बंटवारे के बाद तिरंगा फहराने वाले ‘घायल शेर’ करम सिंह की वीरगाथा, गोलियां खत्म हुईं तो खंजर लेकर टूट पड़े दुश्मनों पर
लांस नायक करम सिंह ने 1948 की जंग में घायल होने के बावजूद मोर्चा नहीं छोड़ा. जानिए गोलियां खत्म होने के बाद खंजर से दुश्मन से भिड़ने वाले वीर की कहानी.
सांस थमती गई नब्ज जमती गई...फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया...कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं...सर हिमालय का हमने न झुकने दिया..मरते-मरते रहा बांकापन साथियों... अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...
हिंदुस्तान की वीर गाथाओं के जितने किस्से कहे जाएं, उतने कम हैं. इस मिट्टी ने ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने अदम्य साहस, त्याग और बलिदान से देश की आन-बान और शान की रक्षा की. सरहद पर खड़ा हर भारतीय जवान सिर्फ सीमा की हिफाजत नहीं करता, बल्कि अपने पीछे खड़े करोड़ों हिंदुस्तानियों के भरोसे और तिरंगे की शान को भी अपने सीने में लेकर चलता है.
'जवान तुझे सलाम' की इसी सीरीज में आज कहानी एक ऐसे नायक की, जिसने गोलियों की बौछार, गहरे जख्म और मौत के सामने भी हार मानने से इनकार कर दिया. दुश्मन को लगा कि घायल होने के बाद यह शेर कमजोर पड़ जाएगा लेकिन मैदान-ए-जंग में उसकी दहाड़ ऐसी गूंजी कि दुश्मनों के हौसले पस्त हो गए.
नाम था लांस नायक करम सिंह- भारतीय सेना का वह वीर योद्धा, जिसकी बहादुरी के आगे दुश्मन भी कांप उठा. 1948 की भारत-पाकिस्तान जंग में उन्होंने अद्भुत साहस का परिचय दिया और अपनी वीरता के लिए देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित हुए. उनकी कहानी सिर्फ युद्धभूमि पर दिखाई गई बहादुरी की कहानी नहीं, बल्कि उस जज्बे की मिसाल है जिसमें एक सैनिक अपने शरीर से ज्यादा देश को महत्व देता है. तो आइए, 'जवान तुझे सलाम' में आज जानते हैं उस घायल शेर की कहानी, जिसने जख्मों के बावजूद मोर्चा नहीं छोड़ा और अपने अदम्य साहस से इतिहास के पन्नों पर अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा दिया. बंटवारे के बाद जब पहली बार पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में नायक करम सिंह ने तिरंगा फहराया था.
1948 की जंग में एक ऐसा भारतीय जवान भी था, जिसके सामने दुश्मनों का सैलाब था और गोलियां की लगातार बरसात हो रही थी. वह खुद बुरी तरह जख्मी हो चुका था. लेकिन उसने मोर्चा छोड़ने के बजाय अपने साथियों को संभाला. एक वक्त ऐसा आया जब हथियारों की गोलियां खत्म हो गईं, फिर भी वह रुका नहीं. उसने खंजर उठाया और दुश्मन की तरफ बढ़ गया.
यह कहानी है लांस नायक करम सिंह की. लेकिन उनकी वीरगाथा सिर्फ एक युद्ध या एक घटना तक सीमित नहीं है. उनके जीवन में ऐसे कई किस्से हैं, जो बताते हैं कि आखिर एक साधारण किसान परिवार का जवान भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र तक कैसे पहुंचा? आइए करम सिंह की जिंदगी को उनके अलग-अलग किस्सों के जरिए समझते हैं.
जब दुश्मन ने सोचा था कि भारतीय चौकी अब ज्यादा देर नहीं टिकेगी
साल 1948...आजादी को ज्यादा वक्त नहीं हुआ था और जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना एक बेहद कठिन लड़ाई लड़ रही थी. तीतवाल का इलाका रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था. भारतीय सेना ने इस क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया था, लेकिन पाकिस्तान इसे दोबारा हासिल करना चाहता था. इसके लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने रिछमार गली की तरफ हमला शुरू किया. रात का वक्त था. चारों तरफ पहाड़, अंधेरा और गोलियों की आवाज.
भारतीय चौकी पर मौजूद जवानों की संख्या दुश्मन के मुकाबले कम थी. सामने से लगातार हमले हो रहे थे. ऐसे समय में चौकी की कमान संभाल रहे थे लांस नायक करम सिंह. दुश्मन को शायद लगा होगा कि संख्या बल और लगातार गोलीबारी के दबाव में भारतीय सैनिक पीछे हट जाएंगे लेकिन उसे करम सिंह के बारे में अंदाजा नहीं था.
करम सिंह ने अपने जवानों को संभाला और मोर्चे पर डटे रहने का फैसला किया. दुश्मन आगे बढ़ता रहा. भारतीय जवान जवाब देते रहे. एक हमला नाकाम हुआ तो दूसरा शुरू हो गया. लेकिन चौकी नहीं छूटी. करम सिंह लगातार अपने सैनिकों के बीच घूमकर उनका हौसला बढ़ाते रहे. वह सिर्फ आदेश देने वाले कमांडर नहीं थे, बल्कि खुद सबसे मुश्किल जगहों पर मौजूद रहते थे.
