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नौशेरा का वो नायक! सिर और सीने में लगी गोलियां, फिर भी लड़ते रहें जदुनाथ सिंह; पाकिस्तानियों को 3 बार खदेड़ा

शाहजहांपुर के वीर सपूत नायक जदुनाथ सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तक अपनी बहादुरी का परिचय दिया. 6 फरवरी 1948 को तैन धार में उन्होंने बेहद कम सैनिकों के साथ दुश्मन के लगातार तीन हमलों का सामना किया.

नौशेरा का वो नायक! सिर और सीने में लगी गोलियां, फिर भी लड़ते रहें जदुनाथ सिंह; पाकिस्तानियों को 3 बार  खदेड़ा
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सागर द्विवेदी
सागर द्विवेदी7 Mins Read

Updated on: 12 Aug 2026 9:00 AM IST

'ये देश है वीर जवानों का…अलबेलों का, मस्तानों का…इस देश का यारों क्या कहना!'

जब भी देश की मिट्टी के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने वाले वीर जवानों की बात होती है तो कुछ नाम इतिहास के पन्नों से निकलकर सीधे हमारे दिलों में उतर जाते हैं. ऐसे ही एक जांबाज थे नायक जदुनाथ सिंह, जिनकी वीरता की किस्से सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की धरती पर जन्मे इस वीर सपूत ने युद्धभूमि में ऐसी बहादुरी दिखाई, जिसकी मिसाल भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा गूंजती रहेगी. दुश्मन संख्या में कई गुना ज्यादा था, सामने मुश्किल हालात थे और साथ देने वाले सैनिक लगातार कम होते जा रहे थे… लेकिन जदुनाथ सिंह के हौसले पर इसका तनिक भी असर नहीं पड़ा बल्कि एक-एक कर दुश्मनों को खदेड़ते रहें.

ये कहानी उस दौर की है जब भारत आजादी के बाद अपने अस्तित्व और सीमाओं की रक्षा के लिए एक बड़ी जंग लड़ रहा था. जदुनाथ सिंह ने अपने सैन्य जीवन में द्वितीय विश्व युद्ध के बर्मा मोर्चे से लेकर 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तक अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया. लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे ऐतिहासिक अध्याय लिखा गया 6 फरवरी 1948 को जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर की तैन धार चौकी पर, जहां बेहद कम सैनिकों के साथ उन्होंने दुश्मन के लगातार तीन हमलों का सामना किया और झंडा लहराया. आइए एक-एक उनके किस्से पर नजर डालते हैं और कहते हैं जवान तुझे सलाम....

जब बर्मा के मोर्चे पर जापानियों से भिड़े जदुनाथ सिंह

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जदुनाथ सिंह ने ब्रिटिश भारतीय सेना की राजपूत रेजिमेंट में रहते हुए बर्मा मोर्चे पर जापानी सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी. यही वह दौर था, जब उन्होंने युद्ध की कठिन परिस्थितियों, दुश्मन की रणनीति और बेहद विपरीत हालात में मोर्चा संभालने का अनुभव हासिल किया.

बर्मा का युद्ध आसान नहीं था. घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियां और लगातार दुश्मन का दबाव सैनिकों के लिए बड़ी चुनौती थे. जदुनाथ सिंह ने इन परिस्थितियों में भी अपने सैन्य कर्तव्य को निभाया. युद्ध के मैदान का यही अनुभव आगे चलकर उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ.

कुछ साल बाद जब भारत आजाद हुआ और जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना का हमला हुआ, तब जदुनाथ सिंह को एक बार फिर असली परीक्षा से गुजरना था. इस बार सामने सिर्फ दुश्मन नहीं था, बल्कि भारत की नई-नई आजादी और उसकी सीमाओं की रक्षा का सवाल था और इसी मोर्चे पर उनकी वीरता की वह कहानी लिखी गई, जिसे आज पूरा देश परमवीर चक्र विजेता नायक जदुनाथ सिंह के नाम से जानता है.

नौ सैनिकों के साथ हजारों दुश्मनों का सामना

साल 1948 की शुरुआत में नौशेरा सेक्टर बेहद संवेदनशील बना हुआ था. पाकिस्तान समर्थित हमलावर भारतीय चौकियों पर कब्जा करने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे. तैन धार की एक अग्रिम चौकी की जिम्मेदारी नायक जदुनाथ सिंह और उनके जवानों के पास थी.

