मोहब्बत और बदनामी के बीच फंसी थी Waheeda Rehman, परेशान करने लगा था गुरु दत्त का कंट्रोलिंग बिहेवियर; फिर आया वो दिन..
वहीदा रहमान भारतीय सिनेमा की उन एक्ट्रेस में से हैं, जिन्होंने टैलेंट और गरिमा से इतिहास रचा. 3 फरवरी 1938 को तमिलनाडु में जन्मी वहीदा ने सामाजिक और धार्मिक बंदिशों के बावजूद नृत्य और अभिनय का रास्ता चुना.
वहीदा रहमान भारतीय सिनेमा की एक महान एक्ट्रेस हैं, जिनका जन्म 3 फरवरी 1938 को चेंगलपट्टू (तमिलनाडु) में हुआ था. वे एक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती थीं, जहां उनके पिता एक जिला आयुक्त थे और उन्होंने अपनी बेटी के नृत्य के जुनून का सपोर्ट किया. बचपन से ही वहीदा भरतनाट्यम नृत्य में प्रशिक्षित थीं, और उनके रिश्तेदार अक्सर पूछते थे कि "क्या मुसलमान लड़की को नचाओगे?. लेकिन उनके पिता ने हमेशा उनका साथ दिया. 13 साल की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद, परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई, और वहीदा ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने का फैसला किया.
वहीदा की शुरुआत तेलुगु सिनेमा से हुई. 1955 में उन्होंने तेलुगु फिल्म 'रोजुलु मरायी' में एक गाने में डांस किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. इसी दौरान हैदराबाद में एक डिस्ट्रीब्यूटर ऑफिस में गुरु दत्त की नजर उन पर पड़ी. गुरु दत्त नए चेहरों की तलाश में थे, और उन्होंने वहीदा के बारे में सुनकर उनसे मिलने की इच्छा जताई. वहीदा तब 16 साल की थी. पहली मुलाकात में गुरु दत्त चुपचाप बैठे रहे और उन्हें दूर से देखते रहे. वे एक शर्मीले व्यक्ति थे बाद में मुंबई में दूसरी मुलाकात हुई, जहां वहीदा अपनी मां मुमताज बेगम के साथ गईं. गुरु दत्त फिल्म्स ने उन्हें तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट ऑफर किया, लेकिन वहीदा ने दो शर्तें रखीं- वे अपना नाम नहीं बदलेंगी जबकि उस समय दिलीप कुमार या नरगिस जैसे सितारे स्क्रीन नेम रखते थे और उनकी ऑउटफिट पर उनका वीटो पावर होगा यानी अगर उन्हें ऐसे कोई ऑउटफिट बहुत रिवीलिंग लगेगा तो उसे नहीं पहनेंगी गुरु दत्त थोड़े नाराज हुए लेकिन सहमत हो गए.
वहीदा रहमान का हिंदी डेब्यू
वहीदा ने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करने से पहले उनकी फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' देखी. इसके बाद वहीदा का हिंदी डेब्यू गुरु दत्त की प्रोड्यूस्ड फिल्म 'सीआईडी' (1956) में हुआ, जहां उन्होंने कमिनी का किरदार निभाया. एक अच्छी दिल वाली वैम्प जो देव आनंद के किरदार को बचाती है. शूटिंग के दौरान निर्देशक राज खोसला से उनके मतभेद हुए, लेकिन गुरु दत्त ने हस्तक्षेप कर मामला सुलझाया. इसके बाद उन्होंने गुरु दत्त के साथ कई क्लासिक फिल्में कीं, जैसे "प्यासा" (1957), "कागज के फूल" (1959), "चौदहवीं का चांद" (1960), और "साहिब बीबी और गुलाम" (1962)। गुरु दत्त उनके मेंटर थे, और उन्होंने वहीदा को एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं.
