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जब इस कारोबारी परिवार ने संकट में फंसी गुजरात सरकार को दिया था कर्ज; आज उस विरासत को आगे बढ़ा रही है Juhi Chawla और Jay Mehta

आज जूही चावला का ससुराल हजारों करोड़ के बिजनेस साम्राज्य का मालिक है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इस परिवार ने आर्थिक संकट में फंसी गुजरात सरकार की मदद की थी.

जब इस कारोबारी परिवार ने संकट में फंसी गुजरात सरकार को दिया था कर्ज; आज उस विरासत को आगे बढ़ा रही है Juhi Chawla और Jay Mehta
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( Image Source:  ANI )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय8 Mins Read

Published on: 20 Jun 2026 7:34 PM

बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस और बिजनेसवुमन जूही चावला (Juhi Chawla) आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं. अक्सर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री की सबसे अमीर एक्ट्रेस में गिना जाता है. 'हुरुन रिच लिस्ट' के मुताबिक, जूही चावला की अपनी कुल संपत्ति करीब 7,790 करोड़ रुपये है. वहीं, उनके पति और जाने-माने बिजनेसमैन जय मेहता लगभग 17,500 करोड़ रुपये के एक विशाल बिजनेस एम्पायर को संभालते हैं. जब भी इस कपल की संपत्ति की बात होती है, तो लोगों का ध्यान अक्सर आईपीएल (IPL) टीम 'कोलकाता नाइट राइडर्स' (KKR) में उनकी हिस्सेदारी पर जाता है जिसे अब उन्होंने बेच दिया है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मेहता परिवार की इस अटूट दौलत और कामयाबी की जड़ें एक सदी से भी ज्यादा पुरानी हैं. इस परिवार का इतिहास भारत और विदेश दोनों जगह बेहद गौरवशाली रहा है. यहां तक कि गुजरात के इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया था, जब खुद सूबे की सरकार ने इस परिवार से आर्थिक मदद मांगी थी.

मेहता परिवार ने दिया सरकार को कर्ज

यह बात साल 1960 की है, जब देश में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ. उस समय के द्विभाषी 'बॉम्बे राज्य' को विभाजित करके दो नए राज्य बनाए गए महाराष्ट्र और गुजरात. गुजरात एक नया राज्य तो बन गया, लेकिन शुरुआती दिनों में उसके सामने आर्थिक और प्रशासनिक रूप से खड़े होने की बहुत बड़ी चुनौती थी. दरअसल, व्यापार और कमाई के ज्यादातर बड़े केंद्र महाराष्ट्र के हिस्से में चले गए थे, जिसकी वजह से गुजरात को अपनी अर्थव्यवस्था बिल्कुल शून्य से शुरू करनी पड़ी. 'लोहना इंटरनेशनल बिजनेस फोरम' के अध्यक्ष और समाज के प्रतिष्ठित नेता सतीशभाई विठलानी ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में इस दिलचस्प इतिहास से पर्दा उठाया.

उन्होंने बताया, 'गुजरात और महाराष्ट्र के बंटवारे के बाद, शुरुआती सालों में गुजरात सरकार गहरे आर्थिक संकट में फंस गई थी. हालात इतने खराब थे कि सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं थे. ऐसे मुश्किल वक्त में सरकार की मदद के लिए जय मेहता के दादा और महान उद्योगपति नानजी कालिदास मेहता आगे आए. उन्होंने सरकार को संकट से उबारने के लिए कर्ज दिया था. किसी निजी बिजनेसमैन द्वारा सरकार को लोन देना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है.'

खाली हाथ अफ्रीका गया और 'किंग' बन गया

इस विशाल साम्राज्य की नींव रखने वाले नानजी कालिदास मेहता का जन्म गुजरात के पोरबंदर में हुआ था. बात 1900 के शुरुआती दशक की है, जब महज़ 13 साल की उम्र में यह लड़का आंखो में बड़े सपने लेकर पूर्वी अफ्रीका के लिए रवाना हुआ. जेब खाली थी, लेकिन हौसला बुलंद था. वह केन्या के मोम्बासा पहुंचे और अपनी जिंदगी की शुरुआत छोटी-मोटी दुकानों में काम करके की. उन्होंने बारीकी से व्यापार के गुर सीखे और धीरे-धीरे कपड़े, अनाज और रोजमर्रा के सामान का छोटा-मोटा बिजनेस शुरू कर दिया. अपनी सूझबूझ के दम पर वे जल्द ही युगांडा पहुंच गए, जिसे उस जमाने में 'अफ्रीका का मोती' कहा जाता था.

