घायल थे फिर भी पाकिस्तान को पहुंचाई गहरी चोट, मरणोपरांत परमवीर चक्र Albert Ekka कौन, जिन पर आ रही फिल्म, परमवीर में दिखेगा 1971 का जज्बा
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की वीरगाथा अब फिल्म 'परम वीर' के जरिए बड़े पर्दे पर दिखाई जाएगी. वर्धन पुरी स्टारर यह वॉर ड्रामा परमवीर चक्र विजेता लांस नायक अल्बर्ट एक्का और गंगासागर की लड़ाई में शामिल 14 गार्ड्स के सैनिकों की सच्ची कहानी पर आधारित है. फिल्म का निर्देशन सुमंत रतूड़ी कर रहे हैं.
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था. इसी युद्ध की एक सच्ची कहानी अब बड़े पर्दे पर दिखाई देने वाली है. वॉर ड्रामा फिल्म 'परम वीर' देश के बहादुर सैनिकों के साहस, देशभक्ति और बलिदान को सलाम करती है. यह फिल्म परमवीर चक्र विजेता लांस नायक अल्बर्ट एक्का और गंगासागर की लड़ाई में शामिल 14 गार्ड्स के सैनिकों की वीरगाथा पर आधारित है. फिल्म में वर्धान पुरी लीड रोल निभाते नजर आएंगे.
कहानी युद्ध के उन पलों को सामने लाएगी, जब भारतीय सैनिकों ने मुश्किल परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और देश की रक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा दी. फिल्म की कहानी और निर्देशन की जिम्मेदारी सुमंत रतूड़ी ने संभाली है. इसे सुमंत रतूड़ी और सागर गौड़ा ने प्रोड्यूस किया है, जबकि सिनेमैटोग्राफी की कमान मशहूर सिनेमैटोग्राफर संतोष सिवन के हाथों में है.
HVJ मीडिया और मायराधा मोशन पिक्चर्स के बैनर तले बन रही 'परम वीर' का उद्देश्य उन सैनिकों की वीरता को याद करना है, जिनके बलिदान ने देश के सैन्य इतिहास में अमिट छाप छोड़ी. यह फिल्म दर्शकों को 1971 के युद्ध और गंगासागर की लड़ाई से जुड़ी बहादुरी की कहानी से रूबरू कराएगी.
भारत के सैन्य इतिहास में कुछ ऐसे वीर सैनिकों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की परवाह तक नहीं की. लांस नायक अल्बर्ट एक्का उन्हीं वीरों में से एक थे. साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 14 गार्ड्स के जवान के तौर पर उन्होंने गंगासागर की लड़ाई में अदम्य साहस दिखाया. गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन की मशीनगनों को खामोश किया और भारतीय सैनिकों की आगे बढ़ने की राह आसान बनाई. उनके इस सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.
Albert Ekka कौन थे?
अल्बर्ट एक्का का जन्म 27 दिसंबर 1942 को तत्कालीन बिहार के रांची जिले के जरी गांव में हुआ था. यह गांव अब झारखंड के गुमला जिले में आता है. वह आदिवासी उरांव समुदाय से ताल्लुक रखते थे. उनके पिता का नाम जूलियस एक्का और मां का नाम मरियम एक्का था. उनकी पत्नी का नाम बलमदीना एक्का था. बचपन से ही उन्हें जंगलों में घूमने, शिकार करने और तीर-कमान चलाने में दिलचस्पी थी. उन्हें हॉकी खेलने का भी शौक था.
पढ़ाई से ज्यादा सेना में जाने का था जुनून
अल्बर्ट एक्का की औपचारिक शिक्षा के बारे में विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोतों में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. हालांकि, बचपन से ही उनका सपना भारतीय सेना में शामिल होने का था. 27 दिसंबर 1962 को अपने 20वें जन्मदिन पर वह भारतीय सेना में भर्ती हुए. शुरुआत में उन्हें बिहार रेजिमेंट में शामिल किया गया. बाद में वह 14वीं बटालियन, ब्रिगेड ऑफ गार्ड्स यानी 14 गार्ड्स का हिस्सा बने.
सेना में रहते हुए उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद विरोधी अभियानों में भी हिस्सा लिया. जंगलों में चलने-फिरने की उनकी कुशलता, तीर-कमान चलाने का अनुभव और निशानेबाजी की क्षमता सैनिक जीवन में उनके काम आई.
गंगासागर की लड़ाई में दिखाई अदम्य बहादुरी
साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 14 गार्ड्स को गंगासागर में पाकिस्तानी सेना की मजबूत चौकी पर कब्जा करने का जिम्मा दिया गया. यह स्थान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था और यहां से आगे बढ़ना भारतीय सेना के लिए जरूरी था.
4 दिसंबर 1971 को हमले के दौरान दुश्मन की लाइट मशीनगन भारतीय सैनिकों को भारी नुकसान पहुंचा रही थी. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अल्बर्ट एक्का दुश्मन के बंकर की ओर बढ़े. उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दो दुश्मन सैनिकों को संगीन से मार गिराया और मशीनगन को खामोश कर दिया.
इसी दौरान एक इमारत से दूसरी मशीनगन ने भारतीय सैनिकों पर गोलीबारी शुरू कर दी. गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद एक्का रेंगते हुए आगे बढ़े और बंकर की ओर ग्रेनेड फेंका. इसके बाद भी जब गोलीबारी जारी रही, तो वह बंकर में घुस गए और दुश्मन की मशीनगन को बंद कर दिया. उनकी बहादुरी से भारतीय सैनिकों के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ और अभियान की सफलता में मदद मिली. इस दौरान उन्हें गंभीर चोटें आईं और उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया.
अल्बर्ट एक्का को उनकी असाधारण बहादुरी, दृढ़ संकल्प और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. यह भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है. उनका नाम आज भी भारतीय सेना के उन वीर जवानों में शामिल है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी पीछे हटने के बजाय अपने साथियों और मिशन की सफलता को प्राथमिकता दी.




