मुख्य चुनाव आयुक्त से भिन्न बाकी 2 चुनाव आयुक्तों की राय, आजादी के बाद होता था सिर्फ CEC, कब और क्यों जोड़े गए 2 अन्य इलेक्शन कमिश्नर
आजादी के बाद चुनाव आयोग में सिर्फ CEC होता था. 1989 में पहली बार 2 Election Commissioners जुड़े, 1990 में हटे और 1993 से 3 सदस्यीय व्यवस्था कायम है.
भारत का चुनाव आयोग आज तीन सदस्यों की संस्था है, लेकिन क्या आपको पता है कि आजादी के बाद करीब चार दशक तक देश के चुनाव आयोग में सिर्फ एक ही सदस्य हुआ करता था? मुख्य चुनाव आयुक्त ही आयोग का पूरा चेहरा और निर्णय का केंद्र होते थे. फिर 1989 में अचानक दो चुनाव आयुक्त और जोड़े गए, लेकिन यह व्यवस्था कुछ महीनों में ही खत्म हो गई. 1993 में दोबारा दो चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए और इसके बाद तीन सदस्यीय व्यवस्था स्थायी हो गई.
अब जब मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों की राय को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब चुनाव आयोग की इस पूरी यात्रा को समझना जरूरी हो जाता है. आखिर दो चुनाव आयुक्तों को जोड़ने की जरूरत कब और क्यों महसूस हुई? क्या उनकी राय मुख्य चुनाव आयुक्त से अलग हो सकती है और ऐसी स्थिति में अंतिम फैसला किसका होता है?
क्या आज CEC से अलग दो चुनाव आयुक्तों की राय भी महत्वपूर्ण होती है?
भारत के चुनाव आयोग में इस समय एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं. संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग की व्यवस्था की गई है. इसी अनुच्छेद के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का भी प्रावधान है. इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के प्रमुख होते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आयोग के हर निर्णय में केवल उनकी राय ही अंतिम मानी जाती है. तीन सदस्यीय आयोग में निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं और तीनों सदस्यों की राय का महत्व होता है. यदि किसी विषय पर तीनों एकमत हैं तो निर्णय सर्वसम्मति से होता है और यदि मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है.
क्या सीईसी को बाकी दो चुनाव आयुक्तों से अधिक मताधिकार मिलता है?
ऐसा नहीं है. निर्णय के मामले में तीनों सदस्यों के मत का समान महत्व है. मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के प्रमुख होते हैं, लेकिन उन्हें दो मत प्राप्त नहीं होते. यदि मुख्य चुनाव आयुक्त किसी विषय पर एक राय रखते हैं और दोनों चुनाव आयुक्त दूसरी राय रखते हैं तो दोनों चुनाव आयुक्तों की संयुक्त राय बहुमत बन सकती है. इसी तरह यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और एक चुनाव आयुक्त एक राय पर हों और तीसरा चुनाव आयुक्त असहमत हो तो दो सदस्यों की राय निर्णय का आधार बनती है. इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त का पद आयोग में प्रमुख होने का है, लेकिन हर निर्णय पर अकेले अधिकार का नहीं.
क्या आजादी के बाद से ही चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते थे?
25 जनवरी 1950 को चुनाव आयोग की स्थापना के समय यह एक सदस्यीय संस्था थी. उस समय केवल मुख्य चुनाव आयुक्त —सीईसी— होता था. भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे. उन्होंने 21 मार्च 1950 से 19 दिसंबर 1958 तक इस पद पर काम किया. उस समय देश में चुनाव आयोग के साथ दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था नहीं थी. शुरुआती करीब चार दशकों तक आयोग मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में ही काम करता रहा.
क्या संविधान ने शुरू से केवल एक CEC की व्यवस्था की थी?
संविधान ने आयोग की सदस्य संख्या को स्थायी रूप से एक तक सीमित नहीं किया था. अनुच्छेद 324 की दूसरी उपधारा में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान रखा गया. इसका अर्थ यह था कि जरूरत के अनुसार आयोग को एक से अधिक सदस्यों वाला बनाया जा सकता था. वास्तविकता यह है कि संविधान ने बहुसदस्यीय आयोग की संभावना रखी, लेकिन शुरुआती दशकों में सरकार ने एक सदस्यीय व्यवस्था को ही बनाए रखा.
पहली बार 2 चुनाव आयुक्त कब नियुक्त किए गए?
16 अक्टूबर 1989 को पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए. इस तरह चुनाव आयोग पहली बार तीन सदस्यीय हुआ. इन दोनों चुनाव आयुक्तों के नाम वी.एस. सीगल और एस.एस. धनोआ थे. हालांकि, यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चली. जनवरी 1990 में दोनों अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था समाप्त कर दी गई और चुनाव आयोग फिर से एक सदस्यीय हो गया. इस तरह 1989 का पहला बहुसदस्यीय प्रयोग कुछ ही महीनों तक रहा.
1989 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों को जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?
इस बदलाव को उस समय चल रही चुनाव सुधारों की बहस से जोड़कर देखा जाता है. चुनाव सुधारों के लिए बनी दिनेश गोस्वामी समिति ने चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने की सिफारिश की थी. उस दौर में चुनाव प्रक्रिया में सुधार, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों को लेकर व्यापक चर्चा चल रही थी. इसी वातावरण में 1989 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए.
हालांकि, उनकी नियुक्ति को लेकर राजनीतिक विवाद भी हुआ. तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त आर.वी.एस. पेरी शास्त्री और सरकार के बीच अधिकारों तथा चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर मतभेद की चर्चा सामने आई थी. इसलिए 1989 का घटनाक्रम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी संरचना को लेकर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा भी था.
