Explainer: ₹84 हजार करोड़ का समुद्र मंथन: भारत Sea में क्यों खोज रहा तेल-गैस, क्या घटेगी विदेशी निर्भरता?
भारत ने समुद्र में तेल-गैस खोज के लिए ₹84,084 करोड़ की योजना मंजूर की है. जानिए गहरे समुद्र में खोज, ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी निर्भरता पर इसका असर.
भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए समुद्र की गहराइयों में तेल और नेचुरल गैस खोजने पर बड़ा दांव लगाया है. 31 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘समुद्र मंथन’ यानी राष्ट्रीय समुद्री अन्वेषण योजना को मंजूरी दी. इसके तहत करीब ₹84,084 करोड़ का प्रावधान किया गया है. योजना का उद्देश्य समुद्री क्षेत्रों में खासकर गहरे और अति-गहरे पानी वाले इलाकों में तेल-गैस की खोज तेज करना, खोज के जोखिम को कम करना और निजी तथा विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित करना है.
1. ₹84,084 करोड़ आखिर किस काम के लिए है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ₹84,084 करोड़ का मतलब यह नहीं है कि सरकार इतनी रकम एक साथ समुद्र में तेल निकालने पर खर्च करेगी. यह मुख्य रूप से तेल और गैस की खोज को बढ़ावा देने तथा निवेश आकर्षित करने वाली योजना है. समुद्र के जिन हिस्सों में तेल-गैस मिलने की संभावना है, वहां खोज करना जमीन की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल और महंगा होता है.
गहरे समुद्र में कुआं खोदने के लिए विशेष मशीनों, जहाजों, भूकंपीय सर्वेक्षण तकनीक और प्रशिक्षित तकनीकी दल की जरूरत होती है. किसी कुएं की खोज पर बहुत बड़ी रकम खर्च हो सकती है, लेकिन इसके बाद भी तेल या गैस मिलने की कोई गारंटी नहीं होती. सरकार इसी शुरुआती जोखिम को कम करना चाहती है. ताकि निजी और विदेशी ऊर्जा कंपनियां भारत के समुद्री क्षेत्रों में पैसा लगाने के लिए आगे आएं.
जुलाई 2026 में योजना की घोषणा से पहले सामने आई जानकारी के मुताबिक सरकार गहरे समुद्र में खोजी कुओं की लागत का 50 फीसदी तक हिस्सा सहायता के तौर पर देने की योजना पर काम कर रही थी. साथ ही 18 गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों की नीलामी प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही थी. अब मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद यह पहल बड़े राष्ट्रीय समुद्री अन्वेषण कार्यक्रम (National Marine Exploration Program) के रूप में सामने आई है.
2. समुद्र के नीचे तेल-गैस खोजने की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा चुनौतियों में से एक कच्चे तेल के लिए विदेशी एजेंसियों पर निर्भरता है. पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ यानी (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में भारत की कच्चे तेल की आयात निर्भरता करीब 88.2 फीसदी थी. यानी देश में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदा जाता है.
इसी निर्भरता को कम करने के लिए सरकार जमीन के साथ समुद्र के नीचे भी नए तेल और गैस भंडार तलाश रही है. अगर समुद्री क्षेत्रों में बड़े और व्यावसायिक रूप से उपयोगी भंडार मिलते हैं तो आने वाले वर्षों में भारत को विदेशों से कम कच्चा तेल और गैस खरीदने की जरूरत पड़ सकती है.
हालांकि, इसका सीधा मतलब पेट्रोल और डीजल सस्ता होना नहीं है. ईंधन की खुदरा कीमत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम, तेल शोधन की लागत, ढुलाई, मुद्रा विनिमय और केंद्र तथा राज्य सरकारों के करों समेत कई चीजों पर निर्भर करती है. इसलिए इस योजना का तत्काल लक्ष्य पेट्रोल-डीजल सस्ता करना नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और विदेशी निर्भरता घटाना है.
3. समुद्र में तेल खोजना कितना मुश्किल?
