Karnataka Political Crisis: सिद्धारमैया–डीके शिवकुमार की 'ब्रेकफास्ट मीटिंग' से क्या बदलेगा कांग्रेस का समीकरण?
कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के बीच जारी सत्ता संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. कांग्रेस हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद दोनों नेताओं की ब्रेकफास्ट मीटिंग ने 2023 के कथित पावर-शेयरिंग समझौते को फिर चर्चा में ला दिया है. शिवकुमार दिल्ली जाकर हाईकमान से मुलाकात करेंगे, जबकि सिद्धारमैया पूरा कार्यकाल चाहने पर अडिग हैं. क्या कांग्रेस नेतृत्व संकट खत्म कर पाएगा या कर्नाटक में अस्थिरता बढ़ेगी?
कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता संतुलन को लेकर महीनों से जारी खिंचतान एक नए मोड़ पर पहुंच गई है. कांग्रेस हाईकमान के दखल के बाद शनिवार सुबह दोनों नेताओं की एक विशेष "ब्रेकफास्ट मीटिंग" हुई, जिसे पार्टी के भीतर बढ़ते तनाव को शांत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. चुनावी वादों, सत्ता-साझेदारी की चर्चाओं और समर्थकों के दबाव के बीच यह मुलाकात राजनीतिक हलकों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
दिल्ली बुलावे और संभावित फार्मूले के बीच बैठी यह मुलाकात 2023 में बने कथित पावर-शेयरिंग समझौते को लेकर फिर से उठ रहे सवालों के बीच हुई. पार्टी चाहती है कि 2028 विधानसभा चुनावों से पहले स्थिरता बनी रहे, लेकिन सिद्धारमैया और शिवकुमार के समर्थकों की बढ़ती आवाजें हाईकमान पर दबाव बना रही हैं. यह बैठक इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक "टेस्ट केस" साबित हो सकती है.
ब्रेकफास्ट डिप्लोमैसी
सिद्धारमैया के आवास पर आयोजित इस नाश्ते में दोनों नेता एक साथ बैठे दिखाई दिए. उपमा, इडली और सांभर की प्लेटों के साथ मुस्कुराती तस्वीरें सामने आईं. इस मुलाकात की तस्वीरों को पार्टी रणनीतिक संकेत के रूप में देख रही है कि मतभेद के बावजूद दोनों के बीच संवाद कायम है और तनाव चरम पर नहीं पहुंचा है.
दिल्ली दरबार की कड़ी नजर
नाश्ते के तुरंत बाद डी.के. शिवकुमार दिल्ली रवाना होने वाले हैं, जहां वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मुलाकात कर सकते हैं. माना जा रहा है कि हाईकमान दोनों नेताओं के सामने एक साफ रोडमैप रखना चाहता है या तो सत्ता-साझेदारी फॉर्मूले पर मुहर लगेगी, या सिद्धारमैया को पूरा कार्यकाल दिया जाएगा और शिवकुमार के लिए नई भूमिका तय की जाएगी.
2023 का ‘अनकहा वादा’, क्या यही विवाद की जड़?
कर्नाटक जीत के बाद पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने दावा किया था कि सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई वर्ष का अनौपचारिक पावर-शेयरिंग फॉर्मूला तय हुआ था. हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा कभी नहीं हुई. शिवकुमार के हालिया बयानों, रहस्यमयी पोस्ट और समर्थकों की मांगें इस ‘अनकहे वादे’ को फिर राजनीतिक केंद्र में ला चुकी हैं.
सिद्धारमैया का साफ संदेश: पूरा कार्यकाल मेरा
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लगातार यह दोहरा रहे हैं कि वे हाईकमान के आदेशों का पालन करेंगे, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दे रहे हैं कि वे पूरा 5 साल का कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं. उनके समर्थक भी लगातार दावा कर रहे हैं कि राज्य की स्थिरता के लिए नेतृत्व में बदलाव जरूरी नहीं.
शिवकुमार कैंप का दबाव, "वादे निभाओ" की मांग
डी.के. शिवकुमार के समर्थक यह कह रहे हैं कि उन्हें 2023 में दिया गया ‘शब्द’ अब पूरा होना चाहिए. उनके गठबंधन बनाने की क्षमता, संगठन को मजबूत करने की भूमिका और वित्तीय प्रबंधन की योग्यता को तर्क के रूप में पेश किया जा रहा है. कई विधायकों का मानना है कि 2028 चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन ‘रणनीतिक रूप से फायदेमंद’ हो सकता है.
कर्नाटक कांग्रेस में नए चेहरे की चाहत?
भले ही नेतृत्व की रेस में शिवकुमार आगे दिखाई देते हैं, लेकिन गृह मंत्री जी. परमेश्वर जैसे वरिष्ठ नेता भी खुले तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं. वहीं पार्टी के अंदर कैबिनेट विस्तार और विभागीय फेरबदल की चर्चा भी जोर पकड़ रही है, जिससे तनाव और बढ़ सकता है.
हाईकमान की चुनौती: समन्वय या टकराव?
वरिष्ठ कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने हाल ही में हाईकमान को चेतावनी दी कि यह आंतरिक खींचतान 2028 के चुनावी लक्ष्य को नुकसान पहुँचा सकती है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक में स्थिरता लाने के लिए किस फॉर्मूले पर मुहर लगाता है, "सत्ता-साझेदारी" या "यथास्थिति".





