मेजर शैतान सिंह की
वो सिर्फ एक फौजी अफसर नहीं थे. वो उन 120 जवानों के कमांडर थे. जिनके लिए उनका अफसर सिर्फ आदेश देने वाला नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा होता है और यही वजह थी कि जब रेजांग ला पर मौत सामने खड़ी थी तो जवानों ने अपने कमांडर का साथ छोड़ने के बजाय उसके साथ खड़े होकर इतिहास लिख दिया. यह कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध की है लेकिन उससे भी ज्यादा यह कहानी है हिम्मत की. भरोसे की और उस रिश्ते की जो एक सैनिक और उसके देश के बीच होता है. वो जगह जहां सांस लेना भी मुश्किल था.
नवंबर का महीना था. लद्दाख की करीब 16-17 हजार फीट ऊंची पहाड़ियों पर बर्फीली हवाएं चल रही थीं. रेजांग ला की चौकी पर 13 कुमाऊं रेजीमेंट की चार्ली कंपनी तैनात थी. कंपनी में करीब 120 जवान थे और उनकी कमान मेजर शैतान सिंह के हाथों में थी.
ये जवान ऐसे मौसम के आदी नहीं थे
ठंड इतनी कि पानी जम जाए. खाना मुश्किल से खाया जा सके. हवा इतनी तेज कि चेहरे पर लगे कपड़े के बावजूद ठंड शरीर के अंदर उतर जाए. बाद में इस इलाके को देखने वाले सैनिकों ने बताया कि वहां कुछ देर खड़ा रहना तक बेहद मुश्किल था. ऐसे मौसम में लड़ाई लड़ना कैसी होगी? इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. लेकिन उन जवानों के सामने एक सवाल था.
लड़ो और मरो की लड़ाई
पीछे हटना है या रेजांग ला को बचाना है? मेजर शैतान सिंह का जवाब साफ था. रेजांग ला नहीं छोड़ा जाएगा. अंधेरे में दिखाई दीं लालटेनें 18 नवंबर की सुबह अभी पूरी तरह हुई भी नहीं थी. चारों तरफ अंधेरा और बर्फीली हवा थी. तभी भारतीय जवानों को पहाड़ों के सामने कुछ रोशनियां दिखाई दीं. मेजर शैतान सिंह ने तुरंत सतर्कता दिखाई और फायरिंग का आदेश दिया. लेकिन थोड़ी देर में पता चला कि सामने दिखाई दे रही रोशनियां गोलियां या हथियार नहीं थीं. वे लालटेनें थीं.
चीनी सैनिकों ने लालटेनें लेकर आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई थी. लेकिन जल्द ही यह साफ हो गया कि यह सिर्फ शुरुआत थी. असली हमला अभी बाकी था. फिर अचानक रेजांग ला की खामोशी गोलियों और धमाकों से टूट गई. चीनी सेना ने हमला शुरू कर दिया. सामने हजारों, पीछे सिर्फ 120. भारतीय सैनिक संख्या में बहुत कम थे. हथियार और गोला-बारूद भी सीमित था. दूसरी तरफ चीनी सेना पूरी तैयारी के साथ आई थी. ठंड में लड़ने का उनका अनुभव भी ज्यादा था.
चौकी छोड़कर वापस चले आओ
मगर रेजांग ला पर भारतीय सैनिकों के पास एक चीज थी. अपने कमांडर पर भरोसा. मेजर शैतान सिंह ने वायरलेस पर सीनियर अधिकारियों से संपर्क किया और मदद मांगी. जवाब आया कि तत्काल मदद पहुंचाना मुश्किल है. हालात बिगड़ रहे हैं. जरूरत पड़े तो चौकी छोड़कर पीछे हटने पर विचार किया जाए. लेकिन मेजर शैतान सिंह के लिए यह फैसला आसान नहीं था. उन्होंने अपने जवानों को इकट्ठा किया. स्थिति उनके सामने थी. गोलियां सीमित थीं दुश्मन भारी संख्या में थे.
