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क्‍या बॉलीवुड में भी चल रहा हिंदू-मुसलमान? 8 साल से काम को तरस रहे एआर रहमान के खुलासे ने छेड़ी नई बहस

ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि पिछले आठ वर्षों में बॉलीवुड में उनका काम लगातार कम हुआ है. रहमान का मानना है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अब रचनात्मक लोगों की जगह गैर-क्रिएटिव ताकतों का दबदबा बढ़ गया है. उन्होंने इशारों में इसे ‘कम्युनल फैक्टर’ से भी जोड़ा, हालांकि कहा कि यह खुलकर सामने नहीं आता. रहमान ने साफ किया कि वह काम की तलाश नहीं करते और अपनी कला की ईमानदारी पर भरोसा रखते हैं.

क्‍या बॉलीवुड में भी चल रहा हिंदू-मुसलमान? 8 साल से काम को तरस रहे एआर रहमान के खुलासे ने छेड़ी नई बहस
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( Image Source:  ANI )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Published on: 16 Jan 2026 12:07 AM

ऑस्कर विजेता, ग्रैमी अवॉर्डी और भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने वाले एआर रहमान का नाम आज भी सम्मान और क्लास का पर्याय है. लेकिन इसी महान संगीतकार ने हाल ही में ऐसा बयान दिया है, जिसने बॉलीवुड की अंदरूनी सच्चाइयों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रहमान ने स्वीकार किया है कि पिछले आठ वर्षों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनका काम काफी कम हो गया है, और इसकी वजह सिर्फ पेशेवर बदलाव नहीं, बल्कि सत्ता का रचनात्मक हाथों से खिसक जाना और संभवतः कम्युनल फैक्टर भी हो सकता है.

यह बयान रहमान ने BBC Asian Network को दिए एक इंटरव्यू में दिया, जहां उन्होंने न सिर्फ अपने करियर के उतार-चढ़ाव पर बात की, बल्कि बॉलीवुड के बदलते चरित्र को भी बेबाकी से सामने रखा.

सात साल तक ‘आउटसाइडर’ रहने का दर्द

एआर रहमान ने 1991 में मणिरत्नम की फिल्म ‘रोजा’ से बॉलीवुड में कदम रखा. इसके बाद ‘बॉम्बे’ (1995) और ‘दिल से’ (1998) जैसी फिल्मों ने उन्हें कलात्मक पहचान दिलाई, लेकिन रहमान मानते हैं कि इन तीनों फिल्मों के बावजूद वह खुद को हिंदी सिनेमा का हिस्सा महसूस नहीं कर पाए. रहमान ने कहा, “इन फिल्मों के बाद भी मैं खुद को आउटसाइडर ही मानता था. मैं हिंदी बोल ही नहीं पाता था.” तमिल पृष्ठभूमि से आने वाले रहमान के लिए हिंदी सीखना आसान नहीं था. भाषा के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी एक बड़ी बाधा थी.

‘ताल’ जिसने बदल दी पहचान

1999 में आई सुभाष घई की फिल्म ‘ताल’ रहमान के करियर का टर्निंग पॉइंट बनी. रहमान खुद मानते हैं कि इसी फिल्म के बाद वह सही मायनों में हिंदी सिनेमा का हिस्सा बने. “ताल हर घर, हर रसोई तक पहुंची. आज भी नॉर्थ इंडिया के लोगों के खून में यह म्यूजिक बहता है.” ‘ताल’ के गानों - ‘ताल से ताल’, ‘इश्क बिना’, ‘नहीं सामने तू’, ‘कहीं आग लगे’ - ने रहमान को मास ऑडियंस से जोड़ा और उन्हें एक ‘हाउसहोल्ड नेम’ बना दिया.

हिंदी से उर्दू और फिर अरबी तक का सफर

रहमान ने बताया कि सुभाष घई ने उन्हें साफ कहा था - अगर बॉलीवुड में टिकना है, तो हिंदी सीखनी होगी. रहमान ने इसे चुनौती की तरह लिया और एक कदम आगे बढ़ते हुए उर्दू सीखनी शुरू की, क्योंकि उनके अनुसार 60-70 के दशक का हिंदी फिल्म संगीत उर्दू की आत्मा से जुड़ा था. यहीं नहीं रुके - उर्दू की उच्चारण शैली से मिलती-जुलती होने के कारण उन्होंने अरबी भाषा भी सीखी. इसके बाद पंजाबी संगीत से उनका जुड़ाव हुआ, जिसकी बड़ी वजह बने सुखविंदर सिंह.

