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लालू ने ‘पागल सांड’ कहा, जयललिता ने अहंकारी; मुलायम का हेलीकॉप्टर लौटाया; नहीं रहा ऐसा कोई चुनाव आयुक्त, क्यों आज भी याद किए जाते हैं टीएन शेषन?

लालू ने ‘पागल सांड़’ कहा, जयललिता ने अहंकारी बताया और मुलायम का हेलीकॉप्टर लौटाने का दावा चर्चा में रहा. जानिए, क्यों टीएन शेषन ने चुनावी इतिहास में बनाई अलग पहचान और मिला रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड.

लालू ने ‘पागल सांड’ कहा, जयललिता ने अहंकारी; मुलायम का हेलीकॉप्टर लौटाया; नहीं रहा ऐसा कोई चुनाव आयुक्त, क्यों आज भी याद किए जाते हैं टीएन शेषन?
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भारत की राजनीति में नेताओं की आलोचना और बयानबाजी आम है, लेकिन टीएन शेषन ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त रहे, जिनकी कार्यशैली ने कई बड़े नेताओं को नाराज कर दिया. इसकी वजह भी कम नहीं है. इन्हीं में एक वजह है. वो कहा करते थे, "मैं हर सुबह नाश्ते में नेता को खाता हूं". बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें ‘पागल सांड़’ कहा, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने उनकी कार्यशैली को 'अहंकारी' बताया था. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के सरकारी हेलीकॉप्टर को बदायूं में उतरने की अनुमति नहीं मिलने का मामला भी खुब चर्चा में आया. इसके बावजूद शेषन की पहचान सिर्फ विवादों तक सीमित नहीं रही. उन्होंने चुनाव आयोग की शक्तियों और चुनावी नियमों के पालन को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया.

यही वजह है कि टीएन शेषन को 1996 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला था. उन्हें यह सम्मान देश की चुनावी प्रक्रिया में अनुशासन, निष्पक्षता और ईमानदारी लाने के प्रयासों के लिए सरकारी सेवा के लिए दिया गया था.

टीएन शेषन कौन थे?

टीएन शेषन का पूरा नाम तिरुनेल्लई नारायण अय्यर शेषन था. वह 1955 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे. उन्होंने तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार में कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं. वह परमाणु ऊर्जा आयोग के सचिव, अंतरिक्ष विभाग में वरिष्ठ अधिकारी और रक्षा मंत्रालय सहित विभिन्न विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे. 1989 में वह भारत के कैबिनेट सचिव बने.

12 दिसंबर 1990 को शेषन ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला. उनका कार्यकाल 11 दिसंबर 1996 तक रहा. इस दौरान उन्होंने चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए चुनावी नियमों को सख्ती से लागू कराने पर जोर दिया. उनकी कार्यशैली ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया.

शेषन किस काम के लिए जाने जाते हैं?

पूर्व सीईसी टीएन शेषन की सबसे बड़ी पहचान चुनावी नियमों के सख्त पालन और आदर्श आचार संहिता को प्रभावी ढंग से लागू कराने के प्रयासों से बनी. उनके कार्यकाल से पहले भी आदर्श आचार संहिता मौजूद थी, लेकिन उन्होंने इसके उल्लंघन पर कार्रवाई करने और राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों को नियमों का पालन कराने पर खासतौर से जोर दिया.

दरअसल, उस दौर में बूथ कब्जाने, फर्जी मतदान, मतदाताओं को पैसे और शराब बांटने, चुनाव खर्च की सीमा का उल्लंघन करने तथा सरकारी मशीनरी का राजनीतिक इस्तेमाल करने जैसी समस्याएं चुनावी व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती थीं. लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त इस कोढ़ को दूर करने क लिए शेषन ने चुनाव अधिकारियों की जवाबदेही और चुनाव के दौरान प्रशासन की भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने चुनावी प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष बनाने के लिए चुनाव आयोग के अधिकारों का इस्तेमाल किया.

उनके कार्यकाल में मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया. इसका उद्देश्य मतदाताओं की पहचान को अधिक विश्वसनीय बनाना और फर्जी मतदान की आशंका कम करना था. हालांकि, मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत का पूरा श्रेय अकेले शेषन को देना सही नहीं होगा. उनकी भूमिका इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण रही.