शरीर पर जख्म, लेकिन कदम मोर्चे से पीछे नहीं हटे
जंग अब और भी भयानक हो चुकी थी. पाकिस्तानी सैनिकों की तरफ से लगातार फायरिंग हो रही थी. इसी दौरान करम सिंह भी घायल हो गए. सोचिए... जिस सैनिक को खुद इलाज की जरूरत थी, वह अपने घावों की चिंता करने के बजाय अपने साथियों को संभाल रहा था. करम सिंह एक जगह बैठकर लड़ाई खत्म होने का इंतजार नहीं कर रहे थे.
वह मोर्चे के अलग-अलग हिस्सों में जाते रहे. जहां किसी सैनिक का हौसला कमजोर पड़ता, वहां पहुंचते. जहां जवाबी कार्रवाई की जरूरत होती, वहां मौजूद रहते. उनके लिए चोट का मतलब लड़ाई से बाहर होना नहीं था. उनका मकसद साफ था. दुश्मन को चौकी तक नहीं पहुंचने देना है. उनकी मौजूदगी का असर बाकी जवानों पर भी पड़ा. घायल होने के बावजूद जब उनका कमांडर मैदान में खड़ा था तो बाकी सैनिकों के लिए पीछे हटने का सवाल ही नहीं था.
जब गोलियां खत्म हो गईं और करम सिंह ने खंजर उठा लिया
अब आता है करम सिंह की वीरगाथा का सबसे चर्चित किस्सा. लड़ाई के बीच एक समय ऐसा आया जब उनके पास गोलियां खत्म हो गईं. दुश्मन अभी भी सामने था यानी वह स्थिति जहां कोई भी सैनिक अपनी सुरक्षा के बारे में सोच सकता था. लेकिन करम सिंह की नजर अपने एक साथी सैनिक पर पड़ी. वह सैनिक दुश्मन के बीच फंस गया था. अब करम सिंह के सामने दो रास्ते थे या तो अपनी जान बचाकर सुरक्षित जगह पर रहें या फिर उस सैनिक को बचाने के लिए दुश्मन की तरफ जाएं. करम सिंह ने दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने पास पड़ा खंजर उठाया और दुश्मन की तरफ बढ़ गए.
गोली नहीं थी पीछे हटने का विकल्प था लेकिन करम सिंह आगे बढ़े. उन्होंने दुश्मन के करीब जाकर मुकाबला किया और दो पाकिस्तानी सैनिकों को खंजर से मार गिराया. इसके बाद उन्होंने अपने साथी सैनिक को वहां से बाहर निकाला. युद्धभूमि में यह सिर्फ बहादुरी नहीं थी. यह अपने साथी के लिए जान जोखिम में डाल देने का फैसला था.
खुद घायल थे, फिर भी साथियों को कंधे पर लेकर लौटे
करम सिंह अपने साथी को बचाकर वापस लौटे तो उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हुई. उन्होंने युद्धभूमि में घायल पड़े भारतीय सैनिकों को भी देखा. वह खुद पहले से घायल थे लेकिन उन्होंने उन जवानों को पीछे छोड़ना स्वीकार नहीं किया. उन्होंने घायल सैनिकों को उठाया और उन्हें सुरक्षित भारतीय मोर्चे तक पहुंचाने में मदद की यानी जिस समय हर सैनिक अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहा था, उस समय करम सिंह दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए आगे बढ़ रहे थे.
यही वजह है कि उनकी कहानी केवल दुश्मन को मार गिराने की कहानी नहीं बनती. यह कहानी साथी को बचाने की भी है. यही वजह है कि करम सिंह भारतीय सैन्य इतिहास में केवल एक परमवीर चक्र विजेता के रूप में नहीं, बल्कि साथियों के लिए जान जोखिम में डालने वाले सैनिक के रूप में भी याद किए जाते हैं.
कौन थे लांस नायक करम सिंह?
अब कहानी के अंत में लौटते हैं उस जवान पर, जिसके किस्से हमने एक-एक करके सुने. लांस नायक करम सिंह का जन्म 15 सितंबर 1915 को पंजाब के बरनाला जिले के सेहना गांव में हुआ था. वह किसान परिवार से थे और बाद में सेना में शामिल हुए. उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया और सैन्य अनुभव हासिल किया.
आजादी के बाद 1948 में जम्मू-कश्मीर की लड़ाई में उन्होंने तीतवाल के रिछमार गली क्षेत्र में असाधारण वीरता दिखाई. भारी दबाव, दुश्मन के लगातार हमले और खुद घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने मोर्चे को संभाले रखा. उनकी इसी वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. लंबा जीवन जीने के बाद 1995 में उनका निधन हुआ. लेकिन करम सिंह की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई.
उनकी कहानी आज भी उस हर भारतीय सैनिक की कहानी का हिस्सा है, जो मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपने साथियों और देश की रक्षा के लिए खड़ा रहता है. गोलियां खत्म हो सकती हैं, हथियार टूट सकते हैं, शरीर घायल हो सकता है. लेकिन करम सिंह की कहानी बताती है कि एक सैनिक का हौसला अगर जिंदा है, तो लड़ाई अभी बाकी है.




