जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज कर चर्चा में दिल्ली पुलिस, 1974 में गांधी मैदान से जेपी ने क्या की थी सेना और पुलिस से अपील
जंतर-मंतर लाठीचार्ज के बाद 1974 के गांधी मैदान की वह ऐतिहासिक घटना फिर चर्चा में है, जब जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिस से संविधान व अंतरात्मा के अनुसार काम करने की अपील की थी.
दिल्ली पुलिस चर्चा में क्यों?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को हटाने और लाठीचार्ज किए जाने के आरोपों के बाद दिल्ली पुलिस एक बार फिर चर्चा में है. घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए. उनका आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया.
वहीं, दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन निर्धारित शर्तों का उल्लंघन कर रहा था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी. इसी विवाद के बीच 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन और पुलिस की भूमिका की ऐतिहासिक चर्चा भी फिर तेज हो गई.
क्या था 5 जून 1974 का गांधी मैदान आंदोलन?
5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में लाखों लोगों की मौजूदगी में जयप्रकाश नारायण ने बिहार छात्र आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करते हुए "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया. आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं बल्कि शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, भ्रष्टाचार, चुनाव व्यवस्था और सामाजिक जीवन में व्यापक सुधार लाना था.
जेपी ने इस आंदोलन को अहिंसक जन आंदोलन बताया और महात्मा गांधी के सत्याग्रह के रास्ते पर चलने की बात कही. यह आंदोलन बाद में पूरे देश में फैला और इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ सबसे बड़े लोकतांत्रिक आंदोलनों में गिना गया.
जेपी ने सेना और पुलिस से क्या अपील की थी?
जेपी फाउंडेशन आर्काइब के अनुसार जेपी के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा वह था जिसमें उन्होंने पुलिस और सुरक्षा बलों से कहा था कि वे "अन्यायपूर्ण और गैर-कानूनी आदेशों का पालन न करें." उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि पुलिस और सेना का दायित्व केवल सरकार के प्रति नहीं बल्कि संविधान, राष्ट्र और जनता के प्रति भी है.
यदि किसी अधिकारी द्वारा ऐसा आदेश दिया जाए जो संविधान, कानून और नैतिकता के विरुद्ध हो, तो उस पर विचार करना चाहिए. यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जेपी ने कहीं भी सेना या पुलिस से विद्रोह, बगावत या सत्ता पलटने की अपील नहीं की थी. उनका आग्रह संविधान और कानून के दायरे में नैतिक जिम्मेदारी निभाने का था.
क्या जेपी के बयान पर विवाद हुआ था?
हाँ. उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने जेपी के इस बयान की कड़ी आलोचना की. सरकार का आरोप था कि जयप्रकाश नारायण सेना और पुलिस को सरकार के खिलाफ भड़का रहे हैं.
जेपी ने बाद में कई सार्वजनिक सभाओं और प्रेस बयानों में स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी प्रकार का सैन्य विद्रोह नहीं था. उनका कहना था कि भारतीय संविधान किसी भी सरकारी कर्मचारी को अवैध आदेश मानने के लिए बाध्य नहीं करता. उन्होंने कहा कि यदि किसी शांतिपूर्ण नागरिक पर अवैध बल प्रयोग का आदेश मिले तो उसका नैतिक मूल्यांकन होना चाहिए.
क्या कानून भी गैर-कानूनी आदेश न मानने की बात करता है?
भारतीय लोकतंत्र में पुलिस और सशस्त्र बल अनुशासित संस्थाएं हैं. सामान्य सिद्धांत यह है कि आदेशों का पालन किया जाए. लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों यह मानते हैं कि स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी आदेशों को अंधाधुंध मानना उचित नहीं है.
भारत के संविधान का अनुच्छेद 14, 19 और 21 नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं. यदि कोई आदेश इन अधिकारों का खुला उल्लंघन करता हो, तो उसकी न्यायिक समीक्षा संभव है. हालांकि, किसी अधिकारी को मौके पर आदेश मानना है या नहीं, यह अत्यंत जटिल कानूनी विषय है और इसका अंतिम निर्णय अदालतें करती हैं. इसलिए जेपी के बयान को आज के कानूनी संदर्भ में सीधे लागू करना उचित नहीं माना जाता.
क्या इसी के बाद लगा था आपातकाल?
जेपी आंदोलन ने पूरे देश में विपक्ष को एक मंच पर ला दिया. इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया. राजनीतिक संकट बढ़ा और 25 जून 1975 की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया.
आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण सहित हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए. इतिहासकार मानते हैं कि जेपी आंदोलन और उसके बाद की राजनीतिक घटनाएं भारतीय लोकतंत्र का महत्वपूर्ण मोड़ थीं.
JP का भाषण क्यों हो रहा है वायरल?
जब भी पुलिस कार्रवाई, विरोध प्रदर्शन या लोकतांत्रिक अधिकारों पर बहस होती है, तब 1974 का जेपी भाषण दोबारा चर्चा में आ जाता है. सोशल मीडिया पर अक्सर भाषण का छोटा हिस्सा साझा किया जाता है, जबकि पूरा संदर्भ सामने नहीं आता.
इतिहासकारों का कहना है कि जेपी का संदेश लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी पर केंद्रित था. वहीं उनके आलोचकों का मत था कि ऐसी अपील अनुशासित बलों की कमांड व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है.




