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10 साल में 62% बढ़े कैंपस में सुसाइड के मामले, IIT में कहां ज्यादा मामले, क्यों तनाव और दबाव में स्टूडेंट्स, जानें सर्वे

10 साल में कैंपस सुसाइड के मामले 62% बढ़े. 2.43 लाख छात्रों के सर्वे में तनाव और दबाव की तस्वीर सामने आई. जानें IIT में कहां ज्यादा मामले और वजहें क्या हैं.

10 साल में 62% बढ़े कैंपस में सुसाइड के मामले, IIT में कहां ज्यादा मामले, क्यों तनाव और दबाव में स्टूडेंट्स, जानें सर्वे
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई नेशनल टास्क फोर्स (NTF) के देशव्यापी सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं. सर्वे में पाया गया है कि हायर एजुकेशन संस्थानों में 9% छात्रों के मन में अक्सर सुसाइड के विचार सामने आते हैं. सर्वे में यह भी पता चला कि 34% छात्र अपने ही कैंपस में खुद को बाहरी समझते हैं. हाल ही में NTF ने हायर एजुकेशन संस्थानों के 2.43 लाख से ज्यादा छात्रों का सर्वे किया. सर्वे में शामिल लोगों में से लगभग 67% SC, ST और OBC कैटेगरी के थे. माना जा रहा है कि टास्क फोर्स 31 अक्टूबर तक सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप देगी.

कैंपस में अकेलापन क्यों?

राष्ट्रव्यापी सर्वे ने हायर एजुकेशन कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई चिंताएं सामने रखी हैं. NCRB के आंकड़ों के मुताबिक 2015 से 2024 के बीच छात्रों की आत्महत्या के मामलों में 62% की बढ़ोतरी हुई.

NTF के सर्वे में 34% छात्रों ने कहा कि वे अपने ही कैंपस में खुद को बाहरी महसूस करते हैं. 15% छात्रों ने पिछले छह महीनों में कई हफ्तों तक गंभीर तनाव या एंग्जायटी का सामना करने की बात कही. वहीं 9% छात्रों ने अक्सर आत्महत्या के विचार आने की जानकारी दी. सर्वे में करीब 67% छात्र SC, ST और OBC वर्गों से थे.

काउंसलिंग की कमी कितनी?

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों के बीच संस्थानों में काउंसलिंग की उपलब्धता भी एक बड़ी चिंता है. सर्वे में 32% छात्रों ने कहा कि उनके संस्थान में कोई काउंसलिंग सर्विस नहीं है. वहीं 56% छात्रों को भरोसा था कि गंभीर मामलों में संस्थान का प्रशासन निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करेगा. NTF ने बेहतर सपोर्ट सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया है.

10 साल में कितनी बढ़ोतरी?

NCRB के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में छात्रों की आत्महत्या के 8,934 मामले दर्ज हुए थे, जो 2024 में बढ़कर 14,488 हो गए. यानी दस साल में मामलों में करीब 62% की बढ़ोतरी हुई. 2015 से 2024 के बीच कुल 1,15,850 मामले दर्ज किए गए. 2020 के बाद भी छात्रों की आत्महत्या के मामले ऊंचे स्तर पर बने रहे.

किन वजहों से बढ़ता दबाव?

छात्रों पर पढ़ाई, मार्क्स और रैंक का दबाव मानसिक तनाव से जुड़ सकता है. इसके अलावा परिवार या शिक्षकों का करियर संबंधी दबाव, रैगिंग-बुलीइंग, भेदभाव, आर्थिक परेशानी और भावनात्मक सहारे की कमी भी प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं. साइबरबुलिंग, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक झिझक और समस्याओं की समय पर पहचान न होना भी स्थिति को गंभीर बना सकता है.

समाधान के लिए क्या करना जरूरी?

NTF ने छात्रों की मदद के लिए बेहतर सपोर्ट सिस्टम, फैकल्टी ट्रेनिंग और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई है. संस्थानों में संकट की स्थिति से निपटने के लिए स्पष्ट SOP, बेहतर काउंसलिंग व्यवस्था और पारदर्शी प्रशासन जरूरी हैं. फैकल्टी की कमी, भारी शेड्यूल और पढ़ाई के दबाव जैसे संस्थागत मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत है.

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