ठंड शरीर को सुन्न कर रही थी और मदद दूर थी. उन्होंने अपने जवानों से कहा कि अगर कोई पीछे जाना चाहता है तो जा सकता है लेकिन वह खुद वहीं रहेंगे वह लड़ेंगे और फिर एक-एक करके उनके जवान भी उनके साथ खड़े हो गए. यही वो पल था जब एक अफसर और उसके जवानों का रिश्ता इतिहास बन गया. रेजांग ला पर शुरू हुई आखिरी लड़ाई. इसके बाद जो हुआ, वह किसी फिल्म का नजारा नहीं था. वह हकीकत थी.
चीनी सैनिक लगातार आगे बढ़ रहे थे. भारतीय जवान लगातार जवाब दे रहे थे. एक तरफ संख्या और हथियारों का अंतर था. दूसरी तरफ जुनून और हिम्मत. भारतीय सैनिकों ने एक-एक मोर्चे पर डटकर मुकाबला किया. कई जवान घायल हुए. कई शहीद हो गए. लेकिन मोर्चा नहीं छोड़ा गया. मेजर शैतान सिंह खुद एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे तक जा रहे थे. जहां जवानों को हौसले की जरूरत होती. वहां पहुंचते. जहां गोली कम होती, वहां सैनिकों को संभालते. जहां हमला ज्यादा तेज होता. वहां खुद मौजूद रहते. उनके लिए जवान सिर्फ सैनिक नहीं थे.
वे उनके अपने लोग थे और शायद यही वजह थी कि जवान भी उन्हें अकेला छोड़ने को तैयार नहीं थे. जब गोलियों ने मेजर शैतान सिंह को भी छलनी कर दिया. लड़ाई और तेज होती गई. मेजर शैतान सिंह भी गंभीर रूप से घायल हो गए. शरीर से खून बह रहा था. साथियों ने उन्हें एक बर्फीली चट्टान के पीछे पहुंचाया. उन्होंने सोचा होगा कि अब अपने कमांडर को बचाया जाए. मेडिकल मदद दिलाई जाए. उन्हें वहां से नीचे ले जाया जाए. लेकिन मेजर शैतान सिंह ने मना कर दिया. उन्होंने अपनी चिंता करने के बजाय जवानों की चिंता की.
उनके लिए लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी.
दोनों हाथ घायल थे...फिर पैर से चलाई मशीनगन और फिर आता है मेजर शैतान सिंह की वीरता का वह किस्सा, जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उनके दोनों हाथ बुरी तरह घायल हो चुके थे. लेकिन वह अभी भी लड़ना चाहते थे. उन्होंने मशीनगन अपने पास रखने को कहा. फिर मशीनगन के ट्रिगर को रस्सी से अपने पैर से बांध दिया. दोनों हाथ काम नहीं कर रहे थे. लेकिन पैर अभी साथ था और उसी पैर की मदद से उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी.
सोचिए...एक तरफ बर्फीली चट्टान. दूसरी तरफ दुश्मन. शरीर पर गोलियों के घाव. हाथ खून से लथपथ और फिर भी एक भारतीय सैनिक अपनी जमीन पर डटा हुआ है. यह सिर्फ बहादुरी नहीं थी. यह उस कसम का आखिरी पड़ाव था जो एक सैनिक वर्दी पहनते समय देश से लेता है. फिर वो चट्टान... और तीन महीने की खामोशी. उसके बाद मेजर शैतान सिंह के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चला.
रेजांग ला बर्फ में ढक गया. जंग खत्म हो गई. लेकिन उस बर्फ के नीचे एक कहानी दबी रह गई. करीब तीन महीने बाद जब बर्फ पिघलने लगी और इलाके में तलाश शुरू हुई, तब सैनिकों को एक चट्टान के नीचे कुछ दिखाई दिया. वे उसी जगह पहुंचे. और वहां जो मिला, उसने सबको स्तब्ध कर दिया. मेजर शैतान सिंह का शरीर उनकी मशीनगन के साथ मिला और उनके पैर में रस्सी अब भी बंधी हुई थी. जिस रस्सी से उन्होंने घायल अवस्था में मशीनगन का ट्रिगर अपने पैर से बांधा था, वह रस्सी बर्फ के पिघलने के बाद भी उनके साथ थी.
