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Ayatollah Ali Khamenei ने जब भारत के एक गांव में बनवाया अस्पताल, गर्भवती महिला की मौत से हुए थे भावुक; जानें पूरा किस्सा

ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की भारत यात्रा से जुड़ा एक दिलचस्प और भावुक किस्सा है. कर्नाटक के एक गांव में गर्भवती महिला की अस्पताल न होने के कारण रास्ते में मौत हो गई थी, जिसकी जानकारी मिलने पर खामेनेई बेहद प्रभावित हुए. बताया जाता है कि इस घटना के बाद उन्होंने वहां अस्पताल बनवाने के लिए आर्थिक मदद देने का फैसला किया.

Ayatollah Ali Khamenei ने जब भारत के एक गांव में बनवाया अस्पताल, गर्भवती महिला की मौत से हुए थे भावुक; जानें पूरा किस्सा
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( Image Source:  X- @fr_Khamenei )

Ayatollah Ali Khamenei: कर्नाटक के एक दूरदराज गांव में एक गर्भवती महिला की मौत ऐसी घटना बन गई, जिसने बाद में वहां अस्पताल बनने की राह खोल दी. इस घटना का संबंध ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता Ali Khamenei से जुड़ा बताया जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक आयतुल्लाह अली खामेनेई ने अस्पताल खुलवाने के लिए पैसे दिए थे और वह इस घटना से काफी परेशान भी हो गए थे.

1980 के दशक की शुरुआत में भारत दौरे के दौरान अली खामेनेई कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर जिले के अलीपुरा गांव में हुई एक दुखद घटना से बेहद प्रभावित हुए थे. जब उन्हें पता चला कि पास में अस्पताल न होने के कारण एक गर्भवती महिला की बेंगलुरु ले जाते समय रास्ते में ही मौत हो गई, तो यह घटना उन्हें गहराई से झकझोर गई. इसके बाद उन्होंने उस इलाके में अस्पताल बनवाने के लिए आर्थिक मदद देने का फैसला किया, ताकि गांव के लोगों को बुनियादी इलाज के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े.

क्या है पूरा मामला?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने बताया कि यह घटना अली खामेनेई के भारत दौरे के दौरान हुई थी. इलाही ने कहा कि ईरानी नेता को भारत के प्रति गहरा लगाव था और वह अक्सर यहां की विविधता और सभ्यता की प्रशंसा किया करते थे.

इलाही ने बताया, “जब वह यहां आए और अलीपुर गए, तब एक घटना हुई. वहां एक महिला की मौत हो गई थी और लोगों ने उनसे आकर उसके लिए दुआ करने को कहा. उन्होंने लोगों से पूछा कि उसकी मौत क्यों हुई. तब लोगों ने बताया कि वह गर्भवती थी और इलाके में कोई अस्पताल नहीं था. इसी वजह से उसे बेंगलुरु ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई.”

उन्होंने आगे कहा, “यह सुनकर वह बहुत नाराज हो गए. उन्होंने कहा कि वह यहां अस्पताल बनाने के लिए पैसे देंगे और उन्होंने ऐसा किया. बाद में वहां अस्पताल बना दिया गया.” रिपोर्ट्स के मुताबिक अली खामेनेई भारत की यात्रा उस समय की थी जब Ruhollah Khomeini की सरकार ने इस्लामी क्रांति के बाद कूटनीतिक संपर्क बढ़ाने की पहल की थी. यह यात्रा उस समय हुई थी जब कुछ ही महीनों बाद उसी वर्ष अक्टूबर में खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति बने.

भारत को लेकर आयतुल्लाह अली खामेनेई का रुख कैसा था?

मुस्लिम दुनिया में संप्रदायिक विभाजन के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में इलाही ने कहा कि मुसलमानों के बीच एकता अली खामेनेई की सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा थी. इलाही ने कहा, ठदरअसल, दिवंगत आयतुल्ला अली खामेनेई का अंतिम लक्ष्य मुसलमानों के बीच एकता और समाज में जागरूकता बढ़ाना था. मैंने उनसे कई बार मुलाकात की है और वह अक्सर भारत में सह-अस्तित्व की बात करते थे."

उन्होंने बताया कि खामेनेई अक्सर भारत का उदाहरण देते थे, जहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ रहते हैं. इलाही के अनुसार, अली खामेनेई भारत की बहुत प्रशंसा करते थे. उन्होंने कहा, “वह भारत और भारतीयों की अक्सर तारीफ करते थे. वह कहते थे कि देखिए, यहां कई धर्म और समाज के अलग-अलग वर्ग हैं, फिर भी वे साथ रहते हैं."

क्या भारत पर थी खामेनेई की पहली किताब?

इलाही के अनुसार, अली खामेनेई की भारत में दिलचस्पी उनके जीवन के शुरुआती समय से ही थी. उन्होंने बताया, “उन्होंने जो पहली किताब लिखी थी, जब उनकी उम्र करीब 22 या 23 साल थी, वह भारत पर ही थी. यह फारसी भाषा में दो भागों में लिखी गई थी और इसमें भारत की आजादी के बारे में चर्चा की गई थी. बाद में उन्होंने इसे अंग्रेजी में अनुवाद करने की भी कोशिश की.”

इलाही ने खामेनेई और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री Manmohan Singh की एक मुलाकात का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि यह बैठक तय समय से काफी ज्यादा लंबी चली. उन्होंने कहा, “एक बार भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री उनसे मिलने आए थे. यह मुलाकात 15 से 20 मिनट की तय थी, लेकिन डेढ़ घंटे से ज्यादा चली. इस दौरान उन्होंने अपने जीवन, भारत और भारत की सभ्यता, संस्कृति और दर्शन के बारे में बात की.” इलाही ने कहा कि उस समय किसी ने मजाक में कहा था कि वह भारतीय इतिहास के किसी प्रोफेसर से भी ज्यादा जानकारी रखते हैं.

ईरान के सबसे प्रभावशाली नेता बनने से कई दशक पहले अली खामेनेई एक युवा धर्मगुरु के रूप में भारत की यात्रा कर चुके थे. 1980 के दशक में, जब उनकी उम्र करीब 41 साल थी, उन्होंने इस्लामी क्रांति के शुरुआती सालों में कर्नाटक और कश्मीर का दौरा किया था.

ईरान इजरायल युद्धवर्ल्‍ड न्‍यूज
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