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SIR के फैसले सर्वसम्मति से हुए, Form 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया; सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने क्या-क्या कहा? 10 Points

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि SIR के तीनों प्रमुख आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से जारी हुए और Form 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया. आयोग के मुताबिक, Form 6 के साथ जोड़ा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज था.

ECI Tells Supreme Court SIR Orders Were Unanimous, Form 6 Unchanged
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( Image Source:  फाइल फोटो )

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है. आयोग ने कहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े तीनों प्रमुख आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की सर्वसम्मति से जारी किए गए. आयोग ने यह आरोप भी खारिज किया कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में संशोधन किया गया था.

यह जवाब ऐसे समय आया है, जब आयोग के कामकाज, उसके भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया और SIR के दौरान मतदाता पंजीकरण की शर्तों को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है. विपक्षी नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कुछ अहम फैसलों में आयोग के सभी सदस्यों की सहमति नहीं ली गई. चुनाव आयोग ने इन आरोपों को गलत बताते हुए याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है.



इस विवाद के दो मुख्य पहलू हैं. पहला, क्या SIR से जुड़े फैसले कानून के मुताबिक आयोग के सामूहिक निर्णय थे? दूसरा, क्या Form 6 के साथ जो अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया, वह वास्तव में फॉर्म में बदलाव था या उससे अलग दस्तावेज? इन सवालों पर आयोग और याचिकाकर्ताओं के तर्क अलग-अलग हैं.

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने क्या-क्या कहा? 10 Points

1. चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

आयोग ने सोमवार, 26 अक्टूबर को दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि SIR से जुड़े तीनों आदेश सामूहिक सहमति से जारी किए गए थे. ये आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए थे. आयोग के मुताबिक, इन फैसलों में संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का पालन किया गया. आयोग ने यह भी कहा कि तीनों सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे को भी सर्वसम्मति से मंजूरी दी है.



चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि किसी आयुक्त या अधिकारी की ओर से फाइल पर सवाल, सुझाव या आपत्ति दर्ज करना अपने आप में आयोग का अंतिम निर्णय नहीं होता. आयोग के अनुसार, किसी प्रस्ताव पर चर्चा और विचार-विमर्श के बाद लिया गया औपचारिक निर्णय ही आयोग का निर्णय माना जाएगा. इस दलील के जरिए आयोग ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि आंतरिक फाइलों में दर्ज टिप्पणियों या अधिकारियों के बीच हुए पत्राचार को सीधे तौर पर यह प्रमाण नहीं माना जा सकता कि कोई फैसला अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त ने लिया था.

2. विवाद की जड़ क्या है?

इस विवाद को तब ज्यादा चर्चा मिली, जब इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 मामलों में ज्ञानेश कुमार के फैसलों या आयोग के कामकाज को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं. रिपोर्ट में मतदाता सूची के प्रबंधन, मतदाता पंजीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े मामलों का जिक्र किया गया. इसके बाद आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की न्यायिक जांच की मांग उठी.

चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि याचिकाओं का आधार मुख्य रूप से एक समाचार रिपोर्ट है और समाचार रिपोर्ट को अपने आप में उसमें बताए गए तथ्यों का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता. आयोग ने यह भी कहा कि उसने आंतरिक फाइलों या नोटिंग को किसी समाचार एजेंसी के लिए जारी करने की अनुमति नहीं दी थी. इस तरह विवाद सिर्फ इस बात का नहीं है कि किसी फाइल पर किसने क्या टिप्पणी की. असल सवाल यह है कि क्या विवादित फैसले आयोग की औपचारिक प्रक्रिया के तहत लिए गए थे और क्या उनके रिकॉर्ड में तीनों सदस्यों की सहमति दर्ज है.

3. कानून में सर्वसम्मति और बहुमत का क्या नियम है?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार, आयोग को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से फैसले लेने चाहिए. अगर सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब कानून आयोग के सामूहिक निर्णय की बात करता है, तो यह सुनिश्चित होना चाहिए कि फैसले वास्तव में निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए हों. केवल बाद में मंजूरी देने या फाइल पर दर्ज आपत्तियों को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताने से हर सवाल का जवाब नहीं मिल जाता.

दूसरी ओर, आयोग का कहना है कि फाइलों पर दर्ज टिप्पणियां और औपचारिक निर्णय अलग-अलग चीजें हैं. उसके मुताबिक, प्रस्तावों पर संबंधित सदस्यों के विचार लिए जाते हैं और फिर आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत फैसला किया जाता है. अब कानूनी विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह होगा कि संबंधित फाइलें, नोटिंग, हस्ताक्षर और निर्णयों का रिकॉर्ड इन दोनों पक्षों के दावों के बारे में क्या बताते हैं.

