कारगिल वॉर में शामिल हुए थे नाना पाटेकर, क्या होती है QRT जिसका बने हिस्सा, खुद सुनाया सेना में जाने का किस्सा
नाना पाटेकर का कारगिल से जुड़ा अनसुना किस्सा. सेना से अनुमति नहीं मिलने के बाद वह तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के पास पहुंचे. जानें फिल्म से कारगिल के मोर्चे तक पहुंचने की पूरी कहानी.
हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार को निधन हो गया. उन्होंने अपने करियर में कई यादगार किरदार निभाए और कई पुरस्कार भी अपने नाम किए. लेकिन उनकी जिंदगी का एक ऐसा पहलू भी रहा, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. यह किस्सा फिल्मों की दुनिया से निकलकर सीधे कारगिल के मोर्चे तक पहुंचने का है.
नाना पाटेकर ने उस समय भारतीय सेना के साथ काम करने की इच्छा जताई थी, जब वह पहले से ही एक स्थापित अभिनेता थे और दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके थे. उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान सैनिकों के साथ रहकर देश की सेवा करने की अनुमति मांगी थी.
कैसे सेना की ली ट्रेनिंग?
नाना पाटेकर का सेना से जुड़ाव कारगिल युद्ध से कई साल पहले शुरू हो गया था. 1991 में आई उनकी फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में उन्होंने एक सेना अधिकारी की भूमिका निभाई थी. इस किरदार की तैयारी के लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ ट्रेनिंग ली थी.
नाना पाटेकर के अपने बयान के मुताबिक, उन्होंने इस यूनिट के साथ करीब तीन साल बिताए थे. इस दौरान उन्होंने सैन्य अभ्यास, हथियारों के इस्तेमाल और मुश्किल परिस्थितियों में रहने जैसी चीजों की ट्रेनिंग ली. बाद में 1999 में जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो यही सैन्य ट्रेनिंग उनके लिए काफी काम आई.
क्या कारगिल जाना चाहते थे नाना पाटेकर?
नाना पाटेकर सिर्फ दूर से भारतीय सेना का समर्थन नहीं करना चाहते थे. वह खुद सैनिकों के साथ रहकर उनकी मदद करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया और सैनिकों के साथ जुड़ने की इच्छा जताई. शुरुआत में उनकी यह मांग स्वीकार नहीं की गई. उन्हें बताया गया कि इसके लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री की अनुमति जरूरी होगी.
इसके बाद नाना पाटेकर ने उस समय के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से संपर्क किया. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में अपनी बातचीत को याद करते हुए नाना पाटेकर ने बताया था कि उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस से कहा था कि सेना में कमीशन के लिए औपचारिक ट्रेनिंग में करीब छह महीने लग सकते हैं, लेकिन वह पहले ही मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ तीन साल की ट्रेनिंग ले चुके हैं. नाना ने एक इंटरव्यू में बताया कि वह एक बेहतरीन शूटर रह चुके हैं. उनके पास नेशनल लेवल में ब्रॉन्ज मेडल था.
क्या नाना पाटेकर को मिली मंजूरी?
नाना पाटेकर की सैन्य पृष्ठभूमि के बारे में जानने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस ने उन्हें कारगिल जाने की अनुमति दे दी. अनुमति मिलने के बाद नाना पाटेकर कारगिल के संघर्ष वाले इलाके में पहुंचे और वहां सेना के जवानों के साथ समय बिताया. उनके कारगिल में रहने की अवधि को लेकर अलग-अलग बयानों में कुछ हफ्तों से लेकर करीब दो महीने तक की जानकारी सामने आई है. इंटरव्यू में नाना पाटेकर ने बताया था कि वह द्रास, लेह, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों से होकर गुजरे थे. बाद में वह एक क्विक रिएक्शन टीम यानी QRT का हिस्सा भी बने. हालांकि, उन्होंने अपनी भूमिका के बारे में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की. वह इस मामले में हमेशा काफी सावधान रहे और सेना से जुड़े ऑपरेशनल मामलों पर विस्तार से बात करने से बचते रहे.
किस टीम का हिस्सा थे नाना पाटेकर?
2024 में ‘द लल्लनटॉप’ को दिए एक इंटरव्यू में भी जब उनसे सेना के साथ बिताए समय के बारे में विस्तार से पूछा गया तो उन्होंने ऑपरेशनल जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया. हालांकि, उन्होंने बताया कि वह एक QRT का हिस्सा बने थे. उन्होंने एक सैन्य अस्पताल में भी समय बिताया और बेस पर मौजूद सैनिकों की मदद की.
क्या होती है QRT?
QRT यानी Quick Response Team या Quick Reaction Team एक खास और अच्छी तरह से प्रशिक्षित टीम होती है, जिसे किसी भी गंभीर, आपातकालीन या अचानक पैदा हुई स्थिति में तुरंत कार्रवाई करने के लिए तैयार किया जाता है. अलग-अलग संस्थाओं में QRT की जिम्मेदारियां अलग हो सकती हैं. सेना और आतंकवाद विरोधी अभियानों में यह टीम खतरनाक हालात और सैन्य अभियानों में तुरंत कार्रवाई करती है. पुलिस और कानून-व्यवस्था से जुड़ी QRT टीमों को किसी आपात स्थिति, हिंसा या सुरक्षा खतरे से निपटने के लिए तैनात किया जाता है. वहीं, औद्योगिक संस्थानों और एयरपोर्ट की सुरक्षा में QRT का काम किसी भी सुरक्षा खतरे या आपात स्थिति में तुरंत मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करना होता है.
कैसे घटा 20 किलोग्राम वज़न?
कारगिल में बिताए समय का नाना पाटेकर के शरीर पर भी काफी असर पड़ा था. उन्होंने बताया था कि जब वह श्रीनगर पहुंचे थे, तब उनका वजन करीब 76 किलो था. वापस लौटने तक उनका वजन घटकर 56 किलो रह गया था. नाना पाटेकर ने वजन में इस बड़े बदलाव की वजह उन मुश्किल परिस्थितियों को बताया था, जिनमें उन्होंने सैनिकों के साथ रहते और काम करते हुए समय बिताया. हालांकि, उन्होंने कभी इस अनुभव को अपनी उपलब्धि की तरह पेश नहीं किया और न ही इसे लेकर अपनी तारीफ की. एक पुराने इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया था कि वह कारगिल क्यों गए थे, तो उन्होंने बेहद साधारण तरीके से अपनी बात रखी थी- “इतना तो कर सकते हैं देश के लिए.”
नाना पाटेकर के कारगिल से जुड़े अनुभव की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने इसे अपनी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा नहीं बनाया. वह हिंदी सिनेमा के जाने-पहचाने अभिनेताओं में रहे, लेकिन उन्होंने कारगिल में बिताए अपने समय के बारे में बहुत कम बात की. जब भी उन्होंने इसका जिक्र किया, अपनी भूमिका को ज्यादा बड़ा बताने से बचते रहे और सेना से जुड़ी ऑपरेशनल जानकारी साझा नहीं की.




