एक हाथ में प्लास्टर दूसरे हाथ में मशीन गन, पढ़िए मेजर सोमनाथ शर्मा के वीरता के किस्से- भगवत गीता देख दुश्मनों ने किया Salute!
हाथ में प्लास्टर के बावजूद बडगाम में दुश्मन से लड़े मेजर सोमनाथ शर्मा. जानिए भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता की वीरता और शहादत के 14 किस्से.
मैं अपने सामने आए कर्तव्य का पालन कर रहा हूं. यहां मौत का क्षणिक जरूर है लेकिन जब मैं गीता में भगवान कृष्ण के वचन को याद करता हूं तो वो डर भी मिट जाता है. भगवान कृष्ण ने कहा था की आत्मा अमर है तो फिर क्या फर्क पड़ता है की शरीर है या नष्ट हो गया. पिताजी मैं आपको डरा नहीं रहा हूं...लेकिन अगर मैं मर गया तो मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मैं एक बहादुर सिपाही की मौत मारूंगा. मरते समय मुझे प्राण देने का कोई दुख नहीं होगा ईश्वर आप सब पर अपनी कृपा बनाए रखें...
ये शब्द उस जवान के थे, जिसने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने से पहले भी अपने परिवार को हिम्मत दी थी. ये थे मेजर सोमनाथ शर्मा, जिन्हें मरणोपरांत भारत के पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. 21 जून 1950 को उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. कश्मीर में 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बडगाम की लड़ाई में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया और आखिरी सांस तक अपने सैनिकों का नेतृत्व किया.
सोमनाथ शर्मा की वीरता सिर्फ उनके अंतिम युद्ध तक सीमित नहीं थी. उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जो उनके कर्तव्य, अनुशासन, साहस और देशभक्ति की मिसाल पेश करते हैं. संसद टीवी से बातचीत में लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी ने भी सोमनाथ शर्मा से जुड़े कई प्रसंग साझा किए हैं. तो आइए, एक-एक करके जानते हैं मेजर सोमनाथ शर्मा के उन प्रेरणादायक किस्सों को, जिन्हें आज भी भारतीय सेना की वीरता की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है.
1. हाथ में प्लास्टर, फिर भी मोर्चे पर जाने का फैसला
1947 में जब कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायली हमलावरों का खतरा बढ़ रहा था, तब मेजर सोमनाथ शर्मा के हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था. चोट उन्हें हॉकी खेलते समय लगी थी. इसके बावजूद जब उनकी डेल्टा कंपनी को कश्मीर भेजे जाने की तैयारी हुई, तो उन्होंने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे कंपनी कमांडर हैं और अपनी कंपनी को छोड़कर नहीं बैठ सकते. हाथ घायल होने के बावजूद वे अपने जवानों के साथ कश्मीर के लिए रवाना हुए.
2. बारामूला से श्रीनगर की ओर बढ़ता दुश्मन
मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी जब श्रीनगर पहुंची, तब हालात बेहद तनावपूर्ण थे. पाकिस्तानी कबायली हमलावर बारामूला तक पहुंच चुके थे और धीरे-धीरे श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे थे. भारतीय सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि किसी भी कीमत पर दुश्मन को श्रीनगर और उसके एयरफील्ड तक पहुंचने से रोका जाए.
3. बारात के बहाने छिपे 600-700 हमलावर
3 नवंबर 1947 को बडगाम के इलाके में कुछ लोगों को लगा कि गांव में एक बारात आई हुई है. लेकिन यह कोई सामान्य बारात नहीं थी. हमलावरों ने आम लोगों के बीच छिपकर भारतीय सैनिकों को धोखा देने की कोशिश की थी. मौका मिलते ही करीब 600-700 हमलावरों ने मेजर सोमनाथ शर्मा की छोटी सी कंपनी पर हमला कर दिया. भारतीय सैनिक संख्या में बहुत कम थे, लेकिन मेजर शर्मा ने मोर्चा छोड़ने के बजाय लड़ाई जारी रखी.
4. टूटे हाथ के बावजूद खुद मैगजीन भरना
यह उनकी वीरता का सबसे प्रेरक प्रसंगों में से एक है. उनका एक हाथ प्लास्टर में था, फिर भी वे लगातार अपने सैनिकों के बीच घूम रहे थे. वे जवानों की मैगजीन भरने में मदद करते, उनका हौसला बढ़ाते और उन्हें दुश्मन का सामना करने के लिए प्रेरित करते रहे. घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी परेशानी को सैनिकों के सामने कमजोरी नहीं बनने दिया.
5. 'मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा'
जब दुश्मन बेहद करीब पहुंच गया और भारतीय सैनिकों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी, तब मेजर सोमनाथ शर्मा ने पीछे हटने से इनकार कर दिया. दुश्मन से केवल 50 गज की दूरी पर है, लेकिन वे आखिरी गोली और आखिरी जवान तक लड़ेंगे. यह उनके नेतृत्व और दृढ़ संकल्प की सबसे बड़ी मिसाल बनी.