सुखविंदर सिंह और ऐतिहासिक साझेदारी

सुखविंदर सिंह और एआर रहमान की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को कुछ अमर गीत दिए -

  • ‘छैंया छैंया’ - दिल से
  • ‘रमता जोगी’ - ताल
  • ‘जय हो’ - स्लमडॉग मिलियनेयर (ऑस्कर विजेता गीत)

रहमान बताते हैं कि सुखविंदर को उन्होंने खुद खोजा था, क्योंकि उन्हें ऐसा सिंगर चाहिए था जो पंजाबी लिख और गा सके.

8 साल में क्यों घटा बॉलीवुड का काम?

इंटरव्यू का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा तब आया जब रहमान से पूछा गया कि क्या बॉलीवुड में तमिल समुदाय या गैर-महाराष्ट्रीयन कलाकारों के खिलाफ पूर्वाग्रह है?

रहमान का जवाब सीधा लेकिन गहरा था - “शायद पहले यह छिपा हुआ था, लेकिन पिछले आठ सालों में सत्ता का संतुलन बदल गया है. अब रचनात्मक लोग सत्ता में नहीं हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि यह ‘कम्युनल फैक्टर’ भी हो सकता है, हालांकि यह सीधे उनके चेहरे पर नहीं दिखता. कई बार उन्हें सिर्फ “चाइनीज़ व्हिस्पर्स” के जरिए पता चलता है कि उन्हें साइन किया जाना था, लेकिन म्यूजिक कंपनियों ने अपने पांच ‘इन-हाउस’ कंपोजर्स को काम दे दिया.

‘मुझे काम की तलाश नहीं’

जहां ज्यादातर कलाकार काम न मिलने पर सिस्टम को कोसते हैं, वहीं रहमान का नजरिया अलग है - “मुझे फर्क नहीं पड़ता. मुझे अपने परिवार के साथ ज्यादा वक्त मिल जाता है. मैं काम ढूंढने नहीं जाता, मैं चाहता हूं कि काम खुद मेरे पास आए.” यह बयान रहमान की आत्मविश्वास भरी सोच और उनके रचनात्मक स्वाभिमान को दर्शाता है.

डब वर्ज़न से हिंदी फिल्मों की ओर क्यों मुड़े?

रहमान ने NDTV को दिए एक पुराने इंटरव्यू में एक और दर्दनाक अनुभव साझा किया था. उन्होंने बताया कि जब ‘रोजा’ और ‘दिल से’ जैसी फिल्मों के गाने हिट हुए, तो कई हिंदी फिल्मों में तमिल गानों के बेहद खराब अनुवाद इस्तेमाल किए गए. “लोग कहते थे - हिंदी लिरिक्स बेकार हैं, तमिल वर्ज़न बेहतर है. यह मेरे लिए अपमानजनक था.” इसी अनुभव के बाद रहमान ने तय किया कि वह डब फिल्मों की बजाय ओरिजिनल हिंदी फिल्मों पर ज्यादा ध्यान देंगे, ताकि संगीत की आत्मा से समझौता न हो.

बदलता बॉलीवुड और उठते सवाल

एआर रहमान का यह बयान सिर्फ एक कलाकार की पीड़ा नहीं, बल्कि बॉलीवुड के बदलते पावर स्ट्रक्चर की कहानी है. जहां कभी संगीत, कहानी और प्रयोग को अहमियत दी जाती थी, वहां अब कॉरपोरेट कंट्रोल, फार्मूला म्यूजिक और तात्कालिक हिट्स हावी हो चुके हैं. रहमान का यह कहना कि “जो लोग रचनात्मक नहीं हैं, वही आज सत्ता में हैं,” इंडस्ट्री के लिए एक आईना है - और चेतावनी भी.

एआर रहमान आज भी वही हैं - ईमानदार, गहरे और आत्मसम्मान से भरे हुए. अगर बॉलीवुड ने उन्हें कम काम दिया है, तो यह रहमान की कमी नहीं, बल्कि इंडस्ट्री की प्राथमिकताओं में आई गिरावट को दर्शाता है. शायद आने वाला वक्त फिर गवाही देगा कि क्रिएटिविटी को नजरअंदाज कर कोई भी इंडस्ट्री लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती - और जब संगीत की बात होगी, एआर रहमान का नाम हमेशा सबसे ऊपर रहेगा.

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