Begin typing your search...

कितनी होती है ISRO चीफ की सैलरी, मिलती हैं कौन-कौन सी सुविधाएं, NASA से तुलना में कहां खड़े हम, क्यों उठा है सवाल?

मशहूर उद्योगपति हर्ष गोयनका ने डीडी न्यूज़ के शो के लिए ₹15 करोड़ सालाना अनुबंध और इसरो चेयरमैन के ₹27 लाख सालाना बेसिक वेतन की तुलना की है, जिसके बाद सार्वजनिक खर्च और वैज्ञानिक प्रतिभाओं को बनाए रखने पर बहस छिड़ गई है.

Harsh Goenka Questions Spending Priorities Over DD News Show  Contract and ISRO Chairman Salary
X

भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी ताकत बनने का सपना देख रहा है. चंद्रयान, आदित्य-L1 और गगनयान जैसे मिशन इस महत्वाकांक्षा की मिसाल हैं, लेकिन क्या देश अपने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को उसी अनुपात में प्रोत्साहन दे रहा है, जिस अनुपात में वह बड़े लक्ष्य तय कर रहा है? मशहूर उद्योगपति हर्ष गोयनका ने इसी सवाल को उठाते हुए सार्वजनिक खर्च की प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ दी है.

गोयनका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रसार भारती के डीडी न्यूज़ शो और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के चेयरमैन के वेतन की तुलना की. उनका सवाल है कि अगर एक टीवी शो के लिए सालाना ₹15 करोड़ खर्च किए जा सकते हैं, तो देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले शीर्ष वैज्ञानिक पद के वेतन और वैज्ञानिक प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था पर दोबारा विचार क्यों नहीं होना चाहिए?

क्या है हर्ष गोयनका का सवाल?

हर्ष गोयनका ने अपने पोस्ट में डीडी न्यूज़ के एक शो के लिए एंकर सुधीर चौधरी से जुड़े सालाना ₹15 करोड़ के अनुबंध और इसरो चेयरमैन के लगभग ₹27 लाख सालाना बेसिक वेतन का अंतर सामने रखा. उनका तर्क है कि भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप वैज्ञानिकों को आकर्षित करने और उन्हें संस्थान में बनाए रखने के लिए इनाम और प्रोत्साहन की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए.

गोयनका की इस तुलना के पीछे बड़ा सवाल सार्वजनिक धन के इस्तेमाल का है. एक तरफ प्रसार भारती दर्शकों की संख्या और कार्यक्रम की पहुंच बढ़ाने के लिए महंगे शो पर निवेश करता है, तो दूसरी तरफ वैज्ञानिक संस्थानों में शीर्ष पदों का वेतन सरकारी वेतनमान से तय होता है. हालांकि, दोनों राशियों की प्रकृति अलग है. डीडी न्यूज़ के शो के लिए बताई गई रकम एंकर की निजी सैलरी भर नहीं, बल्कि कार्यक्रम के निर्माण से जुड़ा अनुबंध है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इसमें प्रोडक्शन, रिसर्च और स्क्रिप्टिंग जैसी सेवाएं भी शामिल थीं.

इसरो चेयरमैन की बेसिक सैलरी कितनी है?