एक सैनिक की आखिरी तस्वीर शायद इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकती- वह लड़ते-लड़ते वहीं जम गया था. सिर्फ मेजर नहीं गए थे... उनके साथ उनके जवान भी थे. रेजांग ला की कहानी सिर्फ मेजर शैतान सिंह की कहानी नहीं है. उनके साथ लड़ने वाले जवान भी उसी बर्फीले मैदान में शहीद हुए. चार्ली कंपनी के सैनिकों ने आखिरी समय तक मोर्चा संभाला. उनके बलिदान ने यह साबित कर दिया कि युद्ध में संख्या हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती.
कभी-कभी कुछ मुट्ठी भर लोग इतिहास की दिशा बदल देते हैं. रेजांग ला के उन जवानों ने यही किया. भारत युद्ध हार गया, लेकिन रेजांग ला ने सिर ऊंचा कर दिया. 1962 का भारत-चीन युद्ध भारत के लिए बेहद कठिन दौर था. देश को सैन्य और राजनीतिक स्तर पर बड़ा झटका लगा. लेकिन रेजांग ला एक ऐसा अध्याय बना, जिसे हार की कहानी में नहीं लिखा जा सकता. क्योंकि वहां भारतीय सैनिकों ने ऐसी लड़ाई लड़ी, जिसने दुश्मन को भी भारी नुकसान पहुंचाया. स्रोत में रेजांग ला में चीनी सेना के करीब 1800 सैनिकों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है.
यही वजह है कि रेजांग ला को आज भी भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे साहसी लड़ाइयों में याद किया जाता है. जोधपुर लौटा एक बेटा... तिरंगे में लिपटकर. मेजर शैतान सिंह का अंतिम संस्कार उनके गृह नगर जोधपुर में राजकीय सम्मान के साथ किया गया.
कल्पना कीजिए उस घर की... जहां कभी एक बेटा वर्दी पहनकर निकला होगा. मां ने शायद उसकी सलामती की दुआ की होगी. परिवार ने इंतजार किया होगा कि वह लौटेगा. लेकिन वह लौटा जरूर... मगर तिरंगे में लिपटकर. एक सैनिक के परिवार के लिए इससे बड़ा गर्व और इससे बड़ा दर्द शायद ही कुछ हो. एक तरफ बेटे को खोने का दुख. दूसरी तरफ यह गर्व कि उसका बेटा देश के लिए आखिरी सांस तक लड़कर गया.
मेजर शैतान सिंह को कब मिला परमवीर चक्र?
मेजर शैतान सिंह को उनके अदम्य साहस, नेतृत्व और बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनकी कंपनी के दूसरे सैनिकों को भी वीरता पुरस्कार मिले और चार्ली कंपनी को रेजांग ला की वीरता की याद में विशेष सम्मान मिला. लेकिन किसी सम्मान से उस कहानी की कीमत तय नहीं हो सकती.
क्योंकि परमवीर चक्र एक पदक है और रेजांग ला में दिया गया बलिदान- भारत की अमर स्मृति है. मेजर शैतान सिंह की कहानी आज भी क्यों जिंदा है? क्योंकि यह कहानी सिर्फ 1962 की नहीं है. यह हर उस भारतीय की कहानी है जो यह समझना चाहता है कि देशभक्ति आखिर होती क्या है. देशभक्ति सिर्फ नारे लगाने का नाम नहीं. देशभक्ति तब सामने आती है जब इंसान के पास पीछे हटने का रास्ता हो, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी छोड़ने से इनकार कर दे. मेजर शैतान सिंह के पास भी पीछे हटने का विकल्प था.
उनके जवानों के पास भी विकल्प था. लेकिन उन्होंने रेजांग ला को चुना. उन्होंने अपने जवानों को चुना. और अंत में उन्होंने भारत को चुना. एक अफसर और उसके जवानों का रिश्ता. भारतीय सेना में अफसर और जवान का रिश्ता सिर्फ आदेश और पालन का नहीं होता. वह परिवार जैसा रिश्ता होता है. रेजांग ला में यही रिश्ता दिखाई दिया. मेजर शैतान सिंह ने जवानों से कहा कि अगर कोई पीछे जाना चाहता है तो जा सकता है.