समुद्र में जैसे-जैसे खोज का क्षेत्र तट से दूर और अधिक गहराई में जाता है, काम उतना ही कठिन और महंगा होता जाता है. गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में जमीन पर कुआं खोदने जैसी सामान्य प्रक्रिया नहीं होती. यहां विशेष ड्रिलिंग मशीनों, समुद्री जहाजों, भूकंपीय तकनीक और अनुभवी तकनीकी टीमों की जरूरत होती है.
पहले भूकंपीय सर्वेक्षण के जरिए समुद्र के नीचे मौजूद चट्टानों और संभावित तेल-गैस संरचनाओं का पता लगाया जाता है. इसके बाद संभावित स्थान पर खोजी कुआं खोदा जाता है. लेकिन इतनी महंगी प्रक्रिया के बावजूद व्यावसायिक मात्रा में तेल या गैस मिलने की गारंटी नहीं रहती.
यही सबसे बड़ा जोखिम है. किसी कंपनी को करोड़ों या हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ सकता है. सरकार की नई योजना इसी जोखिम को कम करने का प्रयास है, ताकि मुश्किल समुद्री क्षेत्रों में खोज का काम रुके नहीं.
4. क्या भारत पहले से समुद्र में तेल-गैस खोज रहा है?
हां, यह बिल्कुल नई शुरुआत नहीं है. भारत पहले से समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज कर रहा है. अब सरकार इसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है. इसका ताजा उदाहरण महानदी समुद्री क्षेत्र है.
25 जुलाई 2026 को सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ओएनजीसी ने महानदी समुद्री क्षेत्र में MN-DWN18-1-HD नाम के पहले मूल्यांकन कुएं की खुदाई शुरू की. यह चार प्रस्तावित गहरे समुद्री कुओं में पहला है. इनका उद्देश्य इस क्षेत्र में संभावित तेल और गैस संसाधनों का व्यवस्थित आकलन करना है.
भारत की नजर अंडमान समुद्री क्षेत्र पर भी है. अंडमान-निकोबार क्षेत्र में कच्चे तेल और अन्य हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज को देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी निर्भरता घटाने से जोड़ा गया है.
हालांकि, यहां सावधानी जरूरी है. किसी क्षेत्र में तेल-गैस मिलने की भूवैज्ञानिक संभावना होना और वहां व्यावसायिक रूप से लाभदायक उत्पादन शुरू हो जाना दो अलग बातें हैं. इसलिए किसी भी खोज को तुरंत भारत का नया तेल भंडार मान लेना सही नहीं होगा.
5. बड़ा तेल भंडार मिला तो क्या पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?
यह आम आदमी का सबसे बड़ा सवाल है. इसका जवाब सीधे हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता. मान लीजिए भारत को समुद्र में बड़ा तेल भंडार मिल जाता है, तब भी उसे निकालने, साफ करने, ढोने और तेल शोधन केंद्र तक पहुंचाने में भारी खर्च आएगा.
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के दाम से तय नहीं होती. तेल शोधन की लागत, ढुलाई, विक्रेता का कमीशन और केंद्र तथा राज्य सरकारों के कर भी कीमत का हिस्सा होते हैं. इसलिए घरेलू तेल उत्पादन बढ़ने से विदेशी निर्भरता कम हो सकती है, लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमत उसी अनुपात में तुरंत कम होगी, यह जरूरी नहीं है.
इस योजना का लाभ केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है. प्राकृतिक गैस भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है. गैस का इस्तेमाल उर्वरक, बिजली उत्पादन, पाइप से मिलने वाली घरेलू गैस, सीएनजी और उद्योगों में होता है. पीपीएसी के अनुसार 2026 में भारत में 1.7 करोड़ से ज्यादा घरेलू पाइप गैस कनेक्शन और करीब 9,000 सीएनजी केंद्र हैं. घरेलू गैस उत्पादन बढ़ने से इन क्षेत्रों को फायदा हो सकता है.
6. किन्हें फायदा होगा और सबसे बड़ा खतरा क्या?