नेताओं की नजर में किरकिरी क्यों बने?

टीएनल शेषन का मानना था कि चुनाव आयोग को निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल करना जरूरी है. सब चलता है और वही होता आया है, अगर यही आगे भी जारी रहा तो ऐसे लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं. इसी वजह से चुनाव प्रचार, सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल, चुनावी खर्च, मतदान की सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका जैसे मुद्दों पर उनका राजनीतिक दलों से टकराव हुआ.

उनके समर्थकों ने इसे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को मजबूत करने वाला कदम माना. दूसरी ओर, कुछ नेताओं और राजनीतिक दलों ने उनके काम करने के तरीके तथा अधिकारों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए. शेषन की कार्यशैली का सबसे चर्चित पहलू यह था कि वह बड़े राजनीतिक नेताओं के लिए भी नियमों में विशेष छूट देने के पक्ष में नहीं दिखते थे.

लालू यादव और शेषन में टकराव क्यों हुआ?

टीएन शेषन और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बीच टकराव 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान खास तौर पर सामने आया. उस समय राज्य में चुनावी हिंसा, बूथ कब्जाने और मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने की शिकायतें गंभीर मुद्दे थीं. शेषन ने स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान के लिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने तथा चुनावी प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखने पर जोर दिया.

चुनाव कार्यक्रम, सुरक्षा बलों की तैनाती और मतदान की परिस्थितियों को लेकर चुनाव आयोग तथा बिहार सरकार के बीच मतभेद बढ़े. शेषन का जोर इस बात पर था कि संवेदनशील इलाकों में निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित किया जाए. वहीं लालू यादव ने आयोग की सख्ती और चुनावी प्रक्रिया में उसके हस्तक्षेप पर नाराजगी जताई. इस तरह प्रशासनिक मतभेद सार्वजनिक बयानबाजी तक पहुंच गए.

लालू यादव ने शेषन को क्या कहा था?

लालू यादव की शेषन पर की गई टिप्पणियां उस दौर में काफी चर्चित हुई थीं. एक बार उन्होंने भोजपुरी में कहा था, “ई शेषनवा कौन है, बीच में काहे टपकता रहता है?” उनकी एक टिप्पणी में लालू ने शेषन की तुलना ‘पगला सांड’ से की थी और उन्हें रस्सी से बांधकर खटाल में रखने जैसी बात कही थी.

लालू यादव के इन बयानों को बिहार चुनाव के दौरान दोनों के बीच बढ़े तनाव के संदर्भ में आज भी देखा जाता है. लालू यादव चुनाव आयोग की सख्ती और चुनाव कार्यक्रम को लेकर नाराज थे, जबकि शेषन निष्पक्ष मतदान के लिए सुरक्षा और नियमों के पालन को जरूरी मानते थे. इस विवाद ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार के अधिकारों के बीच टकराव को सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया.

जयललिता ने शेषन को अहंकारी क्यों कहा?

तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता के साथ भी शेषन का विवाद हुआ. नवंबर 1994 में शेषन के चेन्नई दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, यातायात और राज्य के अधिकारियों के व्यवहार को लेकर विवाद सामने आया. शेषन ने राज्य सरकार की ओर से सुरक्षा व्यवस्था में कमी की शिकायत की, जबकि जयललिता ने उनके व्यवहार और अधिकारियों के साथ उनके रवैये पर आपत्ति जताई.

जयललिता ने शेषन की कार्यशैली को 'अहंकारी' बताया. चुनाव आयोग में उनकी सक्रियता को लेकर जरूरत से ज्यादा सक्रियता जैसी आलोचना भी सामने आई. शेषन के समर्थकों का मानना था कि वह नियमों का पालन कराने के लिए सख्त कदम उठा रहे थे, जबकि उनके आलोचकों को लगता था कि वह अपने अधिकारों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. इस विवाद के बाद शेषन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी हुए.

मुलायम का हेलीकॉप्टर मुरादाबाद क्यों भेजा?

इसी तरह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के सरकारी हेलीकॉप्टर से जुड़ा एक प्रसंग भी शेषन की सख्त कार्यशैली के उदाहरण के रूप में चर्चित रहा. चुनावी नियमों के पालन के दौरान मुलायम सिंह यादव के हेलीकॉप्टर को बदायूं में उतरने की अनुमति नहीं मिली और उसे मुरादाबाद भेज दिया गया.

