EXPLAINER: नेताओं द्वारा कब्जाए गए 'कॉकरोच आंदोलन' के क्लेश में निहत्थों पर पुलिसिया लट्ठ बरसाते मुसटंडे कौन....!
दिल्ली के जंतर-मंतर में शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन अब राजनीतिक रंग ले चुका है. सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल ले जाने और सादे कपड़ों में छात्रों पर लाठीचार्ज करने वाले लोगों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है.
आज जिक्र देश के शिक्षित बेरोजगारों के 'कॉकरोच' आंदोलन पर हो चुके राजनीतिक कब्जे और सरकारी मशीनरी द्वारा छात्रों के ऊपर किए जा रहे कुठाराघात-खूनी आघात का... जिक्र इस शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन के भंयकर रूप लेने की करते हैं, जिसमें खबरों के मुताबिक कथित रुप से ही सही, मगर दिल्ली पुलिस ने आग में घी का काम कर डाला है. बताओ भला खाकी वर्दीधारी किसी दिल्ली पुलिस के जवान के साथ पुलिस वालों के ही हाथों में अक्सर देखे जाने वाले नीले हत्थे वाले सफेद घातक चोट पहुंचाने वाले बेंतों का किसी सिविलियन या आम आदमी से क्या वास्ता....? यह बेंत तो पुलिस के हैं और इस्तेमाल इन्हें पुलिस वालों के साथ सादा कपड़ों में मौजूद गुंडा टाइप ‘लौंडे’ कर रहे हैं. क्या है यह?
क्या ये सादा लिबास में गुंडे हैं या फिर दिल्ली पुलिस के ही बहुरुपिए जवान, जिन्होंने मीडिया के कैमरों में खुद को वर्दी में कैद होने से बचाने की गरज से खाकी वर्दी नहीं पहनी. ताकि जब यह आंदोलनकारी छात्रों-भीड़ के ऊपर कहर बनकर निहत्थों पर बेंत बरसाएं तो, इनकी पहचान दिल्ली पुलिस के रुप में न होने पाए.
गुंडे-मुसटंडे दिल्ली में कैसे घुस आए?
बहरहाल अब यह दिल्ली पुलिस तय करे कि सड़क किनारे बंदरों की सी लाइन लगाकर कुछ पुलिस वालों के बीच पुलिस के ही सफेद प्लास्टिक के बेंत लेकर बैठे यह बाहरी गुंडे हैं? या फिर दिल्ली पुलिस के रूप बदलकर पब्लिक की कुटाई के लिए ‘विशेष-आमंत्रित’ बहुरुपिए दिल्ली पुलिस के मुसटंडे जवान ! अगर गुंडे हैं तो सवाल यह कि आखिर जब कॉकरोच आंदोलन के चलते दिल्ली के चप्पे-चप्पे पर पुलिस का जाल है तो, यह गुंडे-मुसटंडे दिल्ली में कैसे घुस आए? और पुलिस महकमे द्वारा इस्तेमाल करने वाले बेंत इनके हाथों में कैसे आ गए?
अगर यह दिल्ली पुलिस के ही जवान हैं तो दिल्ली पुलिस बताए कि क्या वह इतनी डरपोक हो चुकी है कि उसे कोर्ट कचहरी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के चाबुक की मार से अपनी खाल बचाने को, खाकी वर्दी न पहनकर आदमी का सा लिबास पहन आंदोलनरत छात्रों की निहत्थी भीड़ से मुकाबले को मैदान में उतरना पड़ा.
