कोई ले जाता है घर, तो कभी लाखों में बिकते हैं सिर्फ तौलिए, फिल्मों में यूज होने वाले मंहगे आउटफिट्स का क्या होता है?
फिल्मों में इस्तेमाल होने वाले महंगे कपड़े और एक्सेसरीज़ का दोबारा फिल्मों में इस्तेमाल होता है, तो कुछ कलाकार इन्हें याद के तौर पर अपने साथ घर ले जाते हैं.
शूटिंग के बाद फिल्म कॉस्ट्यूम्स का क्या होता है
फिल्मों में हम अक्सर सितारों के शानदार कपड़े, महंगे गहने और स्टाइलिश लुक देखकर प्रभावित हो जाते हैं. कभी करीना कपूर खान के ग्लैमरस आउटफिट्स, तो कभी ऐश्वर्या राय बच्चन की ट्रेडिशनल साड़ियां दर्शकों के बीच ट्रेंड बन जाती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शूटिंग खत्म होने के बाद इन महंगे कपड़ों और ज्वेलरी का क्या होता है?
असल में, फिल्मों के कॉस्ट्यूम और एक्सेसरीज़ सिर्फ एक बार के इस्तेमाल के लिए नहीं होते. इनके पीछे एक पूरा सिस्टम होता है, जिसमें स्टोरेज, रीयूज, ऑक्शन और कभी-कभी पर्सनल कलेक्शन तक शामिल होता है. आइए जानते हैं कि फिल्मों में इस्तेमाल होने वाले कपड़े और ज्वेलरी आखिरकार कहां जाते हैं.
इन तरीकों से होता है दोबारा इस्तेमाल
फिल्म इंडस्ट्री में कॉस्ट्यूम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, इसलिए उन्हें एक बार इस्तेमाल करके फेंक नहीं दिया जाता. अक्सर शूटिंग खत्म होने के बाद इन कपड़ों को सुरक्षित तरीके से स्टोर किया जाता है और फिर दूसरी फिल्मों में नए तरीके से इस्तेमाल किया जाता है.
- पुराने कपड़ों को मिक्स-मैच करके नया लुक दिया जाता है.
- बैकग्राउंड डांसर्स या जूनियर आर्टिस्ट्स को पहनाया जाता है.
- डिजाइन में थोड़ा बदलाव करके उन्हें नया बना दिया जाता है.
- इस तरह एक ही ड्रेस अलग-अलग फिल्मों में नजर आ सकती है, लेकिन दर्शकों को इसका अंदाजा नहीं होता.
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कुछ कपड़े घर ले जाते हैं कलाकार
कई बार कलाकार अपने किरदार से इतना जुड़ जाते हैं कि वे उससे जुड़ी चीजों को अपने पास रखना चाहते हैं. Deepika Padukone ने एक फिल्म में पहने अपने चश्मे को याद के तौर पर अपने पास रखना चाहा. Rishi Kapoor अपने फिल्मों में पहने स्वेटर्स को कलेक्ट करते थे. हालांकि, यह पूरी तरह प्रोडक्शन हाउस पर डिपेंड करता है कि वे मंजूरी दें या नहीं. कुछ मामलों में कलाकार उन कपड़ों को खरीद भी लेते हैं.
कपड़े वापस भी ले लिए जाते हैं
फिल्मों में कई बार बड़े फैशन डिजाइनर्स काम करते हैं, जैसे मनीष मल्होत्रा. ऐसे में कई आउटफिट्स डिजाइनर खुद बनाते हैं और शूट खत्म होने के बाद उन्हें वापस ले लेते हैं. ये कपड़े बाद में फैशन शो या एग्जिबिशन में इस्तेमाल होते हैं. कभी-कभी इन्हें क्लाइंट्स को भी दिखाया जाता है. कुछ खास आउटफिट्स डिजाइनर के आर्काइव का हिस्सा बन जाते हैं.