दलदल को बदला सोने की खान में

1920 के दशक में नानजी भाई ने एक बड़ा और साहसी फैसला लिया. उन्होंने युगांडा के 'लुगाज़ी' इलाके में एक बहुत बड़ा दलदली और बंजर इलाका खरीदा. लोग हैरान थे, लेकिन नानजी की नजर दूर तक देख रही थी. उन्होंने वहां गन्ने की खेती शुरू की. रास्ता आसान नहीं था, क्योंकि वहां न तो सड़कें थीं और न ही कोई बुनियादी सुविधाएं. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और साल 1930 में 'युगांडा शुगर फैक्ट्री लिमिटेड' की स्थापना की. देखते ही देखते यह कंपनी पूर्वी अफ्रीका के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में शुमार हो गई. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उनका बिजनेस चीनी और सीमेंट से लेकर कपड़े, इंश्योरेंस, पावर और रियल एस्टेट तक फैल गया.

भारत लौटे और बनाया सपनों का महल 'स्वास्तिक भवन'

विदेश में अपार सफलता पाने के बाद भी नानजी भाई की आत्मा भारत में ही बसती थी. उन्होंने 1920 के दशक के आखिर में अपने गृहनगर पोरबंदर में कपड़ा मिलें खोलीं. इसके बाद साल 1936 में उन्होंने पोरबंदर में समंदर के किनारे एक बेहद खूबसूरत और आलीशान हवेली बनाई, जिसे नाम दिया गया 'स्वास्तिक भवन'. यह हवेली सिर्फ पत्थरों का मकान नहीं, बल्कि कला का एक बेजोड़ नमूना थी. इसे बनाने में पोरबंदर के खास चूना पत्थर का इस्तेमाल हुआ था, जबकि अंदर का फर्श इटेलियन संगमरमर से चमकाया गया था. घर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए जापान से टाइल्स, यूरोप से कांच के झूमर और अफ्रीका से खास तौर पर मंगवाया गया शानदार फर्नीचर लगाया गया था.

देश के प्रधानमंत्रियों का पसंदीदा ठिकाना

यह घर कितना ऐतिहासिक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आजाद भारत के कई दिग्गज नेता यहां मेहमान बनकर आ चुके हैं. नानजी भाई की पोती कमल मेहता के अनुसार, भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई यहां रुक चुके हैं. देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस ऐतिहासिक हवेली का दौरा कर चुके हैं. इसके अलावा भारतीय सेना के गौरव फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और दुनिया भर के नामी लेखक और कवि भी इस घर की मेजबानी का लुत्फ उठा चुके हैं.

जब इदी अमीन के क्रूर फैसले ने रातोंरात किया कंगाल

मेहता परिवार की कहानी सिर्फ अमीर होने की नहीं, बल्कि मुश्किलों से लड़कर दोबारा खड़े होने की है. 1970 के दशक तक मेहता परिवार युगांडा में हजारों स्थानीय लोगों को रोजगार, पक्के मकान, साफ पानी और शिक्षा दे रहा था. लेकिन साल 1972 में युगांडा के क्रूर तानाशाह इदी अमीन ने एक काला फरमान जारी किया. उसने देश के सभी 80,000 एशियाई (मुख्य रूप से भारतीय) लोगों को रातोंरात देश छोड़ने का आदेश दे दिया. मेहता परिवार के सारे कारखाने जब्त कर लिए गए, बैंक अकाउंट फ्रीज हो गए और जो साम्राज्य उन्होंने 70 सालों की कड़ी मेहनत से खड़ा किया था, वह एक झटके में छिन गया. परिवार को खाली हाथ वहां से भागना पड़ा.

राख से उठकर फिर रचा इतिहास

कहते हैं कि हुनर और अच्छाई कभी बेकार नहीं जाती. साल 1979 में जब तानाशाह इदी अमीन की सत्ता का अंत हुआ, तो युगांडा की नई सरकार को समझ आया कि देश की अर्थव्यवस्था को सिर्फ भारतीय कारोबारी ही बचा सकते हैं. सरकार ने मेहता परिवार को ससम्मान वापस आने का न्यौता दिया. जब मेहता परिवार युगांडा लौटा, तो स्थानीय लोगों ने उनका खुले दिल से स्वागत किया, क्योंकि लोग नानजी भाई के परोपकार को भूले नहीं थे. परिवार ने शून्य से शुरुआत की, अपनी बंद पड़ी चीनी मिलों और चाय के बागानों को फिर से चालू किया. आज, कई दशकों बाद भी मेहता ग्रुप पूर्वी अफ्रीका और भारत के सबसे मजबूत बिजनेस घरानों में से एक है. चीनी, सीमेंट, हॉस्पिटैलिटी और खेल (स्पोर्ट्स) जैसे क्षेत्रों में आज भी इस परिवार का डंका बजता है. जूही चावला और जय मेहता आज इसी गौरवशाली और ऐतिहासिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

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