Begin typing your search...

2002 में मोदी चुनाव जल्दी चाहते थे, लिंगदोह ने रोक दी राह! सोनिया-चर्च विवाद और वाजपेयी-SC के दखल की पूरी कहानी

2002 में गुजरात चुनाव जल्दी कराने की मांग, जेएम लिंगदोह का इनकार, सोनिया गांधी-चर्च विवाद, वाजपेयी सरकार और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका की कहानी पढ़ें. फैसलों का क्रम भी अब जानें.

2002 में मोदी चुनाव जल्दी चाहते थे, लिंगदोह ने रोक दी राह! सोनिया-चर्च विवाद और वाजपेयी-SC के दखल की पूरी कहानी
X

साल 2002 में गुजराज दंगे के बाद वहां का विधानसभा चुनाव देश के चुनावी इतिहास में सिर्फ सत्ता बदलने या बचाने की लड़ाई नहीं कह सकते. इसने चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता, सरकार और आयोग के अधिकारों तथा निष्पक्ष चुनाव की शर्तों पर बड़ी बहस छेड़ दी थी. उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते थे कि विधानसभा भंग होने के बाद जल्द चुनाव कराए जाएं, लेकिन तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) जेएम लिंगदोह ने उनकी मांग मानने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि गोधरा कांड के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा के कारण राज्य में हालात सामान्य नहीं थे. हजारों लोग विस्थापित थे और मतदाता सूचियों में भी गड़बड़ियां थीं. ऐसे माहौल में चुनाव कराना निष्पक्ष मतदान के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता था.

तत्कालीन सीईसी जेएम लिंगदोह के इस फैसले ने गुजरात की राजनीति में हलचल मचा दी. मोदी ने सार्वजनिक मंच से उनके ईसाई धर्म और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से कथित नजदीकी का जिक्र करते हुए टिप्पणी की. मामला इतना बढ़ा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी हस्तक्षेप करना पड़ा.

इसके बाद केंद्र सरकार ने संवैधानिक सवालों पर राष्ट्रपति के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी. अदालत में भी यह बहस हुई कि विधानसभा भंग होने के बाद चुनाव कराने की समय-सीमा क्या होगी और चुनाव की तारीख तय करने का अधिकार किसके पास है. आखिरकार दिसंबर 2002 में गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए. लेकिन इस पूरे विवाद के केंद्र में रहे जेएम लिंगदोह कौन थे और उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग ने क्या-क्या बदलाव किए?

कौन थे जेएम लिंगदोह?

जेम्स माइकल लिंगदोह यानी जेएम लिंगदोह का जन्म 8 फरवरी 1939 को शिलांग में हुआ था. वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी थे. प्रशासनिक सेवा में लंबे समय तक काम करने के बाद उन्हें 1 मार्च 1997 को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया. इसके बाद 14 जून 2001 को उन्होंने भारत के 12वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में जिम्मेदारी संभाली. वह पूर्वोत्तर भारत से इस पद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति थे.

लिंगदोह का कार्यकाल 7 फरवरी 2004 तक रहा. उन्हें शुरुआत में करीब तीन साल तक पद पर रहने की बात कही गई थी, लेकिन 65 वर्ष की आयु पूरी होने के कारण उनका कार्यकाल इससे पहले समाप्त हो गया. उनके कार्यकाल में गुजरात और जम्मू-कश्मीर के चुनाव सबसे ज्यादा चर्चा में रहे. 2003 में उन्हें सरकारी सेवा के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी दिया गया.

गुजरात दंगों के बाद क्यों उठी जल्द चुनाव कराने की मांग?

दरअसल, गुजरात में फरवरी 2002 में गोधरा स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगने से 59 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद राज्य के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई. हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, संपत्ति को नुकसान पहुंचा और हजारों लोग अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए. राज्य में कानून-व्यवस्था और पुनर्वास को लेकर सवाल उठ रहे थे.

उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. राज्य विधानसभा का सामान्य कार्यकाल मार्च 2003 तक था, लेकिन 19 जुलाई 2002 को मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल ने विधानसभा भंग कर दी. इसके पीछे समय से पहले चुनाव कराने का रास्ता खोलना भी था. बीजेपी सरकार जल्द चुनाव चाहती थी, जबकि विपक्ष और दूसरे पक्षों की ओर से राज्य के हालात को देखते हुए जल्दबाजी पर सवाल उठाए जा रहे थे.

विधानसभा भंग होने के बाद चुनाव आयोग के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं. पहली, क्या राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान का माहौल तैयार था? दूसरी, हिंसा के कारण घर छोड़ चुके लोगों के नाम मतदाता सूची में किस स्थिति में थे? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए लिंगदोह के नेतृत्व में चुनाव आयोग की टीम ने गुजरात का दौरा किया.