4. Form 6 क्या है और इस पर विवाद क्यों हुआ?

  • Form 6 वह वैधानिक आवेदन-पत्र है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है. यह Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित है. पहली बार वोटर बनने वाले नागरिकों सहित पात्र आवेदक इसके जरिए मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करते हैं.
  • SIR के दौरान विवाद तब पैदा हुआ, जब Form 6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया. इसमें आवेदकों से यह जानकारी मांगी गई कि उनका अपना नाम या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची में था या नहीं.
  • इस जानकारी का उद्देश्य आवेदक या उसके परिवार का संबंध पुरानी मतदाता सूची से स्थापित करने में मदद करना था. आयोग का कहना है कि यह घोषणा-पत्र Form 6 का हिस्सा नहीं, बल्कि उससे अलग दस्तावेज था. विवाद इसलिए उठा, क्योंकि जब अतिरिक्त घोषणा-पत्र को ऑनलाइन आवेदन के साथ दिखाया गया, तो यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या इससे वैधानिक फॉर्म में बदलाव हो गया.
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म में बदलाव केवल निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से ही किया जा सकता है.

5. चुनाव आयोग का Form 6 पर क्या तर्क है?

  • आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि Form 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया. अतिरिक्त घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज था, जिसे SIR की प्रक्रिया में इस्तेमाल करने के लिए निर्धारित किया गया था.
  • आयोग ने बताया कि जून 2025 के आदेश में इसे Annexure D कहा गया था. बाद के आदेशों में इसे Annexure IV के रूप में प्रतिस्थापित किया गया. इसका उद्देश्य आवेदकों को पिछली मतदाता सूचियों से जोड़ने के लिए जरूरी जानकारी जुटाना था.
  • आयोग के अनुसार, यदि आवेदक पुरानी मतदाता सूची से अपना या अपने परिजनों का संबंध स्थापित करने वाली जानकारी दे देता था, तो दावा-आपत्ति के चरण में कुछ सहायक दस्तावेज देने की जरूरत से बचा जा सकता था. यदि ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं होती या नहीं दी जाती, तो निर्धारित सहायक दस्तावेज प्रस्तुत किए जा सकते थे.
  • आयोग ने यह भी कहा कि Form 6 में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. इसलिए SIR के लिए अलग घोषणा-पत्र निर्धारित करने को वैधानिक फॉर्म में संशोधन नहीं माना जाना चाहिए.
  • हालांकि, इस दलील के बावजूद ऑनलाइन फॉर्म में घोषणा-पत्र दिखाने के तरीके पर सवाल उठे हैं. इसलिए यह विवाद केवल दस्तावेज का नाम क्या था, इस तक सीमित नहीं है; यह भी महत्वपूर्ण है कि आवेदन प्रक्रिया में उसे किस तरह प्रस्तुत किया गया.

6. सुप्रीम कोर्ट ने Form 6 पर पहले क्या कहा था?

5 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसने Form 6 के किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी है. अदालत ने कहा था कि आयोग के मूल रिकॉर्ड देखकर यह जांच की जाएगी कि फॉर्म में क्या बदलाव किए गए और उन्हें किसने किया. यह टिप्पणी इसलिए अहम थी, क्योंकि पहले Form 6 के साथ जुड़े घोषणा-पत्र को लेकर यह दावा सामने आया था कि सुप्रीम कोर्ट ने उसे मंजूरी दी थी. अदालत की टिप्पणी के बाद आयोग ने स्पष्ट किया कि उसका आशय वैधानिक Form 6 से नहीं, बल्कि उससे अलग घोषणा-पत्र से था.


26 अक्टूबर को दाखिल हलफनामे में आयोग ने फिर दोहराया कि Form 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया. आयोग ने यह भी बताया कि 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन में Form 6 और अतिरिक्त घोषणा-पत्र को अलग-अलग दिखाने की व्यवस्था की गई है. इससे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है- आयोग का दावा है कि वैधानिक फॉर्म नहीं बदला गया, जबकि अदालत ने पहले ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव को लेकर रिकॉर्ड देखने की जरूरत बताई थी. अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत की जांच और उपलब्ध दस्तावेजों पर निर्भर करेगा.

