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कर्नाटक में पावर सेंटर बदल गया? प्रियांक खड़गे को गृह मंत्रालय देकर किसने साधा बड़ा गेम?

कर्नाटक में पावर सेंटर बदलाव की चर्चा तेज है. क्या प्रियांक खड़गे को गृह मंत्रालय देकर कांग्रेस कोई बड़ा राजनीतिक गेम खेल रही है? पूरी सच्चाई और विश्लेषण.

कर्नाटक में पावर सेंटर बदल गया? प्रियांक खड़गे को गृह मंत्रालय देकर किसने साधा बड़ा गेम?
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( Image Source:  facebook shivkumar sidharamaih mallikarjun )

कर्नाटक की राजनीति को लेकर इन दिनों “पावर सेंटर बदलने” जैसी चर्चाएं सोशल और मीडिया में चर्चा में है, लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार एक स्पष्ट सामूहिक नेतृत्व मॉडल पर काम कर रही है. पूर्व मुख्यमंत्री Siddaramaiah अभी तक प्रशासनिक फैसलों की जिम्मेदारी संभालते रहे, अब मुख्यमंत्री DK Shivakumar शासन, प्रशासन, संगठन और राजनीतिक मैनेजमेंट को लीड कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को दिशा दे रहे हैं. इसी ढांचे में मल्लिकार्जुन के बेटे Priyank Kharge को लेकर चर्चा चरम पर है.

प्रियांक को प्रदेश का गृह मंत्री की जिम्मेदारी मिलने के बाद से सभी भौचक्के हैं. इससे प्रियांक के सियासी कद में इजाफा हुआ है. यानी सियासी बदलाव खुद ब खुद बता रहा है कि कर्नाटक में पुराने पॉवर ब्लॉक की जगह नए पॉवर ब्लॉक ने ले ली है.

क्या पावर सेंटर वाकई बदल रहा है?

कर्नाटक में सत्ता के केंद्र में अब शिवकुमार आ गए हैं. जब से शिवकुमार सीएम बने हैं, वहीं सरकार की नीतिगत और प्रशासनिक दिशा तय करते रहे हैं. यानी इस समय डीके शिवकुमार राजनीतिक मैनेजमेंट और संगठन के साथ सरकार को भी संभाल रहे हैं. अब दोनों जिम्मेदारी डीके के पास है. सीएम पद से हटने के बाद सिद्धारमैया अपने गुट को मजबूत बनाए रखने में जुट गए हैं. ताकि कर्नाटक की राजनीति में उनकी पकड़ बनी रहे.

प्रियांक को आगे बढ़ाना किसी रणनीति का हिस्सा है?

Priyank Kharge को लेकर जो चर्चाएं हो रही हैं, वह मूल रूप से कांग्रेस की “युवा नेतृत्व विस्तार” नीति का हिस्सा हैं. मंत्रिमंडल में विभागों का बंटवारा राज्य कैबिनेट और हाईकमान की सहमति से होता है, जिसमें क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन देखा जाता है. लेकिन इसे प्रदेश की राजनीति में नए सियासी समीकरण के रूप में देखा जा रहा है.

क्या मल्लिकार्जुन खड़गे का प्रभाव बढ़ा?

Mallikarjun Kharge का प्रभाव राष्ट्रीय संगठन तक सीमित और रणनीतिक है. वे राज्यों में स्थिरता और संगठनात्मक मजबूती पर फोकस करते हैं. लेकिन राज्य सरकार के रोजमर्रा के प्रशासनिक फैसले सीधे उनके नियंत्रण में नहीं होते. इसके बावजूद प्रियांक गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलने के बाद से यह माना जा रहा है कि अब कर्नाटक कांग्रेस और वहां की सरकार की शिवकुमार और मल्लिकार्जुन का प्रभाव बढ़ गया है. फिलहाल, सिद्धारमैया कमजोर पड़ गए हैं.

दरअसल, कर्नाटक में सियासी बदलाव का प्रियांक खड़गे को लाभ मिला है. इसके पीछे मल्लिकार्जुन खड़गे की भूमिका हो सकती. बावजूद इसके, कर्नाटक की राजनीति में इसे “भीतरघात” नहीं माना जा सकता. यह सरकार एक बैलेंस्ड मॉडल पर काम कर रही है, जो भी बदलाव हुए वो फार्मूले के तहत हुए हैं.

राजनीतिक संदर्भ क्या है?

कर्नाटक कांग्रेस के भीतर संतुलन की राजनीति लिंगायत, दलित, ओबीसी और युवा नेतृत्व के इर्दगिर्द घूम रहा है. सिद्धारमैया–डीके शिवकुमार पावर शेयरिंग की चर्चा इसी वजह से सुर्खियों में है. खड़गे परिवार का बढ़ता प्रभाव (मल्लिकार्जुन खड़गे के बाद प्रियांक की भूमिका) मीडिया में जोर पकड़ने की पीछे की वजह भी यही है.

क्या “गेम” चल रहा है?

राजनीतिक विश्लेषण में अगर इसे “गेम” कहा जा रहा है, तो उसका मतलब होता है कि किसी नेता को इम्पॉर्टेंट विभाग देकर भविष्य के लिए तैयार करना, पार्टी के भीतर नई लॉयल्टी और कंट्रोल स्ट्रक्चर सेट करना है. फिलहाल, कर्नाटक की राजनीति में इस समय कोई स्पष्ट “पावर शिफ्ट” नहीं दिखता, बल्कि यह एक संतुलन आधारित शासन मॉडल है. सिद्धारमैया प्रशासन संभाल रहे हैं,

डीके शिवकुमार संगठन मजबूत कर रहे हैं और खड़गे पार्टी को राष्ट्रीय दिशा दे रहे हैं. ऐसे में “भीतरघात” या “बड़े गेम” जैसी चर्चाएं अधिकतर राजनीतिक व्याख्या और मीडिया नैरेटिव का हिस्सा लगती हैं, न कि किसी ठोस बदलाव का संकेत.

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