क्या RBI को बेचना पड़ा 12 अरब डॉलर का सोना? रिपोर्ट से खलबली, सरकार पर विपक्ष हमलावर, 1991 से कितनी अलग है स्थिति
RBI के 12 अरब डॉलर का सोना बेचने की रिपोर्ट पर विवाद तेज. जानिए सरकार का पक्ष, विपक्ष के आरोप, 1991 के संकट से तुलना और पूरी सच्चाई.
क्या भारत की अर्थव्यवस्था पर इतना दबाव है कि रिजर्व बैंक को अपना सोना बेचना पड़ गया? ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट ने ऐसा दावा कर राजनीतिक और आर्थिक हलकों में हलचल मचा दी है. रिपोर्ट में कहा गया कि मई 2026 में RBI ने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखने और रुपये पर दबाव कम करने के लिए करीब 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना (Gold) बेचा है. हालांकि, केंद्र सरकार ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें झूठा और भ्रामक बताया है.
रिपोर्ट के सामने आते ही विपक्ष ने मोदी सरकार पर हमला बोल दिया और इसे आर्थिक बदहाली का संकेत बताया. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में सोना बेचा गया, विपक्ष के आरोप क्या हैं और यह स्थिति 1991 के आर्थिक संकट से कितनी अलग है?
क्या है पूरा विवाद?
भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को उस समय सफाई देनी पड़ी जब ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि मई 2026 में RBI ने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) पर दबाव कम करने और रुपये को संभालने के लिए करीब 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना बेचा हो सकता है. रिपोर्ट में सार्वजनिक आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कहा गया कि दो सप्ताह के भीतर RBI के गोल्ड रिजर्व के मूल्य में असामान्य गिरावट दर्ज की गई. जबकि उसी अवधि में सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया गया था. आम तौर पर ऐसी स्थिति में गोल्ड रिजर्व का मूल्य बढ़ना चाहिए था. हालांकि, भारत सरकार ने इन रिपोर्टों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें भ्रामक और तथ्यहीन बताया है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में दावा क्या?
ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के विश्लेषण में कहा गया कि ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया और भारत से विदेशी पूंजी का बहिर्गमन तेज हुआ. ऐसे में विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ने लगा. रिपोर्ट के अनुसार RBI ने संभवतः 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना बेचकर डॉलर जुटाए और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने की कोशिश की.
ब्लूमबर्ग के विश्लेषण में यह भी कहा गया कि केंद्रीय बैंक तरल विदेशी मुद्रा भंडार को प्राथमिकता दे रहा था क्योंकि बढ़ता चालू खाता घाटा रुपये पर दबाव बना रहा था.
सरकार ने इन दावों पर क्या कहा?
सरकारी सूत्रों ने CNBC-TV18 सहित कई मीडिया संस्थानों को बताया कि RBI द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोना बेचने की खबरें पूरी तरह गलत हैं. सरकार का कहना है कि रिजर्व बैंक ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है और गोल्ड रिजर्व में कथित कमी को सोना बेचने से जोड़ना गलत निष्कर्ष है. सरकार ने ब्लूमबर्ग के विश्लेषण को भी खारिज कर दिया और कहा कि इससे अनावश्यक भ्रम फैलाया जा रहा है.
Congress ने मोदी सरकार पर क्या आरोप लगाए?
रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला. कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से कहा गया कि सरकार रुपये को संभाल नहीं पा रही है और अपनी छवि बचाने के लिए RBI से सोना बिकवा रही है. पार्टी ने दावा किया कि केवल दो सप्ताह में करीब 12 अरब डॉलर का सोना बेच दिया गया और यह कदम रुपये को 100 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचने से रोकने के लिए उठाया गया. कांग्रेस ने इसे अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति का संकेत बताते हुए कहा कि गिरता रुपया, विदेशी निवेशकों का बाहर जाना और रोजगार संकट सरकार की विफलताओं के प्रमाण हैं.
अरविंद केजरीवाल का तर्क क्या?
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी सरकार पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या देश आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है. विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार को विदेशी मुद्रा भंडार या सरकारी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए गोल्ड रिजर्व का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह आर्थिक प्रबंधन की गंभीर विफलता का संकेत है. विपक्ष ने सरकार से अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग भी की है.
BJP का जवाब क्या?
भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है. भाजपा नेताओं का कहना है कि वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. सरकार का तर्क है कि विदेशी मुद्रा बचाने और आयात बिल कम करने के लिए नागरिकों से सहयोग की अपील करना कोई असामान्य कदम नहीं है. भाजपा ने यह भी याद दिलाया कि 2013 में यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी लोगों से सोने की खरीद कम करने की अपील की थी.
PM ने लोगों से सोना न खरीदने की अपील की थी?
विपक्ष के हमलों के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह अपील भी है, जिसमें उन्होंने नागरिकों से एक निश्चित अवधि तक सोने की खरीदारी टालने और अनावश्यक विदेशी खर्च कम करने का आग्रह किया था. सरकार का कहना है कि यह विदेशी मुद्रा बचाने और आयात दबाव कम करने के लिए एहतियाती कदम था, जबकि विपक्ष इसे आर्थिक कमजोरी का संकेत बता रहा है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
आर्थिक मामलों के एक्सपर्ट दिनेश कुमार वोहरा तल्ख शब्दों में कहा कि गजब हो. ऐसा आजाद भारत में कभी नहीं हुआ. मोदी सरकार ने 12 अरब डॉलर का सोना बेच दिया. उन्होंने कहा कि भारत के आर्थिक इतिहास में सबसे चर्चित उदाहरण 1991 का है. उस समय देश गंभीर भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) से जूझ रहा था और विदेशी मुद्रा भंडार कुछ सप्ताह के आयात के बराबर ही बचा था. तत्कालीन सरकार ने लगभग 67 टन सोना विदेशों में गिरवी रखा था ताकि विदेशी मुद्रा जुटाई जा सके. महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय सोना स्थायी रूप से बेचा नहीं गया था, बल्कि गिरवी रखा गया था और बाद में उसे वापस ले लिया गया था.
1991 और मौजूदा स्थिति में अंतर क्या?
1991 में भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार बेहद सीमित था और देश डिफॉल्ट के कगार पर पहुंच गया था. इसके विपरीत आज भारत दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले देशों में शामिल है. RBI के पास सैकड़ों अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार और सैकड़ों टन सोना मौजूद है. यही वजह है कि अधिकांश अर्थशास्त्री 1991 जैसी स्थिति और मौजूदा परिस्थितियों की तुलना को अतिशयोक्ति मानते हैं. हालांकि यदि केंद्रीय बैंक को वास्तव में गोल्ड रिजर्व बेचकर बाजार में हस्तक्षेप करना पड़े, तो इसे आर्थिक दबाव का संकेत जरूर माना जाएगा.
असली सवाल क्या?
विवाद का केंद्र यह नहीं है कि सोना बेचा गया या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पर इतना दबाव है कि केंद्रीय बैंक को असाधारण कदम उठाने पड़ें. सरकार इन रिपोर्टों को झूठा बता रही है, जबकि विपक्ष इन्हें आर्थिक प्रबंधन की विफलता का प्रमाण बता रहा है. ऐसे में RBI के आधिकारिक आंकड़े और आगे की नीतियां ही तय करेंगी कि यह केवल एक विश्लेषणात्मक विवाद था या आर्थिक चिंताओं का कोई बड़ा संकेत.