यह ऐतिहासिक घटना वर्ष 1991 में (10वें लोकसभा चुनाव के दौरान) हुई थी.

इस घटना को अक्सर इस बात के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है कि शेषन के दौर में बड़े राजनीतिक नेताओं को भी चुनावी नियमों से ऊपर मानने की छूट नहीं थी.

केंद्र सरकार से शेषन का विवाद क्यों हुआ?

शेषन के कार्यकाल का सबसे बड़ा संस्थागत विवाद 1993 में सामने आया. केंद्र सरकार ने अक्टूबर 1993 में चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने की व्यवस्था की और एमएस गिल तथा जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया. इससे चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ अन्य चुनाव आयुक्तों की भी भूमिका स्थापित हुई.

शेषन ने इस व्यवस्था का विरोध किया. उनका मानना था कि इससे मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियां प्रभावित हो सकती हैं. उन्होंने केंद्र सरकार के इस कदम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. यह विवाद केवल पद और अधिकारों तक सीमित नहीं था, बल्कि इस सवाल से जुड़ा था कि चुनाव आयोग की संरचना कैसी होनी चाहिए और उसके भीतर निर्णय लेने की शक्ति किस तरह इस्तेमाल की जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने शेषन के मामले में क्या कहा?

14 जुलाई 1995 को सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में फैसला सुनाया. अदालत ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को संवैधानिक रूप से वैध माना. उसने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को केवल एक सदस्य तक सीमित नहीं करता. राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी कर सकते हैं.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले सभी निर्णय लेने वाले अधिकारी नहीं होते. आयोग सामूहिक रूप से काम करता है और मतभेद होने पर बहुमत का फैसला प्रभावी होता है. इस फैसले ने चुनाव आयोग की संरचना और उसके सदस्यों के बीच निर्णय लेने की व्यवस्था को स्पष्ट किया.

शेषन इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने समीक्षा की मांग भी की, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली. इस मामले का महत्व इसलिए भी था कि इसने मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों के साथ-साथ अन्य चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक भूमिका को भी स्पष्ट किया.

शेषन को मैग्सेसे पुरस्कार क्यों मिला?

1996 में टीएन शेषन को सरकारी सेवा के क्षेत्र में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया. पुरस्कार फाउंडेशन ने चुनावी प्रक्रिया में अनुशासन, निष्पक्षता और ईमानदारी लाने की दिशा में उनके प्रयासों को मान्यता दी. चुनावी नियमों का पालन कराने और चुनाव आयोग की भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए उनके कदमों को इस सम्मान का महत्वपूर्ण आधार माना गया.

शेषन की पहचान सिर्फ नेताओं से टकराव की वजह से नहीं बनी. उन्होंने चुनाव खर्च की निगरानी, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर नियंत्रण, मतदान की निष्पक्षता और मतदाता पहचान जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया. उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर देशभर में चर्चा बढ़ी.

मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल 11 दिसंबर 1996 को समाप्त हुआ. 1997 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में के. आर. नारायणन के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके. 10 नवंबर 2019 को चेन्नई में उनका निधन हो गया.

शेषन को आज भी क्यों याद किया जाता है?

टीएन शेषन की विरासत को केवल नेताओं के साथ हुए विवादों से नहीं समझा जा सकता. लालू यादव की तीखी टिप्पणियां, जयललिता के साथ टकराव और मुलायम सिंह यादव के हेलीकॉप्टर से जुड़ा प्रसंग उनकी सख्त कार्यशैली की सार्वजनिक छवि का हिस्सा बने. लेकिन उनका बड़ा योगदान चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों का प्रभावी इस्तेमाल करने और चुनावी नियमों के पालन को गंभीरता से उठाने में था.

उनके कार्यकाल ने यह सवाल प्रमुखता से उठाया कि चुनाव केवल मतदान कराने और मतगणना तक सीमित प्रक्रिया नहीं है. निष्पक्ष प्रचार, सरकारी संसाधनों का उचित इस्तेमाल, चुनावी खर्च पर निगरानी, मतदाता की स्वतंत्रता और नियमों का पालन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के जरूरी हिस्से हैं.

स्टेट मिरर स्पेशल
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