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EXPLAINER: रूस-चीन के बहाने से ‘ग्रीनलैंड’ कब्जाने पर अड़े ट्रंप ‘NATO’ को बर्बाद करके मानेंगे! ऐसे में डेनमार्क-नाटो खुद कैसे बचेंगे?

रूस और चीन के खतरे का हवाला देकर ट्रंप जिस तरह नाटो सदस्य डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को हथियाने की बात कर रहे हैं, उसे रक्षा विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय कानून, नाटो की एकता और वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा मान रहे हैं. भारतीय सेना और वायुसेना के रिटायर्ड अधिकारियों का कहना है कि यह ट्रंप की दादागिरी और प्रभुत्ववादी सोच का उदाहरण है, जिससे न केवल नाटो कमजोर होगा बल्कि अमेरिका की भी विश्वसनीयता गिरेगी.

EXPLAINER: रूस-चीन के बहाने से ‘ग्रीनलैंड’ कब्जाने पर अड़े ट्रंप ‘NATO’ को बर्बाद करके मानेंगे! ऐसे में डेनमार्क-नाटो खुद कैसे बचेंगे?
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( Image Source:  Sora AI )
संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 19 Jan 2026 7:51 PM IST

अपनी पर उतरे अमेरिका के बेलगाम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब अपनों को ही लूटकर अपना घर भरने पर उतर आए हैं. इसका ताजा तरीन नमूना है ग्रीनलैंड (Greenland Obsession) विवाद. नाटो सहित दुनिया के तमाम शांति-प्रिय देश ट्रंप को समझाने में जुटे हैं कि, अपनों को लूटकर कभी कोई सुखी नहीं रह पाया है. अगर वे (ट्रंप) खुद ही नाटो (NATO यानी North Atlantic Treaty Organization) का सदस्य होने के बावजूद खुद ही अगर नाटो के ही सदस्य देश डेनमार्क की सीमा में स्थित ग्रीनलैंड को जबरिया हथियाने की जिद करेंगे, तो फिर ऐसे में भला सोचो नाटो का भला कौन चाहेगा?

जिद्दी कहिए या फिर अड़ियल ट्रंप के बाल पर मगर इन सब दलीलों की जूं भी नहीं रेंग रही है. “विनाशकाले विपरीत बुद्धि” की कहावत को जीवन में चरितार्थ करने पर अड़े डोनाल्ड ट्रंप हर हाल में नाटो सदस्य देश डेनमार्क के अर्धस्वायत्त वाले ग्रीनलैंड क्षेत्र हो हड़पने पर आमादा हैं. सिर्फ इस जिद में अमेरिका यानी ट्रंप के देश का विस्तार हो सके. फिर वह चाहे जैसे भी क्यों न हो.

ग्रीनलैंड हथियाने का सपना आसान नहीं

इस बारे में बात करने पर भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी (Retired Lieutenant Colonel Jasinder Singh Sodhi, Indian Army) स्टेट मिरर हिंदी के साथ खास बातचीत में कहते हैं, “ग्रीनलैंड पर सन् 1979 से व्यापक स्व-शासन है. जिसकी विदेश और रक्षा नीति नाटो संगठन के सदस्य देश डेनमार्क के हाथों में चली आ रही है. इसलिए भी अब विवादित हुए ग्रीनलैंड को डेनमार्क का ही अर्ध-स्वायत्त भाग माना जाता है, जोकि गलत भी नहीं है. ग्रीनलैंड व डेनमार्क में शासन कर रही दोनों जगह की हुकूमतों ने भी हमेशा इस बात को एकदम साफ रखा है कि ग्रीनलैंड न कभी पहले बिकाऊ था न आज बिकाऊ है. न ही आइंदा डेनमार्क सहित नाटो का कोई भी सदस्य देश कभी भी किसी की दादागिरी से डरकर ग्रीनलैंड पर किसी को भी (ट्रंप, अमेरिका या फिर कोई भी और दुनिया की ताकत) कब्जा करने देगा.”

