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ISRO में प्राइवेटाइजेशन का 'डर'! 5 हजार कर्मचारियों ने उठाए सवाल, आखिर किस दिशा में जा रहा स्पेस सेक्टर?

ISRO के निजीकरण को लेकर कर्मचारी संगठनों ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है. रॉकेट, सैटेलाइट और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े काम निजी कंपनियों को मिलने की चर्चा के बीच कर्मचारियों को अपनी भूमिका, भर्ती और तकनीकी क्षमता को लेकर चिंता है. जानें पूरा मामला.

ISRO में प्राइवेटाइजेशन का डर! 5 हजार कर्मचारियों ने उठाए सवाल, आखिर किस दिशा में जा रहा स्पेस सेक्टर?
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( Image Source:  @ANI )

भारत का स्पेस सेक्टर तेजी से निजी कंपनियों के लिए खुल रहा है. पिछले कुछ सालों में अंतरिक्ष से जुड़े कई कामों में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है. लेकिन इसी बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के कुछ कर्मचारी संगठनों के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है- आखिर अंतरिक्ष क्षेत्र का निजीकरण कितनी दूर तक जाएगा और भविष्य में रॉकेट, सैटेलाइट बनाने और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर चलाने में ISRO की अपनी भूमिका क्या रह जाएगी?

अब यह सवाल ISRO के शीर्ष स्तर तक पहुंच चुका है. 4 सितंबर को GSLV F-17/EOS-05 मिशन की सफल लॉन्चिंग के बाद The Times of India की एक रिपोर्ट में बताया गया कि ISRO के कई प्रमुख केंद्रों के कर्मचारी संगठनों ने ISRO चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन को पत्र लिखकर सरकार की योजनाओं को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है.

पांच पन्नों के इस पत्र पर VSSC, SDSC, URSC, LPSC, SAC, NRSC और IPRC समेत कई केंद्रों के कर्मचारी संगठनों के 9 प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए हैं. ये संगठन करीब 5,000 कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह संख्या ISRO की बताई गई कुल 18,100 कर्मचारियों की संख्या का लगभग 27 प्रतिशत है.

आखिर कर्मचारियों को किस बात की चिंता है?

कर्मचारी संगठनों की चिंता सिर्फ इस बात को लेकर नहीं है कि निजी कंपनियां भारत के स्पेस सेक्टर में प्रवेश कर रही हैं. 2020 से सरकार अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रही है. इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें निजी कंपनियां अंतरिक्ष से जुड़े सिस्टम को डिजाइन, तैयार और संचालित कर सकें, जबकि ISRO का मुख्य ध्यान रिसर्च और नई तकनीक विकसित करने पर हो.

क्या प्राइवेटाइजेशन का विरोध?

कर्मचारी संगठन भी निजी कंपनियों की वैध भागीदारी और अंतरिक्ष क्षेत्र के व्यावसायीकरण के विरोध में नहीं हैं. उनकी चिंता यह है कि ISRO के अंदर अभी जो काम किए जा रहे हैं, वे धीरे-धीरे संगठन के बाहर निजी कंपनियों को न सौंप दिए जाएं.

क्यों और बढ़ी कर्मचारियों की चिंता?

यह चिंता तब और बढ़ी जब IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका ने Business Today's India @ 100 Economy Summit में कहा कि भविष्य में ISRO लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी कंपनियों या सरकारी क्षेत्र की कंपनियों यानी PSUs द्वारा किया जाएगा.

यही बात ISRO कर्मचारियों के लिए बड़ा सवाल बन गई है. अगर ISRO खुद रॉकेट बनाना बंद कर देता है तो संगठन के अंदर उसकी मौजूदा इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का क्या होगा?

क्या-क्या काम पहले से ट्रांसफर हो रहे हैं?

कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में SSLV की तकनीक और उसके उत्पादन से जुड़ी तकनीक को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL को ट्रांसफर किए जाने का जिक्र किया है. इसके अलावा LVM3 की तकनीक को ट्रांसफर करने के लिए चल रही बोली प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है. LVM3 भारत का सबसे बड़ा लॉन्च व्हीकल है. इसी तरह PSLV से जुड़ी तकनीक के ट्रांसफर की कोशिशों का भी उल्लेख किया गया है.