1990 में दो EC की व्यवस्था क्यों समाप्त कर दी गई?
1989 में बनाई गई तीन सदस्यीय व्यवस्था स्थायी नहीं रही. जनवरी 1990 में दोनों अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल समाप्त कर दिया गया और आयोग फिर से केवल मुख्य चुनाव आयुक्त वाली व्यवस्था में लौट गया. इसके बाद दिसंबर 1990 में टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने. उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर देश में व्यापक चर्चा हुई. चुनावी आचार संहिता, चुनावी अनुशासन और चुनाव प्रक्रिया को सख्ती से लागू करने के कारण उनका कार्यकाल भारतीय चुनाव व्यवस्था के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है.
फिर दो चुनाव आयुक्तों को दोबारा कब जोड़ा गया?
1 अक्टूबर 1993 को दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति फिर की गई. इस बार व्यवस्था पहले जैसी अस्थायी नहीं रही. इसके बाद चुनाव आयोग लगातार तीन सदस्यीय व्यवस्था में काम कर रहा है. इसलिए वर्तमान व्यवस्था की वास्तविक शुरुआत 1993 से मानी जाती है. 1989 में पहली बार तीन सदस्यीय आयोग बनाया गया था, लेकिन 1990 में वह व्यवस्था समाप्त हो गई थी. 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की दोबारा नियुक्ति के बाद बहुसदस्यीय व्यवस्था लगातार बनी हुई है.
1993 में दो EC जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?
1993 का बदलाव ऐसे समय हुआ जब चुनाव आयोग के अधिकार, स्वतंत्रता और चुनाव प्रक्रिया में उसकी भूमिका को लेकर तीखी चर्चा थी. इसी वर्ष दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए और आयोग को फिर तीन सदस्यीय बनाया गया. इसका एक संस्थागत परिणाम यह हुआ कि चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण निर्णयों में एक से अधिक संवैधानिक पदाधिकारियों की भागीदारी सुनिश्चित हुई. इसके बाद आयोग के कामकाज में सामूहिक निर्णय की व्यवस्था मजबूत हुई. हालांकि इस बदलाव को तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से भी अलग करके नहीं देखा जा सकता.
क्या तीन सदस्यीय आयोग बनने से EC का महत्व कम हो गया?
ऐसा कहना सही नहीं होगा. मुख्य चुनाव आयुक्त आज भी चुनाव आयोग के प्रमुख होते हैं और संविधान में उनके पद की अलग व्यवस्था है. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भी अन्य चुनाव आयुक्तों की तुलना में अधिक कठोर है. लेकिन आयोग के निर्णयों के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले निर्णयकर्ता नहीं हैं. तीनों सदस्य मिलकर आयोग के रूप में निर्णय लेते हैं. इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त का पद महत्वपूर्ण होने और प्रत्येक निर्णय पर अकेले अधिकार होने में अंतर है.
दो चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग हो जाए तो क्या होगा?
आयोग में सामान्य रूप से प्रयास होता है कि किसी विषय पर सहमति से निर्णय लिया जाए. लेकिन यदि मतभेद बना रहता है तो बहुमत का सिद्धांत लागू होता है. तीन सदस्यीय आयोग में इसका सीधा अर्थ है कि दो सदस्य जिस राय के पक्ष में हैं, वही आयोग का निर्णय बन सकती है. उदाहरण के लिए यदि मुख्य चुनाव आयुक्त किसी प्रस्ताव से असहमत हैं लेकिन दोनों चुनाव आयुक्त उसके पक्ष में हैं, तो दो मतों के कारण प्रस्ताव बहुमत प्राप्त कर सकता है.
इसके उलट मुख्य चुनाव आयुक्त और किसी एक चुनाव आयुक्त की राय समान होने पर तीसरे सदस्य की असहमति के बावजूद दो मतों का निर्णय प्रभावी हो सकता है.
क्या चुनाव आयुक्त अपनी अलग राय दर्ज कर सकते हैं?
चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसे उदाहरण रहे हैं जब किसी चुनाव आयुक्त ने आयोग के बहुमत के निर्णय से अलग अपनी राय रखी. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता से जुड़े कुछ मामलों में अपने साथी सदस्यों से अलग राय दर्ज की थी. उनके असहमति वाले मत उस समय सार्वजनिक चर्चा का विषय बने थे.
क्या 2026 में भी आयोग के भीतर अलग राय का मामला सामने आया?
23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि वर्तमान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूची से जुड़े कुछ निर्णयों पर कई औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं.
रिपोर्ट में ऐसी 14 आपत्तियों का उल्लेख किया गया है. इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने से जुड़ी प्रक्रिया, प्रपत्र संख्या छह और चुनावी आंकड़ों से जुड़ी व्यवस्था सहित कई विषयों का उल्लेख है. यह विवरण प्रकाशित रिपोर्ट में बताए गए दस्तावेजों और दावों पर आधारित है, इसलिए इसे सीधे चुनाव आयोग का आधिकारिक मत नहीं माना जाना चाहिए.
क्या चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को स्वीकार किया है?
इस मामले में चुनाव आयोग की ओर से सामने आया पक्ष अलग है. आयोग से जुड़े सूत्रों ने रिपोर्ट के बाद कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण सहित आयोग के सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और निर्णय सर्वसम्मति से हुए. इसलिए उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर अंतिम रूप से दो बनाम एक का फैसला हुआ.एक ओर प्रकाशित रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र है और दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से फैसलों को सर्वसम्मत बताया गया है. दोनों दावों को अलग-अलग रखना जरूरी है.




