Begin typing your search...

हिंसक Protest में पुलिस की लिमिटेशन क्या? Pellet gun से FIR और medical treatment तक- कानून क्या कहता है?

प्रदर्शन में पुलिस कितना बल इस्तेमाल कर सकती है? पेलेट गन, लाठीचार्ज, एफआईआर, इलाज और प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख समझिए.

हिंसक Protest में पुलिस की लिमिटेशन क्या? Pellet gun से FIR और medical treatment तक- कानून क्या कहता है?
X

NEET और पेपर लीक के विरोध में दिल्ली में हुए प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट में पेलेट गन और पुलिस बल के इस्तेमाल को लेकर उठा सवाल अब सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं है. असली मुद्दा यह है कि संविधान प्रदर्शनकारियों को कितना अधिकार देता है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस कितनी ताकत इस्तेमाल कर सकती है? 20 जुलाई के “संसद चलो” प्रदर्शन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव के बाद पेलेट जैसी चोटों के आरोप सामने आए. दिल्ली पुलिस ने पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया, जबकि कुछ घायलों की चिकित्सा रिपोर्ट में पेलेट जैसी चोटों का दावा सामने आया.

इस मसले पर 30 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पेलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग स्वीकार नहीं की, लेकिन इसके इस्तेमाल को असाधारण परिस्थितियों तक सीमित रखने की बात कही. कोर्ट ने गोला-बारूद का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और हालिया छात्र प्रदर्शनों में घायलों का इलाज सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया.


शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार है या पुलिस उसे रोक सकती है?

Article 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और Article 19(1)(b) शांतिपूर्ण तथा बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है. हालांकि, ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं. Article 19(2) और 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था जैसे आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

इसलिए सरकार की आलोचना करना या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपने आप अपराध नहीं है. लेकिन हिंसा, गंभीर कानून-व्यवस्था का खतरा या वैध तरीके से सभा समाप्त करने के आदेश की अवहेलना होने पर राज्य हस्तक्षेप कर सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग मामले में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को स्वीकार किया था, लेकिन सार्वजनिक सड़कों और स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जे से दूसरे नागरिकों के अधिकार प्रभावित होने की बात कही थी. यानी संवैधानिक संतुलन साफ है- प्रदर्शन का अधिकार, उचित प्रतिबंध और सार्वजनिक व्यवस्था.

सिर्फ प्रदर्शन पर पुलिस लाठीचार्ज कर सकती है?

सुप्रीम कोर्ट की हालिया सुनवाई में यही थ्योरी सामने आया कि केवल आंदोलन या प्रदर्शन होने से पुलिस बल का इस्तेमाल अपने आप उचित नहीं हो जाता. हालांकि, प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस या पत्रकारों के साथ हिंसा के आरोप भी जांच का हिस्सा हैं. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 148, पुराने CrPC की धारा 129 के स्थान पर लागू है. इसके तहत कार्यपालिका मजिस्ट्रेट या अधिकृत पुलिस अधिकारी ऐसी गैरकानूनी सभा को हटने का आदेश दे सकता है, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की स्थिति पैदा हो. आदेश के बाद भी सभा नहीं हटती तो पुलिस बल का इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन यह असीमित बल की अनुमति नहीं है.

जांच में देखा जाएगा कि खतरा वास्तविक और तत्काल था या नहीं, चेतावनी दी गई या नहीं, कम बल से स्थिति संभाली जा सकती थी या नहीं और इस्तेमाल किया गया बल खतरे के अनुपात में था या नहीं.

प्रदर्शनकारी हिंसा करें तो पुलिस की जिम्मेदारी क्या?

  • अगर प्रदर्शनकारी पत्थरबाजी, हमला या गंभीर हिंसा करते हैं तो पुलिस बल की जरूरत का आकलन अलग होगा.
  • BNS की धारा 189 गैरकानूनी सभा और वैध रूप से सभा समाप्त करने का आदेश दिए जाने के बाद भी उसमें बने रहने पर आपराधिक मामला बनेगा. घातक हथियार के साथ गैरकानूनी सभा में शामिल होने के लिए भी अलग प्रावधान हैं.
  • BNS की धारा 195 दंगा रोकने वाले लोक सेवक पर हमला या उसके काम में बाधा डालने से संबंधित है, जिसके तहत पुलिस कारवाई कर सकती है. इसके तहत धारा 195(1) में हमला करने पर 3 साल तक की कैद और कम से कम 25,000 रुपये का जुर्माना है.
  • वहीं धारा 195(2) में केवल धमकी या बाधा डालने का प्रयास करने पर 1 साल तक की कैद या जुर्माना हो सकता है.
  • दूसरी ओर पेलेट गन इसलिए अलग कानूनी सवाल खड़ा करती है क्योंकि इससे होने वाली चोट सामान्य भीड़ नियंत्रण के साधनों से अलग हो सकती है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की चिकित्सा विशेषज्ञों पर आधारित रिपोर्ट में आंखों, नसों और शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों में गंभीर चोट तथा स्थायी दिव्यांगता या मानसिक आघात के खतरे का जिक्र है. इसलिए सवाल यह होगा कि उस विशेष परिस्थिति में इस तरह के बल का इस्तेमाल वास्तव में जरूरी था या नहीं और क्या तय प्रक्रिया का पालन हुआ.


घायल प्रदर्शनकारी के पास कानूनी रास्ते क्या?

अगर किसी पुलिसकर्मी पर संज्ञेय अपराध का आरोप है तो BNSS की धारा 173 के तहत थाने में मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना दी जा सकती है. पुलिस के खिलाफ शिकायत होने का मतलब यह नहीं है कि एफआईआर दर्ज ही नहीं हो सकती.

BNS की धारा 198 में लोक सेवक द्वारा कानून के निर्देश का जानबूझकर उल्लंघन करने और उससे किसी व्यक्ति को चोट पहुंचने की संभावना जानते हुए ऐसा करने पर आपराधिक जिम्मेदारी का प्रावधान है. हालांकि, हर विवादित पुलिस कार्रवाई अपने आप इस धारा के तहत अपराध नहीं बनती.

30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को हालिया छात्र प्रदर्शनों में घायल लोगों का इलाज सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. BNS की धारा 200 में अस्पताल प्रभारी द्वारा BNSS की धारा 397 से जुड़े पीड़ित उपचार संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान है.

असली कानूनी कसौटी क्या?

20 जुलाई 2026 की घटना का फैसला सिर्फ इस सवाल से नहीं होगा कि “पेलेट चली या नहीं चली.” पुलिस एक्शन की असली कानूनी कसौटी पांच सवालों पर से तय होगी. ये सवाल हैं:

  1. क्या बल प्रयोग जरूरी था?
  2. क्या इस्तेमाल किया गया बल खतरे के अनुपात में था?
  3. क्या तय नियम और वैध आदेशों का पालन हुआ?
  4. गोला-बारूद, सीसीटीवी, वीडियो और चिकित्सा रिकॉर्ड क्या बताते हैं?
  5. क्या घायल को इलाज, एफआईआर और स्वतंत्र जांच का रास्ता मिला या नहीं?

यहां पर इस बात जिक्र कर देना भी जरूरी है कि पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन असाधारण परिस्थितियों, गोला-बारूद के रिकॉर्ड और घायल प्रदर्शनकारियों के इलाज पर जोर देकर बल प्रयोग, साक्ष्य, जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों को जांच के केंद्र में रखा है.

एक्सप्लेनर
अगला लेख