US Venezuela Crisis: मादुरो की गिरफ्तारी से हिला ग्लोबल साउथ, अमेरिका के एक्शन पर भारत के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा
US Venezuela Crisis: अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सैन्य कार्रवाई में पकड़ लेने के बाद भारत एक गंभीर कूटनीतिक दुविधा में फंस गया है. एक ओर भारत अमेरिका के साथ ट्रेड डील और रणनीतिक रिश्तों को साधे रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के सिद्धांत भी उसके सामने हैं. भारत और वेनेजुएला के रिश्ते मुख्य रूप से तेल व्यापार तक सीमित रहे हैं, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद काफी कमजोर पड़ गए.
US Venezuela Crisis: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लेने की घोषणा ने भारत को एक असहज कूटनीतिक स्थिति में खड़ा कर दिया है. एक ओर अमेरिका का यह एकतरफा कदम है, तो दूसरी ओर भारत की वह घोषित विदेश नीति है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की वकालत करती रही है.
स्टेट मिरर अब WhatsApp पर भी, सब्सक्राइब करने के लिए क्लिक करें
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत आमतौर पर अपने सीमाई क्षेत्र से दूर के विवादों पर बेहद सतर्क और सीमित प्रतिक्रिया देता रहा है, लेकिन इस बार मामला अलग है. ग्लोबल साउथ के कई देश भारत की ओर देख रहे हैं कि क्या वह किसी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज उठाएगा.
ट्रंप का हमला और भारत की ट्रेड डील की मजबूरी
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है. ट्रंप प्रशासन पहले ही भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ थोप चुका है, जिसमें रूस से तेल खरीदने को लेकर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त दंड भी शामिल है. दिल्ली का मानना है कि उसे चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया गया, क्योंकि रूस से तेल खरीदने पर न तो चीन के खिलाफ सख्त कार्रवाई हुई और न ही यूरोप के खिलाफ. भारत ने इसके बावजूद रूसी तेल आयात में धीरे-धीरे कटौती की है.
वेनेजुएला से रिश्ते: कभी तेल की धुरी, अब सीमित संपर्क
भारत और वेनेजुएला के रिश्ते मुख्य रूप से ऊर्जा व्यापार पर टिके रहे हैं. वर्ष 2019-20 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6.39 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें भारत का आयात 6.05 अरब डॉलर था. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद तस्वीर तेजी से बदली.
- 2020-21: कुल व्यापार 1.27 अरब डॉलर
- 2021-22: 424 मिलियन डॉलर
- 2022-23: 431 मिलियन डॉलर
स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत-वेनेजुएला व्यापार लगातार सिमटता गया.
चावेज़ से मादुरो तक: राजनीतिक रिश्तों का इतिहास
2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के संबंध चरम पर थे. उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की थी. निकोलस मादुरो ने 2012 में भारत का दौरा तब किया था जब वे वेनेजुएला के विदेश मंत्री थे. चावेज़ के निधन के बाद यूपीए सरकार ने उनके अंतिम संस्कार में मंत्री सचिन पायलट को भेजा था. 2014 के बाद मोदी सरकार के दौरान भी सीमित लेकिन निरंतर कूटनीतिक संपर्क बना रहा - चाहे वह सुषमा स्वराज की मुलाकात हो, या उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का NAM शिखर सम्मेलन में शामिल होना.
हालिया वर्षों में संपर्क, लेकिन सतर्कता के साथ
2021 और 2022 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान वेनेजुएला के विदेश मंत्रियों से मुलाकात की. 2023 में वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज भारत आईं और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण समेत कई वरिष्ठ नेताओं से बातचीत हुई. इसके बावजूद भारत ने हमेशा वेनेजुएला को लेकर संतुलित और सीमित रुख अपनाया.
भारतीय नागरिकों के लिए चेतावनी
वेनेजुएला में 100 से भी कम भारतीय नागरिक हैं. हालात बिगड़ने के बाद विदेश मंत्रालय ने एडवाइजरी जारी करते हुए भारतीयों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने और अत्यधिक सतर्कता बरतने की सलाह दी है. MEA ने भारतीय दूतावास, कराकस से संपर्क में रहने के लिए आपात नंबर और ईमेल भी साझा किया है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: अमेरिका अकेला, भारत खामोश
रूस ने अमेरिकी कार्रवाई को “सशस्त्र आक्रामकता” करार देते हुए तीखी आलोचना की है. यूरोपीय संघ ने केवल अंतरराष्ट्रीय कानून और संयम की बात कही, जबकि चिली और कोलंबिया ने चिंता जताई. दिलचस्प यह है कि अधिकांश G-20 देश अब तक खुलकर अमेरिका के खिलाफ नहीं बोले हैं. ऐसे में भारत भी फिलहाल कोई बयान देने की जल्दी में नहीं दिख रहा.
दांव कम, लेकिन सिद्धांतों की परीक्षा
राजनीतिक और आर्थिक रूप से वेनेजुएला भारत के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का सवाल भारत की घोषित विदेश नीति की कसौटी जरूर बन गया है. यही कारण है कि दिल्ली इस समय बयान देने से ज्यादा, हालात को पढ़ने और वैश्विक संतुलन साधने में जुटी दिख रही है.