बाबा रामदेव को जब धारण करना पड़ा था स्त्री रूप
जिस तरह इस आंदोलन का चेहरा छात्रों के सामने पुलिस और अर्धसैनिक बलों के अड़ने से बिगड़ा या कुरूप हुआ है, कुछ इसी तरह साल 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन का भी चेहरा बिगड़ा था. तब जब बाबा रामदेव को उनकी औकात बताकर सरकारी मशीनरी के बलबूते बेदम करने की गरज से उस वक्त देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार यानी कांग्रेसी हुकूमत ने दिल्ली पुलिस को जिम्मेदारी सौंप दी थी. भले ही उस शर्मनाक कांड में बाबा रामदेव को अपनी जान बचाकर भागने के लिए स्त्री रूप धारण ही क्यों न करना पड़ा हो, मगर दिल्ली पुलिस ने बाबा को बेदम करने के लिए कोई सरकारी कोर कसर या साम दाम दंड भेद बाकी नहीं छोड़ा था.
बाबा को काबू में करने के लिए दिल्ली पुलिस ने रची थी साजिश
उस हद तक कि बाबा को किसी भी कीमत पर काबू करने के लिए दिल्ली पुलिस को अपने सैकड़ों बांक-बहादुर खाकी वर्दी की बजाए, सादा लिबास में आम आदमी की तरह धरना-प्रदर्शन स्थल पर ले जाकर छिपाने पड़े थे. ताकि वे आंदोलनकारियों की भीड़ का हिस्सा सा ही दिखाई देकर बाबा रामदेव की गर्दन तक आसानी से पहुंच सकें. हालांकि ऐसा दिल्ली पुलिस कर न सकी क्योंकि रामदेव बाबा दिल्ली पुलिस से भी ज्यादा मास्टमाइंड यानी चार कदम आगे निकले.
और बाबा रामदेव ने दिल्ली पुलिस की आंखों में झोंक दिया धूल
बाबा रामदेव दिल्ली पुलिस के तमाम तमाशाई इंतजामों पर थूककर महिला के वस्त्र धारण करके औरत के वेश में दिल्ली पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर नौ दो ग्यारह हो गए. तब भी आज के कॉकरोच पार्टी आंदोलन की तरह ही दिल्ली पुलिस ने प्लानिंग की होगी कि रामदेव या उनके समर्थकों पर सरकारी सिस्टम की ताकत का जब दिल्ली पुलिस बेजा इस्तेमाल करे तब मीडिया के कैमरों में किसी भी तरह से भीड़ में सादा कपड़ों में छिपे दिल्ली पुलिस के जवान बाबा रामदेव या उनके समर्थकों की धुनाई, कुटाई और बेइज्जती करते कैद न होने पाएं.
अब अगर तस्वीरें और वीडियो इन दिनों चल सड़क से संसद तक जा पहुंचे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की देखी जाएं तो, यहां भी बाबा रामदेव कांड वाला काला इतिहास कथित रूप से ही सही मगर आज खुद को दोहराता नजर आ रहा है. सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो फोटो मौजूद हैं जिनमें शारीरिक दृष्टिकोण से मजबूत कद काठी वाले हट्टे कट्टे गुंडा टाइप ये मुसटंडे, जिनकी बॉडी, किसी पुलिस या पैरा मिलिट्री जवान सी साफ-साफ दिखाई पड़ रही है, लाठी-डंडे लेकर प्रदर्शनकारी छात्रों की निहत्थी भीड़ पर भयंकर तरीके से काल बनकर ताबड़तोड़ तरीके से लट्ठ बरसाते नजर आ रहे हैं.
दिल्ली पुलिस के जवान सादी वर्दी में नहीं हैं तो कौन हैं?
जांच का विषय है कि अगर यह सरकारी अर्धसैनिक बल और दिल्ली पुलिस के जवान सादी वर्दी में नहीं हैं तो कौन हैं? अगर दिल्ली पुलिस या अर्धसैनिक बलों के जवान सादा कपड़ों में अपनी पहचान छिपाकर निहत्थे विद्यार्थियों की भीड़ पर लाठियां नहीं बरसा रहे हैं, और अगर यह बाहरी असामाजिक तत्व हैं तो सवाल यह है कि चप्पे-चप्पे पर जब दिल्ली पुलिस तनी खड़ी है. तब फिर यह पुलिस के मुसटंडे से दिखाई दे रहे असामाजिक तत्व आखिर दिल्ली की सीमा पार करके कैसे आंदोलनरत भीड़ के बीच सुरक्षित जा पहुंचे? वो भी दिल्ली पुलिस की आंखों में धूल झोंककर. इनकी तो पहचान करके दिल्ली पुलिस को इनकी हड्डी पसलियां तोड़कर मुकदमा दर्ज करके तिहाड़ जेल भेज देना चाहिए.