6. खुद मशीन गन संभालकर सैनिकों का हौसला बढ़ाया
बडगाम की लड़ाई के दौरान मेजर शर्मा सिर्फ आदेश देने वाले कमांडर बनकर पीछे नहीं रहे. उन्होंने एक हाथ से मशीन गन भी संभाली और सामने से लड़ाई में शामिल रहे. अपने कमांडर को इस तरह लड़ते देखकर उनके सैनिकों का हौसला और बढ़ गया.
7. आखिरी सांस तक लड़ते हुए बलिदान
लड़ाई के दौरान एक मोर्टार बम मेजर शर्मा के पास आकर गिरा. वह गंभीर रूप से घायल हुए और अंततः मातृभूमि के लिए बलिदान हो गए. लेकिन उनकी मौत के बाद भी उनकी कंपनी ने लड़ाई नहीं छोड़ी. उनके नेतृत्व और साहस से प्रेरित होकर सैनिकों ने करीब छह घंटे तक दुश्मन का मुकाबला किया और बाद में पहुंची मदद ने हमलावरों को पीछे खदेड़ दिया.
8. उनकी शहादत से श्रीनगर एयरफील्ड बचा
मेजर सोमनाथ शर्मा और उनके साथियों की लड़ाई का सबसे बड़ा महत्व यह था कि उन्होंने दुश्मन को श्रीनगर एयरफील्ड तक पहुंचने से रोका. उस समय एयरफील्ड बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि यही रास्ता था जिससे भारतीय सेना और अतिरिक्त सैनिक कश्मीर पहुंच सकते थे. अगर एयरफील्ड पर कब्जा हो जाता, तो कश्मीर में भारतीय सेना की मदद पहुंचाना बेहद मुश्किल हो सकता था.
9. जेब में हमेशा रहती थी भगवद्गीता
मेजर सोमनाथ शर्मा अपनी मां द्वारा दी गई भगवद्गीता अक्सर अपनी जेब में रखते थे. उनकी शहादत के बाद जब उनका शरीर मिला. जिसको लेकर कहा जाता है कि वह गीता के पन्नों से ढका हुआ था. यह प्रसंग उनके लिए गीता और उसके विचारों के महत्व को दिखाता है.
10. मौत से पहले पिता को लिखी चिट्ठी
मेजर शर्मा ने दिसंबर 1941 में अपने पिता को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कर्तव्य और मृत्यु को लेकर अपने विचार व्यक्त किए. उन्होंने भगवद्गीता में भगवान कृष्ण के उस संदेश का उल्लेख किया कि आत्मा अमर है. उन्होंने लिखा कि अगर उनकी मृत्यु होती है तो उन्हें विश्वास है कि वे एक बहादुर सैनिक की मौत मरेंगे और उन्हें अपने प्राण देने का दुख नहीं होगा.
11. दुश्मन ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया
कहा गया है कि मेजर शर्मा की जेब में रखी भगवद्गीता को उनके शरीर से निकाला गया और उसके पन्नों से उनके शरीर को ढका गया. इसे दुश्मन की ओर से उनकी बहादुरी के प्रति सम्मान के तौर पर प्रस्तुत किया गया है यानी जिस सैनिक से वे युद्ध कर रहे थे, उसकी वीरता को उन्होंने भी स्वीकार किया.
12. परिवार में भी सेना की परंपरा
मेजर सोमनाथ शर्मा का परिवार भी सेना से जुड़ा हुआ था. उनके पिता मेजर जनरल थे और उनके भाई-बहन भी सैन्य/चिकित्सा सेवा से जुड़े रहे. यानी उनके लिए सेना और देशसेवा कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि परिवार में मौजूद सेवा की परंपरा का भी हिस्सा था.
13. बचपन में ही बना लिया था बड़ा लक्ष्य
उनके भाई से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है. बताया गया है कि बचपन में मेजर सोमनाथ शर्मा अपने छोटे भाइयों को सावधान की मुद्रा में खड़ा करके अपने हाथ की लकीर दिखाते थे और कहते थे कि इस लकीर में या तो आर्मी में जाने या परमवीर चक्र जीतने की बात लिखी है. बाद में उनकी जिंदगी ने जैसे इस संकल्प को सच कर दिखाया.
14. उनकी शहादत का सबसे बड़ा परिणाम
मेजर सोमनाथ शर्मा की लड़ाई सिर्फ एक सैन्य मुठभेड़ नहीं थी. इसे कश्मीर के भविष्य से जोड़कर देखा गया है. बडगाम में उनकी कंपनी ने जिस तरह दुश्मन को रोके रखा, उससे श्रीनगर एयरफील्ड सुरक्षित रहा और भारतीय सेना के लिए कश्मीर में पहुंचने का रास्ता बना रहा. इसी वजह से उनकी वीरता को कश्मीर के भारत का हिस्सा बने रहने की कहानी का महत्वपूर्ण अध्याय बताया गया है.