‘पेटियों’ में बंद होती है पूरी फिल्म
फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद सभी कॉस्ट्यूम्स और ज्वेलरी को खास तरीके से पैक किया जाता है. हर आइटम पर फिल्म का नाम और कैरेक्टर का टैग लगाया जाता है. इन्हें बड़ी-बड़ी पेटियों (स्टोरेज बॉक्स) में रखा जाता है. फिर इन्हें स्टूडियो या प्रोडक्शन हाउस के वेयरहाउस में भेज दिया जाता है. यह एक तरह का “फिल्मी वॉर्डरोब बैंक” होता है, जहां से जरूरत पड़ने पर चीजें दोबारा निकाली जाती हैं.
जब नीलाम किए जाते हैं आउटफिट्स
कुछ खास और आइकॉनिक कॉस्ट्यूम्स को चैरिटी के लिए नीलाम (auction) भी किया जाता है. सलमान खान के गाने 'जीने के हैं चार दिन' वाला तौलिया भी स्टूडियो ने ₹1,42,000 में नीलाम किया था. बाद में यह रकम एक NGO को दान कर दी गई. रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन की फ़िल्म 'रोबोट' में इस्तेमाल की गई ड्रेसेस की भी नीलामी की गई थी. सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को कॉस्ट्यूम मिल जाती है और उससे मिली रकम चैरिटी में दे दी गई.
ज्वेलरी और एक्सेसरीज़ का क्या होता है?
फिल्मों में इस्तेमाल होने वाली ज्वेलरी हमेशा असली नहीं होती. कई बार यह नकली (imitation) होती है, जिसे शूट के बाद स्टोर कर लिया जाता है. महंगी ज्वेलरी अक्सर ब्रांड्स से उधार ली जाती है और शूट के बाद वापस कर दी जाती है. घड़ियां और एक्सेसरीज़ कई बार स्पॉन्सरशिप डील का हिस्सा होती हैं. कभी-कभी कलाकार अपनी निजी ज्वेलरी भी पहनते हैं, अगर वह किरदार के अनुसार फिट बैठती हो.
कम बजट फिल्मों में अलग होता है सिस्टम
हर फिल्म का बजट और तरीका अलग होता है. बड़े बजट की फिल्मों में पूरा कॉस्ट्यूम डिपार्टमेंट होता है. छोटे या इंडिपेंडेंट प्रोजेक्ट्स में कलाकार अपने कपड़े भी पहन सकते हैं. कुछ मामलों में शूट के बाद कलाकार कम कीमत पर कपड़े खरीद भी लेते हैं. इससे प्रोडक्शन का खर्च भी कम होता है और कलाकार को यादगार चीज भी मिल जाती है.
क्यों इतना जरूरी होता है कॉस्ट्यूम मैनेजमेंट?
कॉस्ट्यूम सिर्फ कपड़े नहीं होते, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा होते हैं. यह किरदार की पहचान बनाते हैं. समय, संस्कृति और स्थिति को दिखाते हैं. फिल्म की विजुअल अपील को बढ़ाते हैं. इसलिए इन्हें संभालकर रखना और सही तरीके से इस्तेमाल करना फिल्म इंडस्ट्री के लिए बहुत जरूरी होता है.
पर्दे के पीछे की अनदेखी दुनिया
फिल्मों में दिखने वाले चमकदार कपड़े और ज्वेलरी सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका एक लंबा सफर होता है. कभी वे दोबारा इस्तेमाल होते हैं, कभी स्टोर किए जाते हैं, तो कभी किसी के निजी कलेक्शन या चैरिटी का हिस्सा बन जाते हैं. यह पूरा प्रोसेस दिखाता है कि फिल्म इंडस्ट्री में हर चीज की प्लानिंग होती है. यहां तक कि कपड़ों और गहनों की भी. इसलिए अगली बार जब आप किसी फिल्म में शानदार आउटफिट देखें, तो याद रखें कि उसकी कहानी सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्दे के पीछे भी उतनी ही दिलचस्प है.




