कर्नाटक में सत्ता का नया संग्राम! कैबिनेट की कुर्सियों पर भिड़े सिद्धारमैया और डीके, हाईकमान की बढ़ी टेंशन
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के बाद कैबिनेट गठन पर सियासी घमासान तेज है. सिद्धारमैया और डीके खेमों की दावेदारी के बीच हाईकमान संतुलन साधने में जुटा है.
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन का अध्याय भले ही तय माना जा रहा हो, लेकिन असली राजनीतिक लड़ाई डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच जारी है. मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी Siddaramaiah का प्रभाव कम नहीं हुआ है और यही वजह है कि नई सरकार के गठन से पहले कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर व्यापक मंथन चल रहा है. संभावित मुख्यमंत्री D. K. Shivakumar अपने समर्थकों को सरकार में मजबूत हिस्सेदारी दिलाने की कोशिश में हैं. जबकि सिद्धारमैया खेमा अपने राजनीतिक वजूद और भविष्य की भूमिका को सुरक्षित रखना चाहता है. दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के साथ लगातार बैठकों के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई कैबिनेट में किस गुट का दबदबा रहेगा, कौन से नेताओं को अहम मंत्रालय मिलेंगे और क्या गुटीय राजनीति से अलग नेताओं को भी जगह मिलेगी.
मुख्यमंत्री बदल रहा, लेकिन सत्ता का केंद्र कौन?
कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नए मुख्यमंत्री का चयन नहीं, बल्कि सत्ता के नए समीकरण को स्थिर रखना है. सिद्धारमैया ने पद छोड़ दिया है, लेकिन उनके समर्थक विधायकों और मंत्रियों की संख्या अब भी प्रभावशाली बनाए रखने की कोशिश में वो जुटे हैं. यही कारण है कि नई सरकार के गठन में उनका राजनीतिक वजन नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
सूत्रों के मुताबिक, सिद्धारमैया खेमे की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि नई व्यवस्था में उनके समर्थकों की हिस्सेदारी प्रमुख विभागों के साथ बनी रहे और सरकार के प्रमुख निर्णयों में उनकी भूमिका समाप्त न हो. दूसरी ओर डीके शिवकुमार चाहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें अपनी टीम बनाने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिले.
4 डिप्टी सीएम फॉर्मूला क्यों चर्चा में?
कांग्रेस के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा चार उपमुख्यमंत्री बनाने के प्रस्ताव को लेकर है. माना जा रहा है कि यह फॉर्मूला क्षेत्रीय, जातीय और गुटीय संतुलन साधने के लिए सामने आया है. यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो वोक्कालिगा, दलित, लिंगायत और अल्पसंख्यक समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की जा सकती है. राजनीतिक जानकार इसे डीके शिवकुमार की शक्तियों को संतुलित करने और सिद्धारमैया खेमे को संतुष्ट रखने की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं.
सिद्धारमैया खेमे की सबसे बड़ी मांग क्या?
सिद्धारमैया समर्थक नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस सरकार की कई प्रमुख गारंटी योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों की राजनीतिक सफलता का श्रेय उनके नेतृत्व को जाता है. इसलिए नई सरकार में उनके विश्वासपात्र नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए. सिद्धारमैया खेमा यह दलील दे रहा है कि कांग्रेस सरकार की पहचान बनी पांच गारंटी योजनाओं- शक्ति, गृह ज्योति, गृह लक्ष्मी, अन्न भाग्य और युवा निधि की सफलता का राजनीतिक लाभ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व को मिला है. इसलिए नई सरकार में उनके समर्थकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
सबसे ज्यादा चर्चा उनके बेटे और एमएलसी यतींद्र सिद्धारमैया को लेकर है. राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि उन्हें सरकार या संगठन में बड़ी भूमिका मिल सकती है. इसके अलावा दलित और पिछड़े वर्ग के कुछ वरिष्ठ नेताओं को भी कैबिनेट में प्रभावशाली विभाग दिए जाने की पैरवी की जा रही है. खेमे की नजर विशेष रूप से राजस्व, ग्रामीण विकास, सहकारिता, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति और सामाजिक न्याय जैसे विभागों पर बताई जा रही है.
DK किन चेहरों को आगे बढ़ाना चाहते हैं?
डीके शिवकुमार का खेमा मानता है कि संगठन को मजबूत करने और 2023 की जीत सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका निर्णायक रही थी. ऐसे में मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद उनके समर्थक नेताओं को सरकार में बड़ी हिस्सेदारी मिलना स्वाभाविक माना जा रहा है.
राजनीतिक चर्चाओं में ईश्वर खंड्रे, लक्ष्मी हेब्बालकर, रिजवान अरशद और कुछ अन्य क्षेत्रीय नेताओं के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं. इनमें से कुछ नेताओं को न केवल कैबिनेट में जगह मिलने बल्कि उपमुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी माना जा रहा है.