कर्मचारी संगठनों ने ऐसी रिपोर्टों का भी जिक्र किया है, जिनमें कहा गया है कि भविष्य में सामान्य सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग का काम भी ISRO के बाहर जा सकता है. इसके अलावा तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में बनाए जा रहे Space Launch Complex जैसे नए लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निजी संस्थाओं के लिए खोले जाने की बात सामने आई है.

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि उन्हें इनमें से किसी एक कदम से जरूरी तौर पर परेशानी नहीं है. उनकी मुख्य चिंता यह है कि सरकार ने अब तक स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया है कि भविष्य में ISRO की जिम्मेदारी कहां खत्म होगी और निजी कंपनियों की भूमिका कहां से शुरू होगी.

क्या है इसरो के कर्मचारियों का तर्क?

  • ISRO कर्मचारियों का तर्क है कि रॉकेट बनाना सिर्फ एक सामान्य मैन्युफैक्चरिंग का काम नहीं है. रॉकेट को डिजाइन करने से लेकर उसकी असेंबली, टेस्टिंग और लॉन्चिंग तक के हर चरण में दशकों का अनुभव, तकनीकी ज्ञान, संस्थागत अनुभव, सुरक्षा प्रक्रियाएं और विशेषज्ञता शामिल होती है.
  • कर्मचारी संगठनों को डर है कि अगर ये काम धीरे-धीरे ISRO से बाहर चले गए तो संगठन उन क्षमताओं का कुछ हिस्सा खो सकता है, जिन्हें तैयार करने में उसे कई दशक लगे हैं.
  • अगर निजी कंपनियां वे काम करने लगती हैं, जो अभी ISRO के अंदर किए जाते हैं, तो कर्मचारियों को डर है कि संगठन के भीतर काम के अवसर कम हो सकते हैं. इससे प्रमोशन के अवसर, नई स्किल सीखने के मौके और भविष्य में भर्ती भी प्रभावित हो सकती है.
  • पत्र में यह आशंका भी जताई गई है कि कुछ मौजूदा कर्मचारी अतिरिक्त यानी surplus हो सकते हैं या उन्हें दूसरे कामों में भेजा जा सकता है. ऐसा तब हो सकता है जब वही काम निजी ठेकेदार ISRO की विकसित की गई तकनीक का इस्तेमाल करके करने लगें.
  • कर्मचारी संगठनों की एक और चिंता रणनीतिक आत्मनिर्भरता को लेकर है. उनका कहना है कि महत्वपूर्ण लॉन्च व्हीकल का विकास, उसकी टेस्टिंग और लॉन्च ऑपरेशन किसी सार्वजनिक संस्थान के अंदर रहने से जवाबदेही, गुणवत्ता नियंत्रण और सुरक्षा निगरानी का एक खास स्तर बना रहता है.
  • उन्हें डर है कि अगर इन क्षमताओं का बहुत बड़ा हिस्सा ISRO से बाहर चला गया तो इन सुरक्षा और निगरानी व्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है.

क्या ISRO में पहले से कर्मचारियों की कमी?

  • दिलचस्प बात यह है कि कर्मचारियों की भर्ती कम होने की चिंता ऐसे समय में सामने आई है, जब ISRO खुद बड़ी संख्या में खाली पदों से जूझ रहा है.
  • सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 तक ISRO में 18,142 स्वीकृत पदों के मुकाबले 15,529 कर्मचारी कार्यरत थे. यानी करीब 14.4 प्रतिशत पद खाली थे.
  • सरकार का कहना है कि इन खाली पदों को भरने की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है. लेकिन कर्मचारी संगठनों को डर है कि अगर ISRO के मुख्य कामों की आउटसोर्सिंग बढ़ती गई तो भविष्य में नए कर्मचारियों की जरूरत कम हो सकती है और भर्ती पर इसका असर पड़ सकता है.
  • कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में लिखा है कि मौजूदा कर्मचारी surplus हो सकते हैं, दूसरे कामों में भेजे जा सकते हैं या उनके पास पर्याप्त काम नहीं रह सकता, जबकि वही काम निजी ठेकेदार सार्वजनिक धन से विकसित तकनीक का इस्तेमाल करके कर सकते हैं.
  • पत्र में यह भी कहा गया है कि Group A, B और C पदों पर नियमित भर्ती पहले से ही खाली पदों और कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की वजह से सीमित है. अगर भर्ती और कम हुई तो उन युवाओं के लिए अवसर भी कम हो जाएंगे, जो ISRO में एक सम्मानजनक सरकारी करियर की उम्मीद रखते हैं.
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