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CJP के मंच पर राजनेताओं का जमावड़ा, फिर भी डिंपल यादव क्यों मार ले गईं बाजी, जो अखिलेश पहले समझें क्या वो राहुल बाद में जान पाए?

जंतर-मंतर पर CJP प्रदर्शन के दौरान डिंपल यादव की सक्रिय भूमिका ने उन्हें विपक्ष की चर्चित नेता बना दिया. घायल छात्रों की मदद से लेकर प्रदर्शन की अगुवाई तक डिंपल यादव हर मोर्चे पर नजर आईं. ऐसे में सवाल यह हैं कि क्या राहुल गांधी वह बात नहीं समझ पाए, जो अखिलेश यादव समझ गए और आखिर डिंपल यादव को आगे करने के क्या मायने हैं.?

CJP के मंच पर राजनेताओं का जमावड़ा, फिर भी डिंपल यादव क्यों मार ले गईं बाजी, जो अखिलेश पहले समझें क्या वो राहुल बाद में जान पाए?
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( Image Source:  X- @MissionVilayati )
समी सिद्दीकी
By: समी सिद्दीकी8 Mins Read

Updated on: 22 July 2026 2:30 PM IST

समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव हाल के दिनों में विपक्षी राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गई हैं. जंतर-मंतर पर Cockroach Janta Party (CJP) के प्रदर्शन और छात्रों के आंदोलन के दौरान उनकी सक्रिय मौजूदगी ने न सिर्फ प्रदर्शनकारियों का ध्यान खींचा, बल्कि अपनी ही पार्टी के नेताओं के बीच भी उनकी नई राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा तेज कर दी है.

सूत्रों के मुताबिक, जंतर-मंतर पर घायल छात्रों के प्रति डिंपल यादव का व्यवहार समाजवादी पार्टी के सांसदों को भी प्रभावित कर गया. प्रदर्शन स्थल पर उन्होंने घायल छात्रों को पानी पिलाया, उनकी मदद की और लगातार उनके बीच मौजूद रहीं. उनके साथ पहुंचे कई सांसदों का मानना था कि पार्टी का प्रतिनिधिमंडल अपना काम पूरा कर चुका है और अब संसद लौट जाना चाहिए, लेकिन डिंपल यादव प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च करने पर अड़ी रहीं.

ऐसा कहा जा रहा है कि सीजेपी के प्रोटेस्ट में कई नेताओं ने शिरकत की लेकिन डिंपल यादव जितनी सक्रिय रहीं, उतना कोई नहीं रहा है.

शांत नेता की छवि से आक्रामक राजनीति तक?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डिंपल यादव की पहचान लंबे समय तक एक शांत और कम बोलने वाली नेता के रूप में रही. सार्वजनिक कार्यक्रमों और संसद में भी उन्हें अक्सर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के पीछे की पंक्ति में बैठे देखा जाता था. लेकिन अब उनकी सक्रियता बताती है कि समाजवादी पार्टी अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है.

हाल के छात्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान उनकी भूमिका पहले से बिल्कुल अलग नजर आई. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान वह बैरिकेडिंग के पास खड़ी होकर प्रदर्शनकारियों के साथ दिखाई दीं. पुलिस कार्रवाई के बाद वह अस्पताल पहुंचीं और घायल छात्रों से मुलाकात कर उनका हालचाल जाना. इसी वजह से संसद से लेकर जंतर-मंतर तक उनकी सक्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है.

इस प्रोटेस्ट में कई नेता शामिल हुए, लेकिन डिंपल यादव जिस सक्रियता के साथ वहां मौजूद रहीं, उसे लोग काबिले तारीफ बता रहे हैं. एक वीडियो में लाठी खाए एक बच्चे को डिंपल यादव समझाती नजर आ रही हैं.

क्या बदली जा रही है सपा की रणनीति?

राजनीतिक हलकों में अब इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी दूसरी पंक्ति की नेतृत्व टीम को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है. मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद डिंपल यादव मैनपुरी से उनकी राजनीतिक विरासत संभाल रही हैं. अब सपा उन्हें आगे बढ़ाने का काम कर रही है. सपा ने उनकी संवेदनाओं को दर्शाते हुए पार्टी ऑफिस के बाहर एक पोस्टर लगाया है.

डिंपल यादव की सक्रियता यह संकेत भी दे रही है कि वह केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मजबूत पहचान बनाने की कोशिश कर रही हैं.

हाल के महीनों में वह संसद के भीतर और बाहर विपक्ष के लगभग हर बड़े प्रदर्शन में सक्रिय नजर आई हैं. इससे उनकी राजनीतिक भूमिका पहले की तुलना में अधिक मुखर दिखाई देने लगी है.

अखिलेश यादव यूपी पर, डिंपल दिल्ली पर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी आने वाले समय में जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा कर सकती है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पूरा फोकस किए हुए हैं. हाल के दिनों में वह लगातार लखनऊ में सक्रिय रहे हैं और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.

माना जा रहा है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव राज्य की राजनीति में और अधिक सक्रिय रहेंगे. ऐसे में यह भी चर्चा है कि दिल्ली की राजनीति और संसद में पार्टी का पक्ष रखने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे डिंपल यादव के कंधों पर अधिक दिखाई दे सकती है.

क्या अखिलेश यादव समझ गए इस प्रोटेस्ट की पावर?

ऐसा माना जा रहा है कि अखिलेश यादव इस प्रोटेस्ट की पावर को पहले ही समझ गए थे और उन्होंने डिंपल यादव को आगे कर दिया. हालांकि, कांग्रेस इस मौके को नहीं समझ पाई. पार्टी के नेता प्रोटेस्ट में तो पहुंचे लेकिन सक्रिय तौर पर मौजूद नहीं रह सके. कांग्रेस की नींद 20 जुलाई को होने वाले लाठीचार्ज के बाद जागी, इसके बाद राहुल गांधी ने पीएम मोदी के घर के सामने प्रोटेस्ट करने का फैसला किया.

क्या समाजवादी पार्टी को चाहिए एक नेशनल फेस?

समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद राष्ट्रीय स्तर पर अखिलेश यादव सबसे बड़ा चेहरा हैं. हालांकि, पार्टी लंबे समय से ऐसे दूसरे नेतृत्व की तलाश में भी रही है, जो संसद और राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी ढंग से पार्टी की बात रख सके. प्रोफेसर रामगोपाल यादव से लेकर आजम खान तक कई नेताओं ने अलग-अलग समय पर राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन मुलायम सिंह यादव जैसी व्यापक पहचान वाला दूसरा चेहरा तैयार नहीं हो सका.

इसी वजह से डिंपल यादव की बढ़ती सक्रियता को पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है. डिंपल यादव पिछले कुछ समय में संसद के भीतर भी पहले की तुलना में अधिक मुखर दिखाई दी हैं. कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के साथ सरकार के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है.

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