7. Form 6 का विवाद नए मतदाताओं के लिए क्यों अहम है?

यह मुद्दा खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो पहली बार मतदाता बनने के पात्र हुए हैं या SIR के दौरान मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने अथवा दोबारा दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, हाल ही में 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाला कोई युवा पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के समय मतदाता सूची में दर्ज नहीं रहा होगा. ऐसे आवेदक के लिए अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने रिकॉर्ड से संबंध स्थापित करने की जानकारी प्रासंगिक हो सकती है. इसी तरह, जिन लोगों का नाम पिछली सूची से छूट गया था या जिनके रिकॉर्ड का पुरानी सूची से मिलान नहीं हो पाया, उनके लिए भी अतिरिक्त जानकारी और सहायक दस्तावेजों की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है.

हालांकि, अतिरिक्त घोषणा-पत्र की जरूरत और किसी व्यक्ति की मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता दो अलग सवाल हैं. किसी पुराने रिकॉर्ड से संबंध स्थापित न हो पाने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि कोई व्यक्ति वोट देने के योग्य नहीं है. पात्रता और आवेदन का निर्णय लागू नियमों और संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की प्रक्रिया के तहत होना चाहिए.

8. राहुल गांधी और विपक्ष की याचिका में क्या मांग की गई है?

  • राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े कदमों की जांच की मांग की है.
  • याचिका में स्वतंत्र और समयबद्ध जांच, विवादित फैसलों से जुड़ी पूरी फाइलें, नोटिंग, बैठक के रिकॉर्ड और आपत्तियां पेश करने की मांग शामिल है.
  • याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि यदि यह साबित होता है कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल किसी एक सदस्य ने निर्धारित प्रक्रिया के बाहर किया, तो ऐसे फैसलों की वैधता पर सवाल उठेंगे. उन्होंने जांच पूरी होने तक SIR रोकने और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने जैसी मांगें भी रखी हैं.
  • विपक्ष ने मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़े डिजिटल सिस्टम ECINET और ERONET की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं. उसका आरोप है कि कुछ पात्र मतदाताओं के नाम पर्याप्त सूचना, सुनवाई या प्रभावी बहाली प्रक्रिया के बिना प्रभावित हो सकते हैं.
  • विपक्ष ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह बिहार में SIR की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले को दोबारा खोलने के बजाय उसके क्रियान्वयन के दौरान लिए गए फैसलों में कानूनी प्रक्रिया के पालन की जांच चाहता है.

9. आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट पर क्या कहा?

मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे थे. आयोग के हलफनामे के अनुसार, ये पत्र SIR की नीतिगत मंजूरी या IT विभाग से जुड़े फैसलों के बजाय आयोग में प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी और काम के आंतरिक बंटवारे से संबंधित थे. आयोग ने कहा कि 28 जुलाई को जारी एक कार्यालय आदेश 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद लागू नहीं हुआ. उसके मुताबिक, इस घटनाक्रम को SIR से जुड़े फैसले बिना सहमति लिए जाने के प्रमाण के रूप में पेश करना सही नहीं है.

यहां भी मुख्य सवाल रिकॉर्ड का है। आयोग ने अपने जवाब में घटनाक्रम की व्याख्या दी है, जबकि याचिकाकर्ता आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की जांच चाहते हैं. दोनों पक्षों के दावों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और अदालत की जांच से ही हो सकेगी.

10. अब आगे क्या होगा?

चुनाव आयोग के जवाबी हलफनामे के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आयोग की दलीलों और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर विचार किया जाएगा. 26 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक, मामले पर अगली सुनवाई मंगलवार, 27 अक्टूबर को अपेक्षित थी. अदालत के सामने मुख्य रूप से तीन प्रश्न होंगे:

  • क्या SIR से जुड़े आदेश कानून के अनुसार आयोग के सामूहिक निर्णय थे?
  • क्या Form 6 के साथ जो अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया, वह वैधानिक फॉर्म में संशोधन था या अलग दस्तावेज?
  • क्या विवादित फैसलों और प्रक्रियाओं के रिकॉर्ड से किसी कानूनी या संवैधानिक नियम के उल्लंघन का पता चलता है?

आयोग का कहना है कि फैसले सर्वसम्मति से हुए और Form 6 में बदलाव नहीं किया गया. याचिकाकर्ता निर्णय प्रक्रिया और मतदाता पंजीकरण की व्यवस्था की न्यायिक जांच चाहते हैं. इसलिए फिलहाल किसी भी पक्ष के दावे को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.

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