BRIC से हुआ BRICS और फिर BRICS+, क्या है ब्रिक्स का इतिहास और कैसे-कैसे कब-कब बढ़ते गए सदस्य
BRIC से BRICS और BRICS Plus तक का सफर, सदस्य देशों के विस्तार, 2001 से 2025 तक के प्रमुख पड़ाव और वैश्विक राजनीति में बढ़ती भूमिका को समझिए.
ब्रिक्स (BRICS) आज दुनिया की बदलती आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कहानी बन चुका है. कभी चार देशों से शुरू हुआ यह समूह अब कई महाद्वीपों को जोड़ने वाला व्यापक मंच बन गया है. इसकी यात्रा इसलिए दिलचस्प है क्योंकि इसके नाम में बदलाव के साथ-साथ दुनिया की शक्ति-संरचना में भी बदलाव दिखाई देता है. ब्रिक से ब्रिक्स और फिर ब्रिक्स प्लस तक का सफर बताता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब केवल वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं कर रहीं, बल्कि उसके नियमों और संस्थाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने की मांग भी कर रही हैं. नई दिल्ली की आगामी बैठक इसी बदलती कहानी का नया अध्याय है.
BRIC वैश्विक मंच कैसे?
ब्रिक्स की कहानी वर्ष 2001 से शुरू होती है, जब अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ‘ब्रिक’ शब्द का इस्तेमाल किया. उस समय यह कोई औपचारिक संगठन नहीं था, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य को समझाने वाली एक आर्थिक अवधारणा थी.
इन चार देशों की बड़ी आबादी, विशाल बाजार, प्राकृतिक संसाधन और तेज आर्थिक वृद्धि को देखते हुए अनुमान लगाया गया कि आने वाले दशकों में इनका वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्व लगातार बढ़ेगा. वर्ष 2006 में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली औपचारिक बैठक हुई और इसके बाद 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ.
इस बैठक के साथ ब्रिक एक विचार से आगे बढ़कर राजनीतिक और आर्थिक सहयोग के मंच के रूप में स्थापित हुआ. वैश्विक आर्थिक संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग ने इस समूह को और प्रासंगिक बनाया.
BRICS से BRICS: दक्षिण अफ्रीका से बदला दायरा
ब्रिक के विस्तार का पहला बड़ा चरण दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के साथ आया. वर्ष 2010 में उसे समूह में शामिल करने का निर्णय हुआ और 2011 में चीन के सान्या में हुए शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका ने पहली बार सदस्य के रूप में भाग लिया. इसके बाद समूह का नाम ब्रिक से बदलकर ब्रिक्स हो गया. दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने का महत्व केवल सदस्य संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं था.
इससे अफ्रीकी महाद्वीप को इस मंच में प्रतिनिधित्व मिला और समूह का भौगोलिक आधार एशिया, यूरोप, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका तक फैल गया. इसके बाद ब्रिक्स ने आर्थिक मुद्दों के साथ विकास, व्यापार, ऊर्जा, स्वास्थ्य, विज्ञान और तकनीक तथा वैश्विक शासन जैसे विषयों को भी अपने सहयोग के दायरे में शामिल किया.
वर्ष 2014 में ब्रिक्स देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना तथा आकस्मिक मुद्रा भंडार व्यवस्था बनाने का निर्णय लिया. इससे स्पष्ट हुआ कि ब्रिक्स केवल चर्चा का मंच नहीं रहना चाहता, बल्कि विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतों के लिए संस्थागत विकल्प भी तैयार करना चाहता है.
ब्रिक्स से BRICS+: 2024 के बाद सबसे बड़ा विस्तार
ब्रिक्स के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण विस्तार 1 जनवरी 2024 से हुआ. मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य के रूप में समूह में शामिल हुए. इसके बाद जनवरी 2025 में इंडोनेशिया को भी पूर्ण सदस्यता मिली. इस विस्तार के साथ ब्रिक्स का आर्थिक और भौगोलिक प्रभाव पहले की तुलना में काफी व्यापक हो गया. इसके समानांतर सहयोगी देशों का एक अलग दायरा भी विकसित हुआ, जिसे सामान्य तौर पर ‘ब्रिक्स प्लस’ कहा जाता है.
वर्ष 2025 में बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान को सहयोगी देशों के रूप में शामिल किया गया. यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि पूर्ण सदस्य और सहयोगी देश एक ही श्रेणी में नहीं आते.
इसलिए ब्रिक्स प्लस का अर्थ केवल सदस्य देशों की संख्या बढ़ना नहीं है, बल्कि ब्रिक्स के साथ विभिन्न देशों के सहयोग का व्यापक ढांचा तैयार होना है. विस्तार का मूल तर्क यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और अन्य विकासशील क्षेत्रों का महत्व बढ़ रहा है और ये देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं.
विस्तार का आधार: ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका
ब्रिक्स के लगातार विस्तार को केवल पश्चिमी देशों के प्रभाव के विकल्प के रूप में देखना अधूरा होगा. इसका एक महत्वपूर्ण आधार ग्लोबल साउथ की साझा आर्थिक और विकास संबंधी प्राथमिकताएं हैं. विकासशील देशों के लिए खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, विकास के लिए वित्त, जलवायु परिवर्तन से निपटने के संसाधन, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं. नए सदस्यों के आने से ब्रिक्स को एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और मध्य-पूर्व के बड़े हिस्से से जुड़ने का अवसर मिला है.
भारत के लिए भी इसका महत्व इसलिए बढ़ता है क्योंकि वह ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक न्यायसंगत प्रतिनिधित्व की मांग को आगे बढ़ाना चाहता है. इस प्रकार ब्रिक से ब्रिक्स और फिर ब्रिक्स प्लस तक की यात्रा को तीन चरणों में समझा जा सकता है. पहला, उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक समूह; दूसरा, राजनीतिक और आर्थिक सहयोग का मंच; और तीसरा, व्यापक ग्लोबल साउथ के सहयोग का मंच.
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन: विस्तार के बाद भारत की बड़ी जिम्मेदारी
12 और सितंबर, 2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता और नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन विशेष महत्व रखता है. यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब ब्रिक्स का स्वरूप पहले के पांच देशों वाले समूह से काफी बदल चुका है. भारत की चुनौती केवल अधिक देशों को एक मंच पर लाने की नहीं, बल्कि इतने विविध देशों के बीच साझा सहमति बनाने की भी होगी. भारत ने अपनी अध्यक्षता में लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास पर जोर दिया है तथा आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और नई प्रौद्योगिकियों जैसी चुनौतियों को भी सहयोग के एजेंडे में महत्व दिया है.
इसलिए नई दिल्ली सम्मेलन को ब्रिक्स के विस्तार की अगली परीक्षा के रूप में देखा जा सकता है. क्या बढ़ी हुई सदस्य संख्या को प्रभावी सामूहिक कार्रवाई में बदला जा सकेगा? यही प्रश्न ब्रिक से ब्रिक्स और ब्रिक्स प्लस की पूरी यात्रा को आर्थिक विस्तार से आगे बढ़ाकर वैश्विक शक्ति-संतुलन और वैश्विक दक्षिण की बढ़ती भूमिका से जोड़ता है.