डीके खेमे की रुचि शहरी विकास, उद्योग, बेंगलुरु विकास, लोक निर्माण और ऊर्जा जैसे प्रभावशाली विभागों में बताई जा रही है, जिनका सीधा संबंध विकास परियोजनाओं और राजनीतिक प्रभाव से होता है.
क्या मौजूदा मंत्रियों के पत्ते कट सकते हैं?
नई सरकार के गठन के साथ बड़े पैमाने पर फेरबदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा. पार्टी सूत्रों के अनुसार 10 से 12 मौजूदा मंत्रियों के प्रदर्शन की समीक्षा की गई है और कुछ चेहरों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है.
कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यदि नई सरकार को नई शुरुआत का संदेश देना है तो कुछ नए चेहरों को मौका देना आवश्यक होगा. यही वजह है कि कैबिनेट में बदलाव केवल गुटीय संतुलन का मामला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश का भी हिस्सा माना जा रहा है.
'गुट-बाहरी' नेताओं की भूमिका क्यों अहम हो गई?
दिल्ली नेतृत्व नहीं चाहता कि नई सरकार पूरी तरह दो शक्ति केंद्रों के बीच बंटी हुई दिखाई दे. इसलिए ऐसे नेताओं को भी महत्व मिलने की संभावना है जो किसी एक खेमे से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं.
उत्तर कर्नाटक, तटीय कर्नाटक और कल्याण-कर्नाटक क्षेत्र के कई विधायक इस श्रेणी में आते हैं. पार्टी इन नेताओं को शामिल कर यह संदेश देना चाहती है कि सरकार केवल गुटीय समीकरणों पर नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर बनाई जा रही है. इन्हें पर्यटन, खेल, कौशल विकास, लघु सिंचाई और मत्स्य पालन जैसे विभाग मिल सकते हैं, हालांकि अंतिम फैसला नेतृत्व स्तर पर होगा.
जातीय समीकरण क्यों तय करेंगे कैबिनेट का चेहरा?
कर्नाटक की राजनीति में केवल राजनीतिक वफादारी पर्याप्त नहीं होती. कांग्रेस को वोक्कालिगा, लिंगायत, दलित, कुरुबा, मुस्लिम और अनुसूचित जनजाति समुदायों के बीच संतुलन भी साधना होगा.
यही वजह है कि कई बार अपेक्षाकृत कम चर्चित विधायक भी मंत्री बन जाते हैं, जबकि बड़े और चर्चित चेहरे इंतजार करते रह जाते हैं. नई सरकार के गठन में भी यही सामाजिक गणित सबसे निर्णायक कारकों में से एक माना जा रहा है.
असली लड़ाई 2028 की है
कांग्रेस के भीतर चल रही यह कवायद केवल मंत्री पदों के बंटवारे तक सीमित नहीं है. नई कैबिनेट में शामिल होने वाला हर नेता 2028 के विधानसभा चुनावों और राज्य के भविष्य के नेतृत्व समीकरण का संकेत माना जाएगा.
सिद्धारमैया सक्रिय राजनीति में बने रहने का संकेत दे चुके हैं, जबकि डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद संभालकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहेंगे. ऐसे में नई कैबिनेट का गठन यह तय करेगा कि कांग्रेस में सत्ता का केंद्र पूरी तरह बदलता है या फिर पर्दे के पीछे दो शक्ति केंद्रों का संतुलन आगे भी बना रहता है.
कर्नाटक CM 'नाटक' की टाइमलाइन
10 मई, 2023 - कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीते.
17 मई, 2023 - बंद दरवाज़ों के पीछे चर्चा के बाद पार्टी आलाकमान ने सिद्धारमैया का समर्थन किया.
20 मई, 2023 - सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
5 जुलाई, 2025 - आलाकमान ने रणदीप सुरजेवाला को बेंगलुरु भेजा; संदेश: "नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं होगा".
8 जुलाई, 2025 - DKS गुट के विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर DKS को CM बनाने का समर्थन किया.
20 नवंबर, 2025 - कांग्रेस सरकार ने अपना आधा कार्यकाल पूरा किया.
29 नवंबर, 2025 - सिद्दा और DKS के बीच पहली “नाश्ता बैठक”.
29 नवंबर, 2025 - उसी दिन दूसरी “नाश्ता बैठक” भी हुई.
19 मई, 2026 - कर्नाटक सरकार के 3 साल पूरे; मल्लिकार्जुन खड़गे ने सिद्धारमैया और DKS के साथ बंद दरवाज़ों के पीछे बैठक की.
25 मई, 2026 - सिद्धारमैया और DKS दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान से मिलने पहुँचे.
26 मई, 2026 - लगातार बैठकों के बाद कांग्रेस आलाकमान ने यथास्थिति बनाए रखी.
28 मई, 2026 - सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया.