लिंगदोह ने तत्काल चुनाव कराने से क्यों किया इनकार?

16 अगस्त 2002 को चुनाव आयोग ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि वह उस समय गुजरात में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की स्थिति में नहीं है. आयोग ने इसके पीछे कई वजहें गिनाईं.

पहली वजह थी हिंसा के बाद बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन. कई मतदाता अपने पंजीकृत पते से दूर राहत शिविरों या दूसरी जगहों पर रह रहे थे. ऐसे में पुरानी मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने से बड़ी संख्या में लोग वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकते थे.

दूसरी वजह कानून-व्यवस्था की स्थिति थी. आयोग का आकलन था कि राज्य में सांप्रदायिक तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. खासकर अल्पसंख्यक समुदाय और दंगा पीड़ितों के मन में डर बना हुआ था. आयोग को आशंका थी कि कई लोग अपनी जान-माल के खतरे के कारण मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच पाएंगे.

तीसरी वजह मतदाता सूचियों की खामियां थीं. आयोग ने पाया कि दंगों और विस्थापन के कारण मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर संशोधन की जरूरत है. इसलिए उसने प्रभावित 20 जिलों में विशेष पुनरीक्षण कराने, घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करने और दावों-आपत्तियों के लिए समय देने का निर्देश दिया. आयोग ने मतदाता सूची की प्रक्रिया पूरी करने के लिए 15 अक्टूबर की समय-सीमा तय की थी.

लिंगदोह का तर्क साफ था कि चुनाव सिर्फ तय समय में करा देना पर्याप्त नहीं है. हर पात्र मतदाता को बिना डर और दबाव के वोट डालने का अवसर मिलना चाहिए. आयोग ने संकेत दिया कि परिस्थितियां अनुकूल होने पर नवंबर-दिसंबर में चुनाव का कार्यक्रम बनाया जा सकता है.

मोदी ने सोनिया गांधी और चर्च का नाम क्यों लिया?

चुनाव आयोग के फैसले से गुजरात सरकार और बीजेपी में नाराजगी थी. नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2002 में वडोदरा के पास एक जनसभा में लिंगदोह पर निजी टिप्पणी की. उन्होंने लिंगदोह के पूरे नाम जेम्स माइकल लिंगदोह का जिक्र करते हुए उनके ईसाई होने और इटली से संबंध होने का संकेत दिया. उन्होंने एक कथित पत्रकार के सवाल का हवाला देते हुए कहा कि क्या लिंगदोह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चर्च में मिलते हैं.

इस टिप्पणी के जरिए मोदी ने चुनाव आयोग के फैसले को लिंगदोह की धार्मिक पहचान और सोनिया गांधी से कथित नजदीकी से जोड़ने की कोशिश की थी. हालांकि, चुनाव आयोग के फैसले में सोनिया गांधी की कोई भूमिका होने का प्रमाण नहीं था. आयोग ने अपना निर्णय राज्य के हालात, मतदाता सूची और निष्पक्ष चुनाव की जरूरत के आधार पर लिया था.

मोदी की टिप्पणी पर लिंगदोह ने भी चुप्पी नहीं साधी. 23 अगस्त को उन्होंने इसे बेहद अनुचित बताते हुए कहा कि ऐसी बातें उन लोगों की गपशप जैसी हैं, जिन्होंने नास्तिकता के बारे में नहीं सुना. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका फैसला किसी धर्म या राजनीतिक संबंध के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी परिस्थितियों के आधार पर था.

वाजपेयी को क्यों करना पड़ा हस्तक्षेप?

मोदी और लिंगदोह के बीच सार्वजनिक बयानबाजी के बाद विवाद बीजेपी के भीतर और केंद्र सरकार तक पहुंच गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 24 अगस्त 2002 को इस मामले पर सार्वजनिक बयान जारी किया. उन्होंने मोदी की भाषा और चुनाव आयोग पर की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों पर आपत्ति जताई.

वाजपेयी ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके लिए संवैधानिक तरीके मौजूद हैं. किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ अनुचित भाषा या व्यक्तिगत संकेतों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि सभी संस्थाएं अपनी संवैधानिक सीमाओं में रहकर एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र का सम्मान करें.

वाजपेयी की टिप्पणी को मोदी के लिए सार्वजनिक नसीहत के तौर पर देखा गया. इसके अगले दिन मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देश के बाद विवाद समाप्त हो गया है. हालांकि, गुजरात में जल्द चुनाव कराने की उनकी मांग अपनी जगह बनी रही.

सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा गुजरात चुनाव का मामला?