  • इसरो चेयरमैन का पद केंद्र सरकार के सचिव स्तर से जुड़ा है. सातवें केंद्रीय वेतन आयोग के वेतनमान के अनुसार, इस पद का बेसिक वेतन ₹2.25 लाख प्रति माह यानी ₹27 लाख सालाना है. इसके अलावा नियमानुसार महंगाई भत्ता और पात्रता के अनुसार अन्य भत्ते मिलते हैं.
  • यह राशि बेसिक वेतन है, पूरी ग्रॉस सैलरी या हाथ में आने वाली रकम नहीं. वास्तविक भुगतान में भत्तों, सरकारी आवास जैसी सुविधाओं और लागू कटौतियों के कारण अंतर हो सकता है.
  • छठे वेतन आयोग के दौरान शीर्ष सचिव स्तर का निर्धारित बेसिक वेतन ₹80,000 प्रति माह था. सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद यह बढ़कर ₹2.25 लाख प्रति माह हुआ. इसके बाद महंगाई भत्ते में समय-समय पर संशोधन हुआ है, लेकिन इससे बेसिक वेतन अपने आप नहीं बदलता.
  • इसरो चेयरमैन का वेतन किसी निजी कंपनी के प्रमुख की तरह बाजार के आधार पर अलग से तय नहीं होता. यह केंद्र सरकार के निर्धारित वेतनमान और सेवा नियमों से जुड़ा है.
  • इसरो के पहले चेयरमैन डॉक्टर विक्रम साराभाई ने प्रतीकात्मक रूप से 1 रुपये सैलरी ली थी.

इस समय इसरो के चेयरमैन कौन हैं?

इस समय इसरो के चेयरमैन डॉक्टर वी. नारायणन है. उन्होंने 14 जनवरी 2025 को पदभार ग्रहण किया. वे अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव भी हैं. इससे पहले, वे तिरुवनंतपुरम स्थित लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर (LPSC) के निदेशक थे. उन्होंने पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ का स्थान लिया है.

इसरो के चेयरमैन को मिलने वाली मुख्य सुविधाएं

  • बेंगलुरु (इसरो मुख्यालय) या दिल्ली में Type-VII / Type-VIII बंगला या उच्च श्रेणी का सरकारी आवास
  • राइवर सहित सरकारी कार (आधिकारिक उपयोग के लिए)
  • खुद और परिवार के लिए CGHS या समकक्ष स्वास्थ्य योजना। इलाज का खर्च सरकार वहन करती है
  • बिजनेस या फर्स्ट क्लास में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आधिकारिक यात्रा
  • LTC (Leave Travel Concession) परिवार सहित
  • आधिकारिक टेलीफोन, मोबाइल, लैपटॉप
  • स्टाफ सपोर्ट (ऑर्डरली आदि)
  • छुट्टियां और अवकाश सुविधाएं
  • सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन/NPS लाभ
  • सुरक्षा कवर (जरूरत और खतरे के आकलन के आधार पर)
  • ये सुविधाएं सामान्य रूप से भारत सरकार के अन्य सचिव स्तर के अधिकारियों को भी मिलती हैं. इसरो चीफ को कोई विशेष 'एक्स्ट्रा' निजी लाभ नहीं मिलता. सब कुछ सरकारी नियमों के अधीन होता है.
  • नकद वेतन निजी क्षेत्र के टॉप एग्जीक्यूटिव्स की तुलना में कम है, लेकिन सरकारी आवास, गाड़ी, मेडिकल और यात्रा सुविधाओं को जोड़कर देखें तो कुल पैकेज काफी अच्छा और स्थिर है.

क्या इसरो के वैज्ञानिक बेहतर वेतन के लिए नौकरी छोड़ रहे हैं?

वैज्ञानिकों को बनाए रखने का सवाल केवल वेतन के आंकड़े तक सीमित नहीं है. जुलाई 2026 में आई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसरो के 100 से अधिक वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मियों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के अनुरोध सामने आए. इनमें गगनयान और अन्य अहम मिशनों से जुड़े कर्मियों के मामले भी शामिल थे. इसके बाद अंतरिक्ष विभाग ने 14 जुलाई 2026 के ज्ञापन के जरिए महत्वपूर्ण मिशनों से जुड़े वैज्ञानिक एवं तकनीकी कर्मियों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के अनुरोधों पर निर्णय की प्रक्रिया सख्त की.

ऐसे मामलों को संबंधित केंद्रों से आगे विभाग के पास भेजने की व्यवस्था की गई. रिपोर्टों में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में बेहतर वेतन और करियर के अवसरों को इस बदलाव की पृष्ठभूमि में अहम कारक बताया गया. हालांकि, सभी इस्तीफों का कारण केवल वेतन को मानना सही नहीं होगा.

