FAQ: 10 साल में कितनी बार संसद नहीं चली और किस पार्टी को सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा हुआ? सवाल-जवाब से समझें पूरा सच
पिछले 10 साल में संसद कितनी बार ठप हुई, किन मुद्दों पर गतिरोध बना और इससे किस पार्टी को राजनीतिक लाभ मिला? पढ़ें 10 सवाल-जवाब में तथ्य और विश्लेषण.
क्या आपने कभी सोचा है कि संसद न चलने से आखिर फायदा किसे होता है? सत्ता पक्ष को या विपक्ष को? पिछले 10 वर्षों में कई बार ऐसा हुआ जब लोकसभा और राज्यसभा हंगामे की वजह से घंटों नहीं चल सकीं. कभी पेगासस विवाद, कभी कृषि कानून, कभी अडाणी मामला, तो कभी सांसदों के निलंबन पर पूरा सत्र ठप होता दिखा. इन व्यवधानों के बीच करोड़ों रुपये का संसदीय समय भी बर्बाद हुआ और कई अहम विधेयक बिना लंबी चर्चा के पारित हुए. ऐसे में बड़ा सवाल है कि इन 10 वर्षों में संसद कितनी बार ठप हुई, इसके पीछे कौन-कौन से मुद्दे रहे और राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा फायदा आखिर किसे मिला? एफएक्यू से समझें क्या है सच?
FAQ, Parliament disruption in 10 years
FAQ: 10 साल में कितनी बार संसद नहीं चली? किस पार्टी को सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा हुआ
RS Legislative Research की Vital Stats रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से 2025 के बीच संसद के कम से कम 6 बड़े सत्र ऐसे रहे, जिनमें लगातार हंगामे के कारण कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ. इनमें 2015 का मानसून सत्र, 2018 का बजट सत्र (दूसरा चरण), 2021 का मानसून सत्र, 2023 का बजट सत्र (दूसरा चरण), 2023 का शीतकालीन सत्र और 2025 का मानसून सत्र प्रमुख हैं. PRS Legislative Research के अनुसार कई सत्रों में उत्पादकता 30-40% तक सिमट गई और प्रश्नकाल तथा शून्यकाल भी प्रभावित हुए.
पिछले दशक में संसद ललित मोदी विवाद, व्यापमं घोटाला, नोटबंदी, राफेल सौदा, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा, कृषि कानून, पेगासस जासूसी विवाद, अडाणी-हिंडनबर्ग रिपोर्ट, राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त होने, संसद सुरक्षा चूक, विपक्षी सांसदों के निलंबन और 2025 में बिहार मतदाता सूची (SIR) जैसे मुद्दों पर सबसे ज्यादा बाधित हुई. लगभग हर बड़े राजनीतिक विवाद का असर संसद की कार्यवाही पर दिखाई दिया.
सबसे बड़ा नुकसान जनता और संसदीय लोकतंत्र का हुआ. हंगामे के कारण प्रश्नकाल नहीं चल सका, सांसद सरकार से जवाब नहीं मांग सके और कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तार से चर्चा नहीं हो पाई. संसदीय समितियों की रिपोर्टों पर भी अपेक्षित बहस नहीं हुई. विशेषज्ञों के अनुसार इससे कानून निर्माण की गुणवत्ता और सरकार की जवाबदेही दोनों प्रभावित हुईं.
कई मामलों में विपक्ष को राजनीतिक फायदा मिला क्योंकि वह संसद के अंदर और बाहर सरकार को घेरने में सफल रहा. 2015 में कांग्रेस ने व्यापमं और ललित मोदी मुद्दे को राष्ट्रीय बहस बनाया. 2021 में कृषि कानून और पेगासस विवाद, जबकि 2023 में अडाणी मुद्दे और राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त होने को विपक्ष ने बड़े राजनीतिक अभियान में बदला. इससे विपक्ष अपने समर्थकों के बीच सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में सफल रहा.
कई बार सरकार को भी रणनीतिक लाभ मिला. विपक्ष के हंगामे के बीच कई विधेयक सीमित चर्चा में पारित हो गए. सरकार ने लगातार कहा कि वह चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष कार्यवाही नहीं चलने देता. दूसरी ओर विपक्ष का आरोप रहा कि सरकार संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत बहस से बचती रही. यानी राजनीतिक लाभ का दावा दोनों पक्ष करते रहे.
यदि चुनावी परिणाम देखें तो सबसे बड़ा लाभ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिला. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया, जबकि इस दौरान संसद कई बार बाधित रही. हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि जीत का कारण केवल संसद का ठप होना था. चुनावी सफलता के पीछे नेतृत्व, संगठन, कल्याणकारी योजनाएं, राष्ट्रवाद और विपक्ष की रणनीति जैसे कई अन्य कारण भी थे.
नहीं. संसद में विरोध-प्रदर्शन और कार्यवाही बाधित होने की घटनाएं नई नहीं हैं. 1990 के दशक से लेकर यूपीए और एनडीए—दोनों सरकारों के समय कई सत्र हंगामे की भेंट चढ़े हैं. हालांकि पिछले एक दशक में बड़े राजनीतिक मुद्दों पर व्यवधान की आवृत्ति और अवधि दोनों बढ़ी हैं, जिस पर संसदीय विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं.
संसद की प्रत्येक बैठक पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक खर्च होता है. जब कार्यवाही हंगामे में स्थगित होती है तो यह खर्च व्यर्थ जाता है. इसके अलावा महत्वपूर्ण विधेयकों, बजट संबंधी चर्चाओं और जनहित के मुद्दों पर निर्णय लेने में देरी होती है. इससे नीति निर्माण और प्रशासनिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है.
संसद सचिवालय और PRS Legislative Research के आंकड़ों के अनुसार कई सत्रों में लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता सामान्य स्तर से काफी नीचे रही. 2021 के मानसून सत्र में लगातार हंगामे के कारण कामकाज प्रभावित हुआ. 2023 के शीतकालीन सत्र में विपक्ष के 140 से अधिक सांसदों के निलंबन के बीच कार्यवाही चली. 2025 के मानसून सत्र में लोकसभा की उत्पादकता लगभग 29% और राज्यसभा की लगभग 34% दर्ज की गई.
पिछले 10 वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो चुनावी दृष्टि से सबसे अधिक फायदा बीजेपी को मिला क्योंकि उसने लगातार राष्ट्रीय चुनावों में मजबूत प्रदर्शन किया. वहीं मुद्दों को राष्ट्रीय बहस बनाने और सरकार पर दबाव बनाने के लिहाज से विपक्ष को भी कई मौकों पर लाभ मिला. यानी संसद के ठप होने से अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दोनों पक्षों को अलग-अलग समय पर मिला, लेकिन दीर्घकाल में सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक संस्थाओं, संसदीय परंपराओं और जनता के हितों को हुआ.