गुजरात चुनाव विवाद केवल मोदी और लिंगदोह के बीच बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा. इसके साथ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल भी जुड़ गया. विधानसभा भंग होने के बाद चुनाव कब तक कराए जाने चाहिए और क्या चुनाव आयोग हालात अनुकूल न होने पर चुनाव टाल सकता है?

इस विवाद में संविधान के दो अनुच्छेद अहम हो गए. अनुच्छेद 174(1) के मुताबिक विधानसभा के एक सत्र की आखिरी बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए. वहीं अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है.

गुजरात विधानसभा की आखिरी बैठक 3 अप्रैल 2002 को हुई थी. ऐसे में छह महीने की अवधि 3 अक्टूबर को पूरी हो रही थी. चुनाव आयोग का आकलन था कि उस तारीख तक निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं होगा. इस पर संवैधानिक स्थिति को लेकर सवाल उठा.

19 अगस्त 2002 को तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से तीन सवालों पर राय मांगी. इनमें मुख्य सवाल था कि क्या विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम तय करने में अनुच्छेद 174 की समय-सीमा चुनाव आयोग के अनुच्छेद 324 के अधिकार पर लागू होती है? क्या आयोग असाधारण परिस्थितियों में चुनाव का कार्यक्रम आगे बढ़ा सकता है? और क्या आयोग को चुनाव कराने के लिए केंद्र तथा राज्य के सभी जरूरी संसाधन जुटाने चाहिए?

28 अक्टूबर 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी. अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 174(1) में छह महीने का प्रावधान एक सत्र की आखिरी बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच के अंतर से जुड़ा है. यह अनुच्छेद विधानसभा समय से पहले भंग होने की स्थिति में नई विधानसभा के चुनाव कराने की छह महीने की कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं करता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव कार्यक्रम तय करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है.

फिर दिसंबर में कैसे हुए गुजरात विधानसभा चुनाव?

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में विशेष संशोधन और दूसरी तैयारियां पूरी करने के बाद नवंबर 2002 में चुनाव कार्यक्रम घोषित किया. गुजरात की 182 विधानसभा सीटों के लिए 12 दिसंबर 2002 को मतदान हुआ और 15 दिसंबर को मतगणना की गई.

इस तरह जुलाई में विधानसभा भंग होने, अगस्त में चुनाव आयोग के फैसले, राष्ट्रपति के संदर्भ और अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट की राय के बाद दिसंबर में चुनाव संपन्न हुए. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने चुनाव में जीत दर्ज की और राज्य में फिर सरकार बनाई.

लिंगदोह के कार्यकाल में और क्या-क्या हुआ?

गुजरात विवाद के अलावा जेएम लिंगदोह के कार्यकाल में चुनाव आयोग ने कई महत्वपूर्ण काम किए. उनके समय में चुनावी व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने, मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने और तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाने पर जोर दिया गया.

1. जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के बीच चुनाव: सितंबर-अक्टूबर 2002 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव कराना उनके कार्यकाल की बड़ी चुनौती थी. आतंकवाद, चुनाव बहिष्कार की अपील और उम्मीदवारों की सुरक्षा जैसे सवालों के बीच आयोग ने चार चरणों में मतदान कराया. चुनाव प्रक्रिया में सुरक्षा और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए व्यापक इंतजाम किए गए. इस चुनाव को लेकर लिंगदोह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली.

2. मतदाता सूची में सुधार: चुनाव आयोग ने 2002-03 के दौरान 27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मतदाता सूचियों का व्यापक पुनरीक्षण किया. इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना था. गुजरात में भी विशेष पुनरीक्षण कराया गया ताकि दंगों के बाद विस्थापित मतदाताओं के नाम और पते सही किए जा सकें.

3. ईवीएम के इस्तेमाल का विस्तार: लिंगदोह के कार्यकाल में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को आगे बढ़ाया गया. फरवरी 2003 में हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा के विधानसभा चुनावों में सभी मतदान केंद्रों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ. यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ईवीएम की शुरुआत लिंगदोह ने नहीं की थी. इसका इस्तेमाल पहले से हो रहा था, लेकिन उनके कार्यकाल में इसके विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण काम हुआ. 2004 के लोकसभा चुनाव में देशभर में ईवीएम से मतदान कराने की तैयारी भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थी.

4. मतदाता पहचान पत्र पर जोर: लिंगदोह ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के समय ही देश के हर मतदाता को पहचान पत्र उपलब्ध कराने और फर्जी मतदान की आशंका कम करने को प्राथमिकता बताया था. उनके कार्यकाल में मतदाता पहचान पत्र और मतदाता सूची को अधिक व्यवस्थित बनाने की कोशिशें जारी रहीं.

स्टेट मिरर स्पेशलनरेंद्र मोदी
अगला लेख