मान भी लिया जाए कि यह गुंडा टाइप मुसटंडे जो अगर बाहरी हैं तो फिर पुलिस के सफेद प्लास्टिक बेंत के साथ यह दिल्ली पुलिस के जवानों संग मटरगश्ती और लट्ठबाजी निहत्थों पर कैसे कर रहे है....दिल्ली पुलिस के जवानों की आंखों के सामने उनकी मौजूदगी में?
कैसे बनी कॉकरोच जनता पार्टी?
अब आइए एक नजर डालते हैं कि आखिर कैसे भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के मुंह से जाने अनजाने देश के शिक्षित बेरोजगारों के लिए निकले 'कॉकरोच' शब्द को देश के बेरोजगार युवाओं की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा विरोधियों ने कैश कर डाला. देश के बेहद बेदम साबित हो चुके शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कमजोरियों का बोझ ढोते भारत के विद्यार्थियों ने तो मुख्य न्यायाधीश के श्रीमुख से बाहर निकले 'कॉकरोच' का जबरदस्त सदुपयोग करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी ही बना डाली.
यह अलग बात है कि अब यही बेचारे मगर जीवट के बेहद मजबूत कॉकरोच, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी हुकूमत के लिए बवाल ए जान बन गए हैं. कॉकरोच पार्टी के बैनर तले जो सोनम वांगचुंक कई दिन से जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर डटे थे, इस मांग को लेकर कि निकम्मे साबित हो चुके देश के उच्च शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, उन सोनम वांगचुक को गले की फांस या कहिए कि हुकूमत ने अपने गले में मरा हुआ सांप पड़ता देख, रातों रात सरकारी कारिदों यानी दिल्ली पुलिस से घसीटवा कर अस्पताल में ठुंसवा दिया.
यह अलग बात है कि जिद्दी सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल हुकूमत अस्पताल में भी नहीं तुड़वा सकी. अपितु हुकूमत के इस कांड ने आग में घी का काम कर डाला है. जो आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था, सोनम वांगचुक को धरना प्रदर्शन स्थल से जबरिया घसीट कर अस्पताल में ले जा पटकते ही, उस आंदोलन को भारतीय जनता पार्टी और मोदी विरोधियों ने तुरंत हाईजैक करके राजनीतिक कंबल उढ़ा डाला.
सपा-कांग्रेस ने आंदोलन को दिया भयंकर रूप
नतीजा सामने है कि कल तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की जिस मांग पर देश के छात्र ही डटे थे, अब वह आंदोलन संसद में बीजेपी और मोदी के धुर-विरोधी राजनीतिक दल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने कैप्चर करके, इस छात्र आंदोलन को भयंकर रूप दे डाला है. अब एक धर्मेंद्र प्रधान को बचाने की मैली चाहत में आकंठ डूबी देश की मौजूदा केंद्रीय हुकूमत के लिए अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ही किसी इंसान के माथे में मौजूद ‘कानी- आंख’ से दिखाई पड़ने लगे हैं.
बेहतर होता कि मामले पर मिट्टी डालने की नाकाम कोशिश में जुटी हुकूमत दिल्ली पुलिस के बलबूते भूख हड़ताल पर डटे सोनम वांगचुक की घसीटा-घसीटी करने की बजाए, कोई और शांतिपूर्ण रास्ता अगर अपना लेती. तो शायद आज दिल्ली की सड़कों से शुरू आंदोलन की लपटें कम से कम इस वक्त चल रहे संसद के मानसून सत्र में तो न धधक रही होतीं.




