जिस केरल में जीता पहला चुनाव वहां से भी अब लेफ्ट साफ, देश में 49 साल बाद बनी ऐसी पिक्चर
केरल में एलडीएफ की हार के साथ भारत में कम्युनिस्ट शासन के अंत की स्थिति साफ हो गई है. इसी राज्य से कभी पार्टी ने अपनी जड़ें जमाई थीं.
Kerala Elections: केरल में Communist Party of India (Marxist) के नेतृत्व वाले Left Democratic Front (एलडीएफ) के दो लगातार कार्यकाल के बाद सत्ता से बाहर हो गई है. सोमवार (4 मई) को आए नतीजों के बाद एलडीएफ सत्ता खो रहा है.
1977 के बाद पहली बार भारत में किसी भी राज्य में कम्युनिस्ट सरकार नहीं रहेगी. केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट सरकारें रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में इन राज्यों में इस विचारधारा का प्रभाव लगातार कम हुआ है.
केरल में कब बनी थी पहली बार कम्युनिस्ट सरकार?
केरल में 1957 में Communist Party of India ने पहली बार सरकार बनाई थी. यह दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार थी. हालांकि इसे बहुत कम बहुमत मिला था. इस सरकार ने कई अहम नीतियां लागू कीं, जिनमें भूमि सुधार और वंचित वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं शामिल थीं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय मुख्यमंत्री EMS Namboodiripad की अध्यक्षता में बनी प्रशासनिक सुधार समिति ने पहली बार आरक्षण के लाभ से संपन्न वर्ग को बाहर रखने का सुझाव दिया था. बाद में “क्रीमी लेयर” की अवधारणा इसी से विकसित हुई.
क्यों नहीं चल पाई सरकार?
हालांकि यह सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी. कई सुधारों का विरोध हुआ और प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने करीब दो साल बाद इस सरकार को बर्खास्त कर दिया. यह केंद्र द्वारा अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल का पहला उदाहरण माना जाता है. इसके बावजूद इस सरकार की विरासत लंबे समय तक बनी रही. बाद में आई कांग्रेस सरकार भी भूमि सुधार के एजेंडे को पूरी तरह छोड़ नहीं सकी.
समय के साथ “केरल मॉडल” की भी आलोचना हुई. कई मुद्दे जैसे दलितों और आदिवासियों के बीच भूमि की कमी, कृषि का कमजोर होना, विदेशों से आने वाली रकम पर निर्भरता, स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां और सांप्रदायिक संबंधों में तनाव जैसे सवाल उठते रहे.
इसके बाद भी Communist Party of India (Marxist) कई चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनती रही. Pinarayi Vijayan के नेतृत्व वाली सरकार ने लगातार दो बार सत्ता में वापसी कर एक अलग रिकॉर्ड बनाया, क्योंकि केरल में आमतौर पर सरकार बदलती रहती है. मौजूदा हार को एंटी-इंकम्बेंसी और विजयन पर अधिक निर्भरता से जोड़ा जा रहा है.
पश्चिम बंगाल में कब से कब तक रही कम्युनिस्य सरकार?
पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक कम्युनिस्ट सरकार का लंबा दौर रहा. यह भारतीय इतिहास में किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे लंबा शासन था, जिसका नेतृत्व Jyoti Basu और बाद में Buddhadeb Bhattacharya ने किया.
बंगाल में कम्युनिस्ट आंदोलन की शुरुआत M. N. Roy के समय से मानी जाती है, जिन्होंने 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी. 1977 में पार्टी की जीत के पीछे 1972 के चुनाव में धांधली के आरोप और 1975-77 के आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार के खिलाफ नाराजगी को भी वजह माना गया.
कैसे हुआ सीपीआई(एम) का गठन?
इससे पहले 1964 में विचारधारा के मतभेदों के चलते कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ और Communist Party of India (Marxist) का गठन हुआ. इसके बाद पार्टी ने भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था में बदलाव जैसे कदमों से किसानों और मजदूरों के बीच मजबूत आधार बनाया.
हालांकि 1990 के दशक में औद्योगीकरण और जबरन भूमि अधिग्रहण की नीतियों से पार्टी का पारंपरिक समर्थन कमजोर हुआ. एंटी-इंकम्बेंसी, राजनीतिक हिंसा और विकास की धीमी रफ्तार ने भी लोगों में असंतोष पैदा किया. 2011 में All India Trinamool Congress और उसकी नेता Mamata Banerjee ने वाम मोर्चे को सत्ता से बाहर कर दिया.
त्रिपुरा में भी 1977 में पहली बार कम्युनिस्ट सरकार बनी थी. यहां भी पार्टी को कई बार जीत मिली, जिसमें 1998 से 2018 तक Manik Sarkar के नेतृत्व में लगभग दो दशकों तक सरकार रही. इस तरह तीनों राज्यों में कभी मजबूत रही कम्युनिस्ट राजनीति अब धीरे-धीरे कमजोर होती नजर आ रही है.




