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11 को फैसला-14 को AIIMS में भर्ती, अब 24 मार्च को मौत, पैसिव यूथेनेशिया प्रक्रिया में Harish Rana के साथ क्या-क्या हुआ?

11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद हरीश राणा की Passive Euthanasia प्रक्रिया शुरू हुई थी. AIIMS में 10 दिन तक चली मेडिकल प्रक्रिया के बाद 24 मार्च को उन्होंने अंतिम सांस ली. आइए इस स्टोरी में जानते हैं उनके 10 दिन के अंदर अलविदा कहने की प्रक्रिया के बारे में...

11 को फैसला-14 को AIIMS में भर्ती, अब 24 मार्च को मौत, पैसिव यूथेनेशिया प्रक्रिया में Harish Rana के साथ क्या-क्या हुआ?
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी6 Mins Read

Updated on: 24 March 2026 6:40 PM IST

13 साल… एक लंबा इंतज़ार…और हर दिन उम्मीद और दर्द के बीच झूलती एक जिंदगी. आखिरकार 24 मार्च को AIIMS में Harish Rana की सांसें थम गईं. यह सिर्फ एक इंसान की मौत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी कहानी का अंत था, जिसमें दर्द, कानून, परिवार का संघर्ष और 'गरिमा के साथ विदाई' की चाह एक साथ जुड़ी हुई थी. इसी के साथ वह पहले ऐसे भारतीय बन गए हैं जिन्होंने कानून के दायरे में रहकर अपनी इच्छा से मौत को गले लगाया हो.

2013 में एक हादसे के बाद कोमा में चले गए हरीश 13 साल तक मशीनों के सहारे जिंदा रहे. लेकिन मार्च 2026 में एक-एक दिन ऐसा आया, जिसने उनकी जिंदगी की आखिरी कहानी लिख दी. 11 मार्च का फैसला, 14 को अस्पताल में भर्ती और फिर 24 मार्च को हमेशा के लिए शांति.

क्या था 11 मार्च का फैसला, जिसने बदल दी किस्मत?

11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी. यह फैसला आसान नहीं था. इसमें मेडिकल रिपोर्ट, डॉक्टरों की राय और परिवार की सहमति शामिल थी. कोर्ट ने साफ कहा कि जो भी हो, वह इंसान की गरिमा के साथ हो, बिना दर्द के हो.

14 मार्च- घर से अस्पताल तक का भावुक सफर

14 मार्च को हरीश को गाजियाबाद के घर से AIIMS दिल्ली लाया गया. यह सिर्फ एक शिफ्ट नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक विदाई थी. परिवार की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में एक सुकून भी. अब उनका बेटा दर्द से आज़ाद होगा. AIIMS के पेलिएटिव केयर यूनिट में डॉक्टरों की एक खास टीम पहले से तैयार थी, जो इस पूरी प्रक्रिया को बेहद सावधानी से संभालने वाली थी.

क्या 16 मार्च से शुरू हुई आखिरी प्रक्रिया?

अस्पताल में भर्ती के दो दिन बाद, 16 मार्च से धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई. कोई झटका नहीं, कोई जल्दबाज़ी नहीं… सब कुछ एक तय प्लान के तहत पहले पोषण कम किया गया, फिर धीरे-धीरे बाकी सपोर्ट हटाया गया. यह एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिसमें मौत को नहीं, बल्कि शांति को करीब लाया जा रहा था.

क्या बिना दर्द के दी गई अंतिम विदाई?

डॉक्टरों का एक ही मकसद था. हरीश को कोई दर्द न हो. पैलिएटिव केयर के सिद्धांत के अनुसार, ऐसी अपरिवर्तनीय (लाइलाज) चिकित्सा स्थितियों में, जहां बाहरी सहारा केवल पीड़ा को लंबा करता है, उस समर्थन को रोका या हटाया जा सकता है. उन्हें लगातार दवाएं दी गईं, ताकि वे किसी तरह की तकलीफ महसूस न करें. पेलिएटिव सेडेशन के जरिए उन्हें एक गहरी, शांत नींद में रखा गया. जहां दर्द का कोई अस्तित्व नहीं था.

क्या हर कदम पर ली गई थी मेडिकल मंजूरी?

इस पूरी प्रक्रिया में दो मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली गई. पहले बोर्ड ने कहा कि अब ठीक होना संभव नहीं. दूसरे बोर्ड ने इसे सही ठहराया. इसके बाद ही डॉक्टरों ने आगे की प्रक्रिया शुरू की यानी हर कदम कानून और चिकित्सा दोनों के दायरे में रहा. 24 मार्च एक लंबा इंतज़ार खत्म. करीब 10 दिन तक चली इस प्रक्रिया के बाद 24 मार्च को हरीश राणा ने अंतिम सांस ली. 13 साल तक मशीनों के सहारे जिंदा रहने के बाद… आखिरकार उन्हें वह मिला, जिसकी उनके परिवार को भी तलाश थी...शांति.

'सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ'

AIIMS ले जाने से पहले एक वीडियो सामने आया…घर का माहौल शांत था, लेकिन हर किसी की आंखें नम थीं. ‘ब्रह्मा कुमारी’ संस्था की एक सदस्य ने हरीश के माथे पर तिलक लगाया और धीरे से कहा कि सबको माफ करते हुए, सबसे माफी मांगते हुए, सो जाओ, जिसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था. यह सिर्फ शब्द नहीं थे… यह एक आत्मा को मुक्त करने की प्रार्थना थी.

10 दिन में कैसे में Harish Rana ने दुनिया को कहा अलविदा?

14–15 मार्च-

AIIMS में भर्ती के बाद पहले दो दिनों तक डॉक्टरों की टीम ने हरीश राणा की मेडिकल स्थिति का गहराई से मूल्यांकन किया. दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को लागू किया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि उनकी हालत पूरी तरह अपरिवर्तनीय (Irreversible) है. इसी आधार पर आगे की प्रक्रिया को मंजूरी दी गई.

16 मार्च-

इस दिन से पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हुई. सबसे पहले लाइफ-सेविंग दवाओं का डोज कम किया गया और शरीर को धीरे-धीरे बाहरी मेडिकल सपोर्ट से अलग करने की शुरुआत की गई.

17–20 मार्च-

इन दिनों में तरीके से मेडिकल विड्रॉल किया गया. BP, ऑक्सीजन और अन्य जरूरी दवाओं की मात्रा धीरे-धीरे घटाई गई. मरीज को पेन किलर और सेडेशन दिया गया ताकि उसे किसी भी तरह का दर्द महसूस न हो और पूरी प्रक्रिया शांत व प्राकृतिक बनी रहे.

20–22 मार्च-

इस चरण में हरीश राणा के शरीर को लगभग सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम से अलग कर दिया गया. न्यूट्रिशन यानी फीडिंग ट्यूब भी धीरे-धीरे कम की गई. डॉक्टर इस दौरान सिर्फ मॉनिटरिंग मोड में रहे और शरीर की प्रतिक्रिया पर नजर रखी गई.

22–23 मार्च-

यह अंतिम चरण था, जहां कोई एक्टिव ट्रीटमेंट नहीं दिया गया. शरीर अपनी क्षमता के अनुसार सांस ले रहा था. यही पैसिव यूथेनेशिया का मुख्य सिद्धांत होता है.

24 मार्च-

करीब 10 दिनों तक चली इस संवेदनशील प्रक्रिया के बाद 24 मार्च को हरीश राणा ने अंतिम सांस ली. बिना दर्द और शांत तरीके से उनकी जीवन यात्रा समाप्त हुई, जिसने ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ की एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश की.

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