गुरु से बड़ी नजदीकियां
धीरे-धीरे वहीदा और गुरु दत्त का रिश्ता गहरा होता गया. गुरु दत्त शादीशुदा थे उनकी पत्नी गीता दत्त मशहूर सिंगर थीं, और उनकी शादीशुदा जिंदगी पहले से ही उथल-पुथल से भरी थी. लेकिन वहीदा के साथ गुरु दत्त का बॉन्ड अलग था. वे वहीदा की मां को 'मम्मी' कहते थे और सीमाओं का सम्मान करते थे. अबरार अल्वी ने अपनी किताब 'टेन इयर्स विद गुरु दत्त' में लिखा कि वहीदा की मां चिंतित रहती थी. वह कहती थी, 'अबरार, मेरी बेटी का क्या होगा? मैं उसके बारे में चिंता करती हूं... वह ऐसी लड़की नहीं है जो मर्दों से खेलती फिरे, और वह शादीशुदा आदमी है. वह कहता है कि वह उसके लिए अपनी जान दे देगा.' वहीदा की मां की मौत 'सोलवा साल' की शूटिंग के दौरान हुई, तब गुरु दत्त उनका सहारा बने.
पत्नी और प्रेमिका में से कोई एक
रूमर्स फैले कि यह रिश्ता रोमांटिक है, लेकिन गुरु दत्त कभी खुलकर नहीं बोल पाए. वे उनके सहयोगी सोचते थे कि वहीदा गीता से बेहतर साथी होंगी. यहां तक कि गुरु दत्त की मां भी सहमत थी. 'कागज के फूल' (1959) में गुरु दत्त ने अपनी जिंदगी की झलक दिखाई, जहां वहीदा 'दूसरी औरत' का रोल निभाती हैं. लेकिन फिल्म फ्लॉप हुई, और गुरु दत्त टूट गए. गीता को शक था कि वहीदा उनकी शादीशुदा जिंदगी को खत्म कर देगी इसलिए गीता ने गुरु से प्रेमिका और पत्नी में से एक को चुनने को कहा. गुरु मजबूर थे उन्होंने गीता को चुना, लेकिन गीता यह बात जानती थी की वह उन्हें सिर्फ बच्चों की वजह से चुन रहे है इश्क़ तो वह वहीदा से दिल ही दिल में करते रहेंगे. भले ही गुरु ने गीता को चुना लेकिन वह भी उनकी जिंदगी से दूर जा चुके थी. गुरु अब अकेले और तनहा हो गए थे न उनके पास गीता का साथ था न ही वहीदा का. गीता गुरु से इतना नाराज रही की वह उन्हें बच्चों से मिलने तक नहीं देती थी.
टूट चुकी थी वहीदा
उधर वहीदा अपने उभरते करियर में गुरु की शादी को बर्बाद करने के नाम से बदनाम हो रही थी. वहीदा को ऐसे में अपने कदम पीछे लेने पड़े और उन्हें गुरु का साथ छोड़ना पड़ा. गुरु से वहीदा की दूरी की वजह यह भी थी गुरु उनके प्रति बहुत कंट्रोलिंग हो गए थे. वह कभी वहीदा को खुद से दूर नहीं रखना चाहते थे. वह हमेशा चाहते थे कि वहीदा से सिर्फ उनके बैनर की फ़िल्में करें लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं था. फिर साल आया 1964 जब गुरु अपने घर में मृत पाए गए. अबरार अल्वी ने अपनी किताब 'टेन इयर्स विद गुरु दत्त' में जिक्र किया है कि वह गुरु के मौत के बाद उनके घर में पहुंचे. गुरु सफ़ेद कुर्ते पायजामे अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे उनके पास एक बॉटल से आधा बह चुका तरल पदार्थ मिला था. गुरु की मौत से वहीदा टूट चुकी थी उन्हें इस सदमे से उभरने में बहुत समय लगा.
कमलजीत से रचाई शादी
वहीदा रहमान ने 1974 में शशि रेखी जिन्हें स्क्रीन नेम कमलजीत से भी जाना जाता है से शादी की थी. दोनों ने 1964 की फिल्म शगून में साथ काम किया था, जहां उनकी मुलाकात हुई और बाद में प्यार हो गया. शादी 27 अप्रैल 1974 को हुई. यह एक इंटर-कम्युनिटी मैरिज थी वहीदा मुस्लिम परिवार से थीं और कमलजीत हिंदू थे. शुरू में परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने शादी की. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, सलमान खान के पिता सलिम खान ने उन्हें सलाह दी थी कि प्यार के लिए आगे बढ़ें. शादी के बाद वे बैंगलोर के पास एक फार्महाउस में रहने लगीं, जहां वहीदा ने खेती-बाड़ी भी की. उनके दो बच्चे हैं- बेटा: सोहेल रेखी जो एक राइटर हैं और बेटी कशवी रेखी.