इसरो चेयरमैन वी. नारायणन ने भी कर्मियों के जाने की बात स्वीकार करते हुए कहा था कि संगठन यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर इसका अचानक असर न पड़े. यह स्थिति एक बड़े नीतिगत सवाल की ओर इशारा करती है कि क्या भारत को वैज्ञानिकों के वेतन, शोध के अवसर, करियर में प्रगति और निजी क्षेत्र के साथ प्रतिस्पर्धा- इन सभी पहलुओं पर मिलकर काम करने की जरूरत है?

नासा से तुलना में इसरो कहां खड़ा है?

  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और इसरो की तुलना सिर्फ बजट या किसी एक अधिकारी के वेतन से नहीं की जा सकती. दोनों के बजट, कार्यक्षेत्र, मानव अंतरिक्ष उड़ान के अनुभव और संस्थागत ढांचे में बड़ा अंतर है.
  • नासा के पास बड़े वैज्ञानिक मिशनों और गहरे अंतरिक्ष के अध्ययन के लिए कहीं अधिक संसाधन हैं, जबकि इसरो सीमित बजट में लागत-दक्षता और मिशन पूरा करने की क्षमता के लिए जाना जाता है.
  • भारत ने चंद्रयान-3, मंगलयान और आदित्य-L1 जैसे मिशनों के जरिए अपनी तकनीकी क्षमता साबित की है. अब गगनयान और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए अनुभवी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और विशेषज्ञों को बनाए रखना भी उतना ही अहम होगा.
  • नासा का वार्षिक बजट 25 बिलियन डॉलर है, जबकि इसरो का बजट 1.5 से 1.9 बिलियन डॉलर यानी 13 से 14 हजार करोड़ है. नासा का बजट इसरो से 12-15 गुना है. नासा का इकोसिस्टम बहुत बड़ा है.
  • इसरो की स्थापना 1969 में हुई थी, जबकि नासा का गठन 1958 में किया गया. नासा ने चंद्रमा पर कई मानव लैंडिंग कराए हैं और रोबोटिक मिशन भेजे हैं, जबकि भारत ने 2023 में चंद्रयान-3 की दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराई थी.
  • नासा अभी भी दुनिया की नंबर-1 स्पेस एजेंसी है- बजट, अनुभव, मानव उड़ान और वैज्ञानिक मिशनों में... वहीं, इसरो को विश्व स्तर पर टॉप 5–6 एजेंसियों में गिना जाता है. यह 'कम बजट में ज्यादा परिणाम' का बेहतरीन उदाहरण है. कई क्षेत्रों (लागत, कुछ प्लैनेटरी मिशन, लॉन्च विश्वसनीयता) में यह नासा और अन्य एजेंसियों से बेहतर प्रदर्शन दिखाता है. भारत का स्पेस प्रोग्राम तेजी से बढ़ रहा है. गगनयान, भारतीय स्पेस स्टेशन और भविष्य के चंद्र/मंगल मिशनों के साथ यह अंतर और कम करने की दिशा में है.
  • NASA दिग्गज है, जबकि ISRO 'स्मार्ट और किफायती चैंपियन'... दोनों की तुलना सीधे बजट से नहीं, बल्कि उपलब्धियों और दक्षता से करनी चाहिए. इसरो अपनी लीग में बहुत मजबूत खड़ा है.

कुल मिलाकर, सवाल यह नहीं कि टीवी कार्यक्रम पर खर्च करना गलत है या वैज्ञानिकों का वेतन सीधे किसी एंकर के अनुबंध के बराबर कर दिया जाए. सवाल यह है कि सार्वजनिक धन से चलने वाले संस्थानों में खर्च और प्रोत्साहन तय करते समय भारत अपनी दीर्घकालिक वैज्ञानिक जरूरतों को कितनी प्राथमिकता देता है.

अगला लेख