सरकार की कोशिश केवल सरकारी तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है. वह निजी और वैश्विक ऊर्जा कंपनियों को भी भारत के समुद्री क्षेत्रों में निवेश के लिए आकर्षित करना चाहती है. अप्रैल 2026 में सरकार के आंकड़ा आधारित खोज में बीपी, एक्सॉनमोबिल और शेल जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ रिलायंस, केयर्न इंडिया, इनवेनियर एनर्जी और अडानी वेल्सपन एक्सप्लोरेशन जैसे निजी संचालकों तथा भूकंपीय तकनीक से जुड़ी कंपनियों ने हिस्सा लिया था.
खोज बढ़ने पर ड्रिलिंग कंपनियों, समुद्री जहाज संचालकों, सर्वेक्षण कंपनियों, इंजीनियरिंग कंपनियों और तेल क्षेत्र से जुड़ी सेवा कंपनियों को भी काम मिल सकता है.
लेकिन सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारी निवेश के बाद भी तेल या गैस न मिले. पहले सर्वेक्षण होता है, फिर संभावित स्थान चुना जाता है और उसके बाद खोजी कुआं खोदा जाता है. कई बार पूरी प्रक्रिया पर भारी रकम खर्च होने के बावजूद व्यावसायिक मात्रा में तेल या गैस नहीं मिलती. गहरे समुद्र में यह जोखिम और बढ़ जाता है, क्योंकि वहां खुदाई और समुद्री ढांचे की लागत बहुत ज्यादा होती है. इसलिए सरकार की वित्तीय सहायता तेल मिलने की गारंटी नहीं, बल्कि खोज का जोखिम कम करने का प्रयास है.
7. क्या यह दांव भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बदल सकता है?
भारत के सामने दोहरी चुनौती है. एक ओर देश को आने वाले वर्षों में तेल और गैस की जरूरत बनी रहेगी और विदेशी निर्भरता घटाना जरूरी है. दूसरी ओर दुनिया अक्षय ऊर्जा, बिजली से चलने वाले वाहनों, हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है. इसलिए भारत को आज की ऊर्जा जरूरत पूरी करने के साथ भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था के लिए भी तैयार रहना होगा.
सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में भी तेल और गैस भारत की ऊर्जा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. ऐसे में घरेलू संसाधनों की खोज जरूरी है. अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत बढ़ने, युद्ध होने, समुद्री मार्ग बाधित होने या बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में आपूर्ति संकट आने पर भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. घरेलू उत्पादन बढ़ने से ऐसे झटकों का असर कुछ हद तक कम किया जा सकता है.
भारत तेल शोधन के मामले में पहले से मजबूत है. सरकार के अनुसार देश की स्थापित तेल शोधन क्षमता करीब 25.81 करोड़ टन सालाना है. वित्त वर्ष 2025-26 में घरेलू खपत करीब 24.32 करोड़ टन रही, जबकि इसी वर्ष भारत ने करीब 6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया. यानी भारत विदेशों से कच्चा तेल खरीदकर उसे साफ कर पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है. असली समस्या तेल शोधन की क्षमता नहीं, बल्कि घरेलू कच्चे तेल उत्पादन और आयात के बीच बड़ा अंतर है.
अब सवाल है कि ₹84,084 करोड़ का यह दांव सफल होगा या नहीं? इसका जवाब अभी देना जल्दबाजी होगी. असली तस्वीर सर्वेक्षण, खुदाई, खोज, मूल्यांकन और व्यावसायिक उत्पादन के बाद ही सामने आएगी. अगर बड़े और लाभदायक तेल-गैस भंडार मिलते हैं तो भारत की विदेशी निर्भरता घट सकती है, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है और घरेलू तेल क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को बढ़ावा मिल सकता है. लेकिन अगर अपेक्षित भंडार नहीं मिले तो सरकार और कंपनियों के लिए यह बड़ा वित्तीय जोखिम भी साबित हो सकता है.
आम आदमी के लिए इसका असर तुरंत पेट्रोल पंप पर दिखाई नहीं देगा. यह अगले महीने पेट्रोल-डीजल सस्ता करने वाली योजना नहीं है. अगर खोज सफल रही तो इसका लाभ आने वाले वर्षों में दिखाई देगा. घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से आयात बिल और विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता घट सकती है, लेकिन ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय तेल दाम और करों समेत कई दूसरे कारकों पर निर्भर रहेंगी.