6 फरवरी 1948 की सुबह पहाड़ियों पर घना कोहरा छाया हुआ था. अचानक गोलियों और मशीनगनों की आवाज से पूरा इलाका गूंज उठा. दुश्मन ने भारतीय चौकी पर हमला बोल दिया. जदुनाथ सिंह के पास सैनिकों की संख्या बेहद कम थी, लेकिन उन्होंने घबराने के बजाय मोर्चा संभाल लिया. अपनी छोटी टुकड़ी के साथ उन्होंने दुश्मन की बढ़त रोक दी. भारतीय जवानों की जवाबी फायरिंग के सामने हमलावरों को पीछे हटना पड़ा. लेकिन जदुनाथ सिंह जानते थे कि यह हमला आखिरी नहीं है. कुछ ही समय बाद दुश्मन ने दूसरी बार और ज्यादा ताकत के साथ हमला किया.

इस बार हालात और भी मुश्किल थे. भारतीय जवान लगातार लड़ रहे थे और इसी दौरान जदुनाथ सिंह भी घायल हो गए. लेकिन घायल होने के बाद भी उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा. उन्होंने अपने घायल साथियों की स्थिति देखी और उपलब्ध हथियार संभालकर दुश्मन पर जवाबी फायरिंग जारी रखी. उनके नेतृत्व और आक्रामक पलटवार ने एक बार फिर हमलावरों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. लेकिन इन दो हमलों के बाद भारतीय चौकी की स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी. कई जवान वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और जदुनाथ सिंह खुद भी बुरी तरह घायल थे. अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी. क्या तीसरे हमले में भी इस छोटी-सी चौकी को बचाया जा सकता है?

घायल थे, साथी शहीद हो चुके थे... फिर भी अकेले दुश्मन पर टूट पड़े

अब तैन धार की उस चौकी पर हालात बेहद भयावह थे. जदुनाथ सिंह के कई साथी शहीद हो चुके थे और वह खुद भी गंभीर रूप से घायल थे. लेकिन दुश्मन ने हार नहीं मानी. उसने तीसरा और सबसे बड़ा हमला शुरू कर दिया. जदुनाथ सिंह समझ चुके थे कि अगर यह हमला सफल हुआ तो चौकी पर कब्जा हो सकता है. भारतीय सेना की मदद पहुंचने में अभी समय लग सकता था. ऐसे में उन्होंने पीछे हटने के बजाय दुश्मन को रोकने का फैसला किया.

घायल शरीर के बावजूद वह हथियार लेकर मोर्चे से बाहर निकले और दुश्मन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. एक घायल सैनिक से इस तरह के पलटवार की उम्मीद हमलावरों ने शायद नहीं की थी. जदुनाथ सिंह के अचानक और आक्रामक जवाब से दुश्मन की बढ़त रुक गई. उन्होंने लगातार फायरिंग करते हुए हमलावरों को आगे बढ़ने से रोक दिया.

लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए जदुनाथ सिंह

उनकी रणनीति सिर्फ दुश्मन को मारना नहीं थी, बल्कि उसे ज्यादा से ज्यादा देर तक उसी इलाके में उलझाए रखना था, ताकि पीछे से भारतीय सेना की मदद पहुंच सके. इसी दौरान दुश्मन की गोलियां जदुनाथ सिंह के सिर और सीने में लगीं. वह गंभीर रूप से घायल हुए और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन शहादत से पहले वह अपना सबसे बड़ा काम कर चुके थे.

उन्होंने दुश्मन को इतना समय तक रोके रखा कि भारतीय सेना की अतिरिक्त टुकड़ी वहां पहुंच सकी. इसके बाद भारतीय सैनिकों ने मोर्चा संभाला और हमलावरों को पीछे धकेल दिया यानी जदुनाथ सिंह ने अपनी आखिरी सांस तक सिर्फ लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि अपने पीछे आने वाले सैनिकों के लिए पूरा मोर्चा बचाकर रखा और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए.

जदुनाथ सिंह की इसी सर्वोच्च बलिदान और असाधारण वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. जदुनाथ सिंह की कहानी इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ एक सैनिक की शहादत की कहानी नहीं, बल्कि उस जिद की कहानी है जिसमें एक जवान ने आखिरी पल तक यही माना. मोर्चा तब तक नहीं छूटेगा, जब तक सांस बाकी है.

जदुनाथ सिंह को क्यों कहा जाता था हनुमान भगत बाल ब्रह्मचारी?

इतना नहीं परमवीर चक्र विजेता नायक जदुनाथ सिंह बचपन से ही हनुमान जी के सच्चे भक्त थे. उनकी निष्ठा और अच्छे चरित्र के कारण उन्हें ग्रामीण 'हनुमान भगत बाल ब्रह्मचारी' कहकर बुलाते थे. हनुमान जी की तरह ही उन्होंने आजीवन विवाह नहीं करने का फैसला लिया और वे कुश्ती लड़ने के शौकीन माने जाते थे.

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