अमेरिकी ही ट्रंप के खिलाफ खड़े हो जांएगे

बात जारी रखते हुए रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी कहते हैं, “यह सब तमाशा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सिर्फ और सिर्फ अमेरिका की दादागिरी बरकरार रखने और दुनिया में अमेरिका का प्रभुत्व जबरदस्ती जमाए-बनाने रखने की मैली मंशा से कर रहे हैं. जोकि उनकी आदत रही है. ट्रंप की इन्हीं ओछी हरकतों से आज की तारीख में उनके अपने ही देश अमेरिका में भी उनकी खिलाफत में एक बड़ा वर्ग तैयार खड़ा है. जो कभी भी खुलेआम ट्रंप की मुखालफत में खड़ा होकर उनकी आफत कर सकता है. और वह दिन दूर भी नहीं है जिसका जिक्र मैं अब कर रहा हूं. आज नहीं बहुत ही जल्दी आने वाले कल में ही देख लीजिए जो ट्रंप आज किसी देश का प्रमुख होने की जगह किसी भीड़ के आम आदमी की तरह बेकाबू होकर जो हरकतें कर रहे हैं, इन सबका खामियाजा उन्हें जल्दी ही भुगतना पड़ेगा.”

क्या है नाटो जिसका सदस्य डेनमार्क भी है

अब समझना जरूरी नाटो को भी. दरअसल नाटो (NATO) यानी “उत्तर अटलांटिक संधि संगठन” 32 सदस्य देशों का एक मजबूत सैन्य और राजनीतिक गठबंधन है. इसमें अमेरिका से लेकर यूरोप के तमाम बड़े देश शामिल हैं. इसमें वह डेनमार्क भी शामिल है जिसके अंदर ग्रीनलैंड आता है. नाटो (North Atlantic Treaty Organization) का विस्तार बीते चार-पांच साल से लगातार हो ही रहा है. साल 2020 में जहां इसमें उत्तरी मैसेडोनिया, 2023 में फिनलैंड और फिर साल 2025 में यानी बीते साल ही स्वीडन शामिल हुआ. वहीं इसकी सदस्य संख्या बढ़कर 32 हो गई. अमेरिका जैसी सुपर-पावर खुद भी इसका सदस्य है.

कारगिल युद्ध के रणबांकुरे मेजर उदय चौहान बोले..

स्टेट मिरर हिंदी के साथ विशेष बातचीत में कारगिल युद्ध लड़ते वक्त बुरी तरह से जख्मी हो चुके भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर उदय सिंह चौहान कहते हैं, “यूं तो अमेरिका का हर राष्ट्रपति अपनी चौधराहट दादागिरी का दबदबा बनाए रखने के लिए कमजोर देशों को हमेशा से ही सताता आया है. मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मगर अपने पूर्व तमाम समकक्ष अमेरिकी रा+ष्ट्रपतियों की दादागिरी का हर रिकॉर्ड तोड़ डाला है. यही वजह है कि बचकानी हरकतें करने वाले ट्रंप साहब सुबह कुछ कहते हैं और शाम को सुबह का कहा हुआ भूल जाते हैं. मैंने अपनी जिंदगी में इतने घटिया और गिरे हुए सोच या बचकानी मानसिकता का कभी ट्रंप से पहले को कोई राष्ट्राध्यक्ष नहीं देखा. ट्रंप के रहते रहते दुनिया के बाकी देशों का जो होगा सो होगा. मुझे डर है कि कहीं अपने अमेरिकी ही ट्रंप के जोकरपने से आजिज आकर उन्हें कुर्सी से नीचे न उतार फेंकें.

ट्रंप के चलते अमेरिका बदनाम हो रहा

इस वक्त ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का उनके महल से रात के वक्त चोरों-अपहरणकर्ताओं की तरह अपहरण करके क्या ले आए हैं, वे (ट्रंप) सोच रहे हैं मानों उन्होंने बहुत बड़ी कोई जंग मैदान में जीत ली हो. सोते हुए इंसान को तो कौवा भी नोच कर भाग जाता है. हालांकि, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके महल से उठा लाने वाली कथित और दुनिया भर में हास्य की वजह बनी ट्रंप की उस सफलता पर न केवल दुनिया अपितु अमेरिका ही हंस रहा है. यह कहते हुए कि ट्रंप के राष्ट्रपति रहते रहते न मालूम अभी अमेरिका को और कहां कहां कब-कब अपना मखौल उड़वाना पड़ेगा.”

ट्रंप की हरकतों की कीमत अमेरिका चुकाएगा

भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड एअर-वाइस मार्शल अनिल तिवारी कहते हैं, “इंतजार कीजिए. आजकल बेकाबू हुए पड़े अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बहुत ही जल्दी टक्कर देने वाला उनके सामने अड़कर, उनका सबका सब घमंड-गुरूर खत्म कर देगा. जिस तरह से ट्रंप देश को और अमेरिकी विदेश-सैन्य व अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हवा और धुंए में उड़ाते हुए दौड़-भाग में जुटे हैं. इस तरह से किसी देश का शासन नहीं चला करता है. ट्रंप जैसे ही गिने-चुने बेलगाम शासकों ने अपने अपने राष्ट्रों का सत्यानाश करवाया है. कालांतर में ट्रंप के जैसे ही बेलगाम तमाम राष्ट्राध्यक्षों द्वारा लिखवाए जा चुके काले-इतिहास के पीले पड़ चुके पन्ने पलटकर देखिए-पढ़िये. सबकुछ मौजूद है इतिहास के पन्नों में. आज ट्रंप ग्रीनलैंड हथियाने की जिद पर अड़कर भले ही नाटो, डेनमार्क या दुनिया की शांति भंग करने पर क्यों न आमादा हों. आने वाले वक्त में अपनी इन्हीं हरकतों का खामियाजा न केवल इन्हीं डोनाल्ड ट्रंप को भुगतना पड़ेगा, अपितु उनके देश अमेरिका को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.”

अमेरिका को ट्रंप ही रुलाएंगे- ले. कर्नल सोढ़ी

ग्रीनलैंड हथियाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अड़ पर हंसने वाली दुनिया को ट्रंप बता रहे हैं कि अगर उन्होंने (अमेरिका) अभी ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में नहीं लिया तो, आने वाले वक्त में कभी भी उसके ऊपर रुस और चीन कब्जा कर लेंगे. ट्रंप के इस तर्क के बारे में बात करने पर भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी कहते हैं, “यह सब ट्रंप की चालबाजियों का हिस्सा है. ट्रंप जो कहते हैं वह कभी नहीं करते हैं. जो उन्हें करना होता है वह वे कभी कहते नहीं है. वैसे भी मैं ट्रंप की बात को बहुत वजन कभी नहीं देता हूं. क्योंकि वे अमेरिका जैसी सुपर-पावर कंट्री के चीफ तो बनने के काबिल हैं ही नहीं. अब चूंकि उन्हें अमेरिकी जनता ने दूसरी बार भी अपना राष्ट्रपति चुना है. तो इस पर मैं क्या कह सकता हूं. सिवाए इसके कि जिस अमेरिकी जनता ने ट्रंप को दुबारा अपना राष्ट्राध्यक्ष चुना, उन ट्रंप की बेजा हरकतों से हलकान भी आने वाले वक्त में अमेरिका ही होगा.”

यह बात तो तय है कि...

विदेश, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय रक्षा व सैन्य नीतियों के भारतीय विशेषज्ञों से लंबी बातचीत में एक चीज तो तय हो जाती है कि, “ट्रंप को भले ही कुछ हासिल हो न हो. उनका दुनिया में मजाक उड़ रहा है तो उड़े. इस सबसे अनजान ट्रंप ने आजकल जिस तरह से चीन और रूस की आड़ लेकर डेनमार्क के स्वामित्व वाले ग्रीनलैंड को कब्जाने की जिद पकड़ी है. यह जिद ट्रंप को ग्रीनलैंड मिलने देगी या नहीं. यह तो बाद की बात है. हां, ट्रंप की इस बेसिर-पैर की जिद ने उन्हें राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर दुनिया में कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा है. यह भी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर साबित हो चुका है.”

अमेरिका का उद्देश्य “फूट डालो राज करो”

पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी तो बातचीत के अंत में यह तक कहते हैं, “ट्रंप साहब जब अपने ही देश के सगे नहीं हो पा रहे हैं. तब फिर दुनिया में शांति-अशांति के विषय पर भी उनके ऊपर क्या फर्क पड़ने वाला है. ट्रंप न खुद शांति से रहना चाहते हैं न ही अपने देश और बाकी दुनिया में शांति चाहते हैं. डोनाल्ड ट्रंप ही क्यों, कालांतर से अब तक अमेरिका का वैसे कोई भी राष्ट्रपति रहा हो, सबकी एक ही मंशा हमेशा बनी रही कि दुनिया में अशांति पैदा करो. दो देशों को आपस में लड़वाकर उन्हें अपना गोला-बम-बारूद और हथियार बेचकर, अपना खजाना भरते रहे. इसका उदाहरण दुनिया के एक देश नहीं कई देश हैं. यह अलग बात है कि जहां जहां अमेरिका घुसा वे देश तो बर्बाद हुए ही. बर्बादी और बदनामी अमेरिकी की भी कम नहीं हुई है. मगर स्वार्थी अमेरिका और उसके राष्ट्राध्यक्षों के लिए दौलत से बढ़कर इज्जत की परवाह न पहले कभी रही. न आ आज ट्रंप साहब को है.”

डोनाल्ड ट